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उत्तराखंड में इंसान ही नहीं वन्यजीवों को भी है डॉक्टरों का टोटा

20/12/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
पहाड़ों पर अक्सर डॉक्टरों की कमी की खबरें सुनने में आती रही है. ये कमी सिर्फ इंसानों के लिए ही नहीं बल्कि वन्यजीवों के लिए भी है. हैरानी की बात ये है कि उत्तराखंड वन विभाग के पास वेटरनरी चिकित्सकों (का ढांचा ही नहीं है. ऐसे में वन विभाग को पशुपालन विभाग के डॉक्टरों पर ही निर्भर रहना पड़ता है.इंसान ही नहीं उत्तराखंड में जंगली जानवर के लिए भी चिकित्सकों की कमी महसूस हो रही है. दरअसल राज्य स्थापना के इतने सालों बाद भी वन महकमे में वाइल्डलाइफ की सेहत के लिए चिकित्सकों की स्थाई व्यवस्था नहीं हुई है. हालात ये है कि जब तक पशु चिकित्सक वन्यजीवों पर काम का अनुभव हासिल कर पाते हैं, तब तक उन पर प्रतिनियुक्ति खत्म होने की तलवार लटकने लगती है. फिलहाल यह बात इसलिए भी चर्चाओं में आई है, क्योंकि राज्य में इन दिनों वन्यजीवों के साथ इंसानों का संघर्ष चरम पर पहुंच गया हैगढ़वाल में चमोली और उत्तरकाशी से लेकर कुमाऊं के नैनीताल और पिथौरागढ़ तक वन्यजीवों के हमले सुर्खियों में बने हुए हैं. इस दौरान शिकारी जानवरों को रेस्क्यू करने का बेहद अहम काम भी जारी है. खास बात ये है कि इसके लिए एक्सपर्ट के तौर पर पशु चिकित्सक अहम रोल निभाते हैं. लेकिन वन विभाग के पास पर्याप्त संख्या में पशु चिकित्सक मौजूद ही नहीं हैं. हालत यह है कि शिकारी वन्यजीवों को ट्रेंकुलाइज करने का काम गैर चिकित्सकों से भी करवाया जा रहा है. जबकि इन्हें बेहोश करने के लिए ड्रग का इस्तेमाल चिकित्सकों की निगरानी में ही किया जा सकता है.  वन विभाग में चिकित्सकों की मौजूदगी को देखें तो इस वक्त राज्य भर में कुल आठ पशु चिकित्सक ही मौजूद हैं. इसमें चार पशु चिकित्सक गढ़वाल तो 04 कुमाऊं मंडल में तैनात किए गए हैं. गढ़वाल में 01 चिकित्सक राजाजी टाइगर रिजर्व में, 02 चिकित्सक चिड़ियापुर वानर बंध्याकरण केंद्र में और एक चिकित्सक देहरादून चिड़ियाघर में तैनात किया गया है. ये पशु चिकित्सक मसूरी और देहरादून डिवीजन की भी जिम्मेदारी संभालते हैं. इसी तरह कुमाऊं मंडल में एक चिकित्सक कॉर्बेट टाइगर रिजर्व, 01 चिकित्सक नैनीताल चिड़ियाघर, 01 रानीबाग, अल्मोड़ा के वानर बंध्याकरण केंद्र में और 01 चिकित्सक पश्चिमी वृत्त हल्द्वानी में तैनात है. ऐसा नहीं है कि वन विभाग को पशु चिकित्सकों की जरूरत महसूस नहीं हो रही, बल्कि विभाग ने तो इनके अतिरिक्त 05 पशु चिकित्सकों की जरूरत पहले भी जाहिर की थी. लेकिन पशुपालन विभाग खुद ही पशु चिकित्सकों की कमी से जूझ रहा है. ऐसे में उनके द्वारा वन विभाग को प्रतिनियुक्ति पर पशु चिकित्सक दिया जाना मुमकिन नहीं दिखाई दे रहा. वन विभाग को एक चिकित्सक की जरूरत अल्मोड़ा और बागेश्वर, एक चिकित्सक पिथौरागढ़ और चंपावत, एक पशु चिकित्सक गढ़वाल फॉरेस्ट डिवीजन और रुद्रप्रयाग फॉरेस्ट डिवीजन में, 01 पशु चिकित्सक गंगोत्री राष्ट्रीय पार्क और उत्तरकाशी डिवीजन के साथ ही 01 पशु चिकित्सक की जरूरत केदारनाथ वन्यजीव प्रभाग के साथ चमोली में भी पड़ती दिख रही है. यहां पर अब तक कोई भी पशु चिकित्सक तैनात नहीं है. जंगलों में वन्यजीवों की सेहत के लिए पशु चिकित्सकों की जरूरत विभिन्न योजनाओं और कार्यों के लिए दिखाई देती है. इसमें फिलहाल दवा का उपयोग करते