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तुंगनाथ मंदिर की जर्जर हालत पर उठे सवाल

26/06/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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‘डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
देवों के देव महादेव के वैसे तो कई मंदिर है लेकिन, उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित तुंगनाथ विश्व का सबसे ऊंचा शिव मंदिर है। मान्यता है कि इस स्थान पर भगवान शिव की भुजाएं है। इस मंदिर के वर्णन महाभारत से लेकर रामाणय काल तक में मिलता है उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में तृतीय केदार भगवान तुंगनाथ मंदिर लगातार झुक रहा है, जिससे मंदिर के अस्तित्व पर संकट पैदा हो गया है. हालांकि मंदिर समिति ने तुंगनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए कवायद तेज कर दी है. एशिया की सबसे ऊंचाई पर स्थित शिव मंदिर भू धंसाव से लगातार एक तरफ झुक रहा है. मंदिर के दीवारों पर मोटी मोटी दरारें आ गई हैं. जबकि मंदिर के सभा मंडप में छत से पानी रिस रहा है. स्थानीय तीर्थ पुरोहित लम्बे समय से मंदिर के जीर्णोद्धार की मांग कर रहे हैं. लेकिन उनका कहना है कि यहां निर्माण कार्यों में वन अधिनियम आड़े आ रहे हैं, जिससे मंदिर का जीर्णोद्धार नहीं हो पा रहा है.पंच केदारों में एक तृतीय केदार भगवान तुंगनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार को लेकर मंदिर समिति ने कवायद तेज कर दी है. श्री बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष अजेन्द्र अजय ने कहा कि तुंगनाथ मंदिर में भू धंसाव से मंदिर को हो रहे नुकसान उनके संज्ञान में है और मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए गत वर्ष उनके द्वारा जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया व र्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया से अध्ययन करवाया गया, जिसकी रिपोर्ट मंदिर समिति के पास आ गई हैं. जबकि सीबीआरआई रुड़की की टीम ने भी तुंगनाथ मंदिर का अध्ययन किया है. इन टीमों की अध्ययन रिपोर्ट में जो भी सुझाव-सलाह होगी उसके आधार पर ट्रीटमेंट का कार्य आरम्भ किया जायेगा. उत्तराखंड के चमोली जनपद में गोपेश्वर से लगभग 40 किमी दूर चौपता स्थिति तुंगनाथ मंदिर की हालत लगातार चिंताजनक होती जा रही है। मंदिर का एक हिस्सा जर्जर अवस्था में पहुंच चुका है और स्थानीय पुजारियों के अनुसार वह कभी भी गिर सकता है। बावजूद इसके, अब तक शासन-प्रशासन और संबंधित  रख रखाव करने वाली समिति की ओर से कोई ठोस पहल नहीं की गई है। मंदिर से जुड़े पंच पुरोहित अध्यक्ष ने बताया कि हर वर्ष यहां आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन मंदिर की सुरक्षा और संरक्षण के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं नहीं हो पा रही हैं। उनका कहना है कि मंदिर की दीवारों और संरचना में दरारें बढ़ती जा रही हैं, जिससे बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया है और कभी भी कोई बड़ा हादसा यहाँ हो सकता है।श्री मैठाणी ने सरकार और रख – रखाव करने वाली मंदिर समिति से मांग की है कि त्वरित निरीक्षण कर मंदिर के संरक्षण और मरम्मत कार्य शुरू किए जाएं, ताकि देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं की आस्था के इस केंद्र को सुरक्षित रखा जा सके। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में बड़ा नुकसान हो सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि अब तक न तो यहाँ कभी क्षेत्रीय विधायक आये और न ही सरकार का कोई मंत्री मंदिर की स्थिति देखने पहुंचा है। उनका कहना है कि तुंगनाथ मंदिर समिति द्वारा करोड़ों रुपये की राशि सरकार को दी जा रही है, लेकिन मंदिर के रखरखाव पर एक रुपया भी खर्च नहीं किया जा रहा। श्री मैठाणी ने कहा कि मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के बैठने के लिए दरी तक की व्यवस्था नहीं है, जबकि हर वर्ष लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मंदिर समिति की ओर से बुनियादी सुविधाओं पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। उन्होंने कैंची धाम का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां तेजी से व्यवस्थाएं विकसित की गईं और वन क्षेत्र से संबंधित समस्याओं का भी समाधान हुआ, लेकिन