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गिद्धों के वजूद पर संकट

04/04/21
in उत्तराखंड
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(डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला )भारत जैवविविधताओं से परिपूर्ण देश है, जहाँ पूरे विश्व का 8% जैवविविधता वाला भाग मौजूद है। सभी प्राणी एक दूसरे से खाद्य शृंखला द्वारा सम्बन्धित है। आज विश्व में कई जंगली प्रजातियों अस्तित्व के संकट का सामना कर रही हैं और कई विलुप्त होने की कगार पर है। इन सबके लिये अवैध शिकार, घटते वन्य क्षेत्र, घरेलू पशुओं द्वारा चराई और अवैध रूप से निर्यात जिम्मेदार है।

इन सब में पक्षियों की घटती जनसंख्या सबसे ज्यादा चिन्ताजनक हैं। क्योंकि पक्षी अनेक प्रकार की पारिस्थितिकी सेवाएँ प्रदान करते हैं। पक्षियों का एक पीड़ित जाति है गिद्ध। जिसे पूर्व काल में जटायू के नाम से जाना जाता है। यद्यपि गिद्ध जाति अवैध शिकार के खतरों से बची रहती है तथापि परोक्ष रूप से मानव जाति के प्रकोप का भाजन होती है।गिद्ध वो पक्षी है, जो एवरेस्ट से भी अधिक ऊंचाई पर उड़ान भर सकता है।

इतनी ऊंचाई पर दूसरे पक्षी ऑक्सीजन की कमी से मर जाते हैं। पारिस्थितिकी तंत्र में गिद्ध की अहम भूमिका है। मुर्दा जीव-जंतुओं को खाकर गिद्ध प्राकृतिक सफाई दारोगा की भूमिका निभाते हैं।पर्यावरण को साफ-सुथरा रखने वाले गिद्धों के अस्तित्‍व पर संकट गहराता जा रहा है। यदि इनकी लुप्‍त होती प्रजाति को बचाया नहीं गया तो महामारी का खतरा भी उत्‍पन्‍न हो जाएगा।

गिद्ध एक ऐसी प्रजाति है जो सड़े गले मांस को चट कर प्रकृति को स्वच्छ बनाने में सबसे अहम भूमिका निभाती है। अस्सी के दशक में भारतीय उपमहादीप में गिद्दों की संख्या साढे आठ करोड़ हुआ करती थी। भारत में गिद्धों की करीब नौप्रजातियां हैं। फिलहाल इन प्रजातियों पर संकट गहराया है। यही वजह है कि पिछले तीन दशक में भारतीय उपमहादीप में अब गिद्धों की संख्या घटकर चार लाख से भी कम हो गयी है। गिद्धों की आर्टीफिशयल ब्रीडिंग के जो प्रोग्राम भारत सरकार द्वारा जारी किए गए हैं, वह जगह-जगह चल रहे हैं।

पहले कॉर्बेट में दो स्थानों पर आर्टिफिशियल ब्रीडिंग होती थी, रिगोड़ा में यह साइट खत्म हो चुकी है, लेकिन ढेला से लगे मालधन क्षेत्र में आज भी इनकी नेस्टिंग है। भारत मे पायी जाने वाली सेलेंडर बिल वल्चर और व्‍हाइट बैंक सबसे ज्यादा खतरे में है। पहाड़ पर डायक्लोफेनक का इस्तेमाल न होने के कारण यह कुछ बेहतर हालत में हैं। कॉबेट के जंगलों में इनको देखा गया है। सर्दियों में यह पहाड़ से नीचे आ जाया करते हैं। 

इनको बचाये जाने की कवायद में लोगों को जागरूक होना होगा। बता दें कि गिद्धों का संरक्षण नहीं किया गया तो हैजा, प्लेग के अलावा अन्य महामारी का खतरा मानव जीवन पर बना रहेगा। इसलिए इनके संरक्षण के लिए सभी को आगे आना होगा। त्रेता युग में एक जटायु ने रावण के चंगुल से मा सीता को छुड़ाने के लिए जान की बाजी लगा दी थी। कलयुग में उसी गिद्ध प्रजाति के वजूद पर बन आई है।

वन विभाग की गणना में अलीगढ़ में गिद्धों की संख्या पहली बार शून्य पाई गई है। बीते साल तीन सफेद गिद्ध पाए गए थे। विडंबना देखिए, जीव-जंतुओं के सड़े-गले मांस को खाकर पर्यावरण को बचाने वाले गिद्धों की मौत पर कहीं-कोई विलाप नहीं हो रहा।  यह सार्वभौम सच है कि जीवन के लिए वन जरूरी है। वन रहेंगे तभी धरती पर जीवों का संतुलन संभव है।

इधर शहरीकरण से जंगल उजड़ रहे हैं, फलस्वरूप वन्य जीवों के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया है। प्रकाशित सर्वे के मुताबिक, देश में 6,000 सफेद पूंछ वाले, 12,000 लंबी गर्दन वाले और 1,000 बेलनाकार गर्दन वाले गिद्ध बचे थे. सर्वे के मुताबिक, में कहा कि गिद्धों की संख्या में बहुत तेजी से कमी आई है. इस तरफ सबसे पहले 90 के दशक के मध्य में ध्यान दिया गया. साल 20017 तक इनकी संख्या में 99 फीसदी कमी आ चुकी थी. साल 2020 मे पाया गया कि सफेद पूंछ वाले गिद्धों की संख्या घटनी थम गई है, लेकिन लंबी गर्दन वाले गिद्ध लगातार घट रहे हैं।

दशकों पूर्व इस जिले में जिन वन्य जीवों का अधिकता रही, अब वे विलुप्त होने के कगार पर है। इसके संरक्षण को लेकर किये जा रहे विभागीय व प्रशासनिक दावे कागजी साबित होने लगे हैं। पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखने के गिद्धों की बड़ी भूमिका होती है। सरकार को इनके संरक्षण के लिए कार्य करने की जरूरत है। ताकि आने वाली पीढ़ी भी गिद्धों को देख सके।

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