हुए शिकारी वन्यजीवों को ट्रेंकुलाइज करने की जरूरत सबसे ज्यादा है. इसके अलावा घायल होने वाले वन्य जीवों के इलाज, बंदरों के बंध्याकरण स्कीम और चिड़ियाघर में मौजूद वन्य जीवों की सेहत की निगरानी भी इन्हीं पशु चिकित्सकों द्वारा की जाती है. : जंगलों में उनकी भूमिका यहीं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि टाइगर ट्रांसलोकेशन के काम से लेकर उनकी गिनती तक में भी पशु चिकित्सकों की अहम भूमिका है. जंगली जानवरों के व्यवहार को समझना हो, या फिर उनके इलाज की बात हो, सब जगह तकनीकी रूप से एक्सपर्ट के तौर पर यही पशु चिकित्सक काम आते हैं. इतना ही नहीं फॉरेस्ट हेल्थ प्रोग्राम के तहत इंसानों से जंगली जानवरों और जंगली जानवरों से इंसानों को होने वाली बीमारी या वायरस पर भी इन्हीं पशु चिकित्सकों द्वारा अध्ययन किया जाता है. कुल मिलाकर इनकी जरूरत जंगलों में बेहद ज्यादा है और मौजूदगी बेहद कम. हैरानी की बात यह है कि वन विभाग के कर्मचारियों द्वारा ही कई जगहों पर इस तरह के काम किए जाते हैं, जो कि पशु चिकित्सक द्वारा ही होने चाहिए. यह सब उनसे ट्रेनिंग की बदौलत करवाया जा रहा है, जो केवल 8 दिन की ही हुई है. दरअसल पूर्व में वन विभाग के करीब 122 लोगों को वन्यजीवों को लेकर ट्रेनिंग दी गई थी. इसमें फौरी तौर पर वन्य जीवों के व्यवहार और उनकी रेस्क्यू से जुड़े कामों की जानकारी उन्हें दी गई थी.  ऐसा भी नहीं है कि वन विभाग के पास इसका हल ना हो. वन विभाग में मौजूद आठ पशु चिकित्सक महकमें में ही समायोजित किए जाने से जुड़ा पत्र मुख्यालय को लिख चुके हैं, जो कि फिलहाल शासन में विचाराधीन है. सरकार के पास मध्य प्रदेश की तरह ही वन विभाग में पशु चिकित्सकों का एक अलग कैडर बनाने का भी विकल्प मौजूद है, लेकिन राज्य स्थापना के 25 साल बाद भी, ना तो विभाग में वाइल्डलाइफ की सेहत के लिए स्थाई समाधान हो पाया है और ना ही ऐसा करने की दिशा में कोई ठोस पहल होती दिखाई दे रही है. बड़ी बात यह है कि पशु चिकित्सक खुद यह लिख चुके हैं कि उन्हें मौजूदा पदों पर ही समायोजित करते हुए भविष्य में इन्हीं पदों पर इंक्रीमेंट दे दिया जाए. यानी ना तो यह पशु चिकित्सक पद बढ़ाने की मांग कर रहे हैं और ना ही किसी अलग ढांचे की. इसके बावजूद भी इनके समायोजन में कहां अड़चन है, यह विभाग भी नहीं बता पा रहा. वन्यजीवों की सुरक्षा खासकर हाथी ,बाघ ,तेंदुए पर मोटी रकम खर्च की जाती है लेकिन इतने सालों में वन्यजीवों की सेहत दूसरे विभाग के रहमोकरम पर चल रही है. उनके इलाज के लिए वन विभाग के पास डॉक्टर्स तक नहीं है. वाइल्ड लाइफ के लिहाज से उत्तराखंड वैसे तो बेहद धनी राज्य है. लेकिन वाइल्ड लाइफ की यही संपन्नता यहां की मुसीबत का कारण भी बनी है. दरअसल मानव वन्यजीव संघर्ष का दौर उत्तराखंड में शुरू से ही रहा है. वन्यजीवों की बाहुल्यता राज्य के लिए उत्साही विषय तो रहा है, लेकिन यहां वन्यजीवों के इंसानों पर बढ़ते हमले भी चिंता का सबब रहे हैं. गौर करने वाली बात यह रही है कि राज्य स्थापना के बाद पिछले 25 सालों में न केवल वन्यजीवों के हमले बढ़ने के संकेत मिले हैं,  मंशा ये है कि जब भी क्षेत्र में जरूरत पड़े तो इन्हें वाइल्डलाइफ में भी लाया जाए. हालांकि, वन विभाग के अंतर्गत इनका सहयोग बहुत ज्यादा नहीं दिखाई देता है. *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं*

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