तुंगनाथ मंदिर के संरक्षण और विकास के लिए अब तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई । हाल ही में हुए घटनाक्रम में, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अधिकारियों ने केंद्र सरकार को अपनी महत्वपूर्ण खोजों से अवगत कराया है और इस पूजनीय तीर्थस्थल को संरक्षित स्मारक की श्रेणी में शामिल करने का आग्रह किया है। मंगलवार को एक अधिकारी ने बताया कि इसके परिणामस्वरूप, सरकार ने इसे राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। आवश्यक प्रक्रियाओं का पालन करने के लिए, जनता से आपत्तियां आमंत्रित करने हेतु एक अधिसूचना जारी की गई है।इस बीच, एएसआई क्षति के मूल कारण की गहन जांच कर रहा है, तत्काल मरम्मत की संभावना तलाश रहा है और साथ ही जमीन धंसने की संभावना पर भी विचार कर रहा है, जिसके परिणामस्वरूप मंदिर के संरेखण में बदलाव हो सकता है।आगे होने वाली किसी भी गतिविधि पर सटीक नज़र रखने के लिए, अधिकारियों ने मुख्य मंदिर की दीवारों पर कांच के तराजू लगा दिए हैं। ये आधुनिक तराजू मामूली से मामूली बदलाव को भी मापने में सक्षम हैं।आठवीं शताब्दी में कात्युरी शासकों द्वारा निर्मित तुंगनाथ मंदिर, स्थापत्य कला का एक अद्भुत नमूना है और विश्व का सबसे ऊँचा शिव मंदिर होने का गौरव रखता है। वर्तमान में, यह बद्री केदार मंदिर समिति (बीकेटीसी) के प्रशासन के अधीन है, जिसे लिखित सूचना के माध्यम से इस स्थिति के बारे में औपचारिक रूप से सूचित कर दिया गया है।इस मामले पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए बीकेटीसी के पूर्ववर्ती अध्यक्ष ने बताया कि एएसआई द्वारा प्रस्तावित प्रस्ताव पर हाल ही में हुई बोर्ड बैठक में चर्चा हुई थी। हालांकि, बैठक में उपस्थित सभी हितधारकों ने सर्वसम्मति से इस विचार को खारिज कर दिया। इसके बावजूद, समिति मंदिर के स्वामित्व को बरकरार रखते हुए, इसके जीर्णोद्धार के लिए एएसआई की विशेषज्ञता प्राप्त करने के लिए तैयार है। इस संबंध में आधिकारिक प्रतिक्रिया जल्द ही एएसआई को भेज दी जाएगी। बता दें कि तृतीय केदार भगवान् तुंगनाथ करोड़ों सनातनियों व हिन्दू धर्मावलंबियों की आस्था का केन्द्र है. मंदिर के अस्तित्व पर बढते संकट को लेकर श्रद्धालु भी चिंतित हैं. बहरहाल तुंगनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार जल्दी होगा मंदिर समिति ने ऐसा भरोसा दिया है. देवों के देव महादेव के पंच केदारों में से एक तुंगनाथ अन्य केदारों की तुलना विशेष महत्ता इसलिए रखता है क्योंकि यह स्थान भगवान राम से भी जुड़ा हुआ है। कहते हैं कि यहां रामचंद्र ने अपने जीवन के कुछ क्षण एकांत में बिताए थे।पंचकेदारों में द्वितीय केदार के नाम प्रसिद्ध तुंगनाथ की स्थापना कैसे हुई, यह बात लगभग किसी शिवभक्त से छिपी नहीं। कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध के बाद पांडव अपनों को मारने के बाद व्याकुल थे। इस व्याकुलता को दूर करने के लिए वे महर्षि व्यास के पास गए। व्यास ने उन्हें बताया कि अपने भाईयों और गुरुओं को मारने के बाद वे ब्रह्म हत्या के कोप में आ चुके हैं। उन्हें सिर्फ महादेव शिव ही बचा सकते हैं। मान्यताओं के अनुसार, इस स्थान पर रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी। वहीं, भगवान राम ने जब रावण का वध किया था उसके बाद भगवान राम तुंगनाथ से डेढ़ किलोमीटर दूर चंद्रशिला पर आकर ध्यान किया और वहां कुछ वक्त अकेले बिताया था। मान्यता है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के साथ साथ पंच केदार की यात्रा कर लेता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। साथ ही भगवान शिव की भी असीम कृपा ऐसे लोगों पर बनी रहती है। पुराणों में कहा गया है कि रामचंद्र शिव को अपना भगवान मानकर पूजते थे। कहते हैं कि लंकापति रावण का वध करने के बाद रामचंद्र ने तुंगनाथ से डेढ़ किलोमीटर दूर चंद्रशिला पर आकर ध्यान किया था। रामचंद्र ने यहां कुछ वक्त बिताया था। चौदह हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित चंद्रशिला पहुंचकर आप विराट हिमालय की सुदंर छटा का आनंद ले सकते हैं। ब्रिटिश शासनकाल में कमिश्नर एटकिन्सन ने कहा था कि जिसने अपने जीवन में चोपता नहीं देखा, उसका जीवन व्यर्थ है. लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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