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खतरा बना एंटीबायोटिक का दुरुपयोग

17/02/26
in उत्तराखंड, देहरादून, हेल्थ
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
मनुष्यों और जानवरों में एंटीबायोटिक दवाओं के दुरुपयोग/अति प्रयोग में तेजी आई है। चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्राजील, भारत और जर्मनी खाद्य-पशु उत्पादन में वैश्विक रोगाणुरोधी खपत के सबसे बड़े हिस्से के साथ अग्रणी पांच देश हैं। इसलिए, रोगाणुरोधी प्रतिरोध एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या के रूप में उभरा है जो विश्व स्तर पर स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों पर भारी पड़ रहा है। वास्तव में, रोगाणुरोधी प्रतिरोधी संक्रमण हर साल लगभग 7,00,000 मानव मृत्यु का कारण बन रहे हैं। इसके अलावा, डब्ल्यूएचओ के अनुसार, दवा प्रतिरोधी रोग 2050 तक हर साल 10 मिलियन लोगों की मौत का कारण बन सकते हैं। दुर्भाग्य से, दवा प्रतिरोधी सुपरबग जीवाणु संक्रमण के खिलाफ लड़ाई में बढ़त हासिल करने की धमकी देते हैं। एंटीमाइक्रोबायल्स का प्रतिरोध 2030 तक 24 मिलियन लोगों को अत्यधिक गरीबी में मजबूर कर सकता है। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, हम एक ऐसे युग में प्रवेश कर रहे हैं जहां साधारण संक्रमण का इलाज भी असंभव हो जाएगा। तो, आइए हम रोगाणुरोधी और रोगाणुरोधी प्रतिरोध और रोगाणुरोधी प्रतिरोध क्यों होता है, इसे समझने के लिए गहराई से जाएं। आज दुनिया के सामने खड़े सबसे गंभीर, लेकिन सबसे कम समझे गए या जा रहे सार्वजनिक स्वास्थ्य संकटों में से एक है। यह समस्या धीरे-धीरे उपचार के आधार को कमजोर कर रही है। बैक्टीरिया, वायरस, फंगस और परजीवी जब दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं, तब सामान्य संक्रमण भी जानलेवा बन सकते हैं। भारत जैसे विकासशील देशों पर इसका असर और भी गहरा है, जहां संक्रमण का बोझ अधिक और स्वास्थ्य संसाधन सीमित हैं।2019 में दुनिया भर में लगभग 50 लाख मौतें एएमआर से जुड़ी थीं। यदि वर्तमान में हम इसे लेकर जागरूक नहीं हुए और इस पर नियंत्रण नहीं किया, तो भविष्य में यह संख्या प्रतिवर्ष एक करोड़ तक पहुंच सकती है। यह संकट इसलिए भी खतरनाक है, क्योंकि इसके लक्षण धीरे-धीरे सामने आते हैं, जब उपचार बेअसर होने लगता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।प्रधानमंत्री यह कहते रहे हैं कि चिकित्सकीय परामर्श के बिना एंटीबायोटिक का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। यह अपील इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि आम सर्दी-खांसी, बुखार या वायरल संक्रमण जैसे कई रोग स्वयं ठीक हो जाते हैं, जिनमें एंटीबायोटिक का कोई रोल नहीं होता। इसके बावजूद दवाओं का अनावश्यक और तर्कहीन उपयोग हमारे समाज में आम व्यवहार बन चुका है। इस तरह का अंधाधुंध प्रयोग सूक्ष्म जीवों को और अधिक प्रतिरोधी बनने का अवसर देता है, जिससे भविष्य में जीवन रक्षक दवाएं असरहीन हो सकती हैं।यह स्थिति इसलिए चिंताजनक है, क्योंकि जिस गति से सूक्ष्म जीव प्रतिरोधी बन रहे हैं, उस अनुपात में नई एंटीबायोटिक दवाएं विकसित नहीं हो रहीं। पिछले लगभग दो दशकों में एंटीबायोटिक्स की कोई नई प्रमुख श्रेणी सामने नहीं आई है। एक नई एंटीबायोटिक दवा विकसित करना 15 से 20 वर्षों का लंबा, जटिल और अत्यंत महंगा कार्य है। भारी निवेश के बावजूद आर्थिक प्रतिफल सीमित रहता है। यही कारण है कि फार्मास्युटिकल कंपनियां इस क्षेत्र में बड़े निवेश से कतराती हैं।सरकार ने एएमआर को रोकने के लिए कई स्तरों पर कार्ययोजना बनाई है। राष्ट्रीय कार्ययोजना के तहत निगरानी प्रणाली को मजबूत किया जा रहा है, ताकि दवा प्रतिरोध के रुझानों पर समय रहते नजर रखी जा सके। एंटीबायोटिक की ओवर-द-काउंटर बिक्री पर नियंत्रण, अस्पतालों में एंटीमाइक्रोबियल स्टूअर्डशिप कार्यक्रम और प्रयोगशाला आधारित जांच को बढ़ावा देना इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं। पशुपालन, कृषि और मत्स्य पालन में एंटीबायोटिक के उपयोग को नियंत्रित करने के प्रयास भी सरकार की वन हेल्थ रणनीति का हिस्सा हैं, जो मानव, पशु और पर्यावरण के स्वास्थ्य को एक-दूसरे से जुड़ा मानती है।इस लड़ाई में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन भी अहम भूमिका में है। आइएमए देश भर के चिकित्सकों को एएमआर के प्रति जागरूक करने, जिम्मेदार प्रिस्क्रिप्शन को बढ़ावा देने और आम जनता तक सही संदेश पहुंचाने में सक्रिय जिम्मेदारी निभा रहा है। आइएमए की एएमआर कमेटी लगातार यह चेतावनी देती रही है कि एंटीबायोटिक का दुरुपयोग केवल इलाज को मुश्किल नहीं बनाता, बल्कि पूरी पीढ़ी के लिए खतरा पैदा करता है। आम तौर पर एंटीबायोटिक प्रतिरोध (एंटीमिक्रोबियल रेजिस्टेंस/ एएमआर) को अस्पताल और दवा के दुरुपयोग से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन यह खतरा अब हमारे शहरों की नदियों, सीवेज और भूजल तक पहुंच चुका है।हाल के शोध बताते हैं कि जल संकट, जो लंबे समय से मात्रा और उपलब्धता के संदर्भ में चर्चा में रहा है, अब धीरे-धीरे एक गंभीर स्वास्थ्य संकट का रूप ले रहा है, वो भी एंटीबायोटिक दवाओं की वजह से। रिपोर्ट इस बात की गवाही दे रहे हैं कि अब नालों और सीवेज का गंदा पानी न केवल बीमारियां फैला रहा है, बल्कि दवाओं को भी बेअसर बना रहा है। एंटीबायोटिक का सबसे अधिक दुरुपयोग मानव स्वास्थ्य की रक्षा के बजाय पशुओं, फल और सब्जियों की ग्रोथ बढ़ाने में हो रहा है।इस संकट का एक गंभीर पहलू पर्यावरण और नदियों से भी जुड़ा है। मानव गतिविधियों, अस्पतालों के अपशिष्ट, औद्योगिक कचरे, फार्मों से बहकर आने वाले एंटीबायोटिक अवशेष और पशुओं के मल-मूत्र के कारण नदियां, तालाब और भूजल भी एएमआर से संक्रमित हो रहे हैं। कई नदियों में रेजिस्टेंट बैक्टीरिया और एंटीबायोटिक अवशेष पाए जाने की चेतावनियां विशेषज्ञ लगातार दे रहे हैं। ये एएमआर का सक्रिय वाहक बनते जा रहे हैं, जो पानी, मिट्टी और खाद्य शृंखला के जरिये मानव तक यह खतरा पहुंचा रहा है। इससे भोजन शृंखला दूषित और जल स्रोत संक्रमित हो रहे हैं। सामान्य जल शोधन प्रणालियां एएमआर को छानने में सक्षम नहीं हैं, जिससे यह पानी के जरिये भी मानव शरीर में प्रवेश कर रहा है।एएमआर के खिलाफ लड़ाई केवल डाक्टरों या सरकार की नहीं, बल्कि समाज की साझा जिम्मेदारी है। जब तक आम नागरिक इस खतरे को नहीं समझेंगे, तब तक नीतियां और नियम सीमित असर ही दिखा पाएंगे। एंटीबायोटिक का उपयोग केवल योग्य चिकित्सकों की पर्ची पर होना चाहिए। दवाओं की पूरी खुराक और सही अवधि का पालन जरूरी है। ओवर-द-काउंटर बिक्री पर लगे प्रतिबंधों का सख्ती से पालन होना चाहिए।स्वच्छता, साफ-सफाई, सुरक्षित पानी और व्यापक टीकाकरण संक्रमण को रोकने के सबसे प्रभावी साधन हैं। बेहतर डायग्नोस्टिक सुविधाओं से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि सही बीमारी में सही दवा दी जाए। साथ ही एंटीमाइक्रोबियल अनुसंधान और नवाचार के लिए सरकारी निवेश और प्रोत्साहन बढ़ाना समय की मांग है। अंततः एएमआर केवल एक चिकित्सकीय समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और नीतिगत चुनौती है। आज एंटीबायोटिक्स का जिम्मेदार उपयोग ही यह तय करेगा कि आने वाली पीढ़ियों के पास इलाज के प्रभावी विकल्प बचेंगे या नहीं। नई एंटीबायोटिक दवाओं में निवेश करने के लिए कंपनियों को प्रोत्साहित करने के लिए जी-7 सरकारें आज जो कर रही हैं, वह महत्वपूर्ण तो है लेकिन पर्याप्त नहीं। दवाओं के इस वर्ग को दो अनिवार्यताओं द्वारा परिभाषित किया गया है। एक, उनका उपयोग सीमित होना चाहिए। दुरुपयोग और अति प्रयोग ही एएमआर की समस्या पैदा कर रहा है। इन जीवन रक्षक दवाओं का संरक्षण किया जाना चाहिए जिसका अर्थ है सावधानीपूर्वक, प्रतिबंधित उपयोग, भले ही मुनाफे में कमी हो। दूसरा, इन दवाओं तक सबकी पहुंच सुनिश्चित की जानी है।इसका मतलब है कि दवाओं को सस्ता करना होगा जो दवा कंपनियों के अधिकतम मुनाफे के फलसफे के खिलाफ जाता है। अब समय आ गया है कि एंटीबायोटिक्स को वैश्विक सार्वजनिक वस्तु के रूप में देखा जाए। इसके लिए शायद फार्मास्युटिकल कंपनियों के मुनाफे पर नए कर लगाने होंगे। यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि सार्वजनिक अनुसंधान का उपयोग आम जनता की भलाई के लिए किया जाए।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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