देहरादून, 5 मार्च, 2026.दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र में मासिक कार्यक्रम खबरपात के तहत आज शाम दून घाटी की जैव विविधता के परिदृश्य और उसकी वर्तमान चुनौतियों पर एक सार्थक बातचीत का कार्यक्रम किया गया. केन्द्र के सभागार में आयोजित इस बातचीत में घुमक्कड़, प्रकृति प्रेमी और पर्यावरण कार्यकर्ता श्री अजय शर्मा ने देहरादून घाटी तथा उसके समीपवर्ती स्थानों के परिवेश में उपलब्ध जंगल, जंगली फल-फूल,शाक सब्जियां और पक्षियों पर गहनतम जानकारी श्रोताओं के सम्मुख रखीं.
कार्यक्रम के संचालक वरिष्ठ पत्रकार त्रिलोचन भट्ट से की गयी बातचीत के सवालों के उत्तर में अजय शर्मा ने बताया कि दून घाटी जिसमें देहरादून शहर भी स्थित है, अपनी जैव विविधता के लिए विशेष पहचान रखता है। तकरीबन सौ किलोमीटर लंबी और लगभग तीस किलोमीटर चौड़ी इस घाटी के पूर्वी किनारे पर गंगा और पश्चिमी छोर पर यमुना जैसी महत्वपूर्ण नदियां बहती हैं।इसके इतर इस भू -भाग में हिमालय के पाद प्रदेश और शिवालिक की उत्तरी ढलान से लगभग चौदह सदानीरा,जल धाराएं छोटी बड़ी नदियों के रूप में निकलती हैं जो कि गंगा और यमुना में मिलने के साथ-साथ इस घाटी की जैव विविधता को समृद्ध करने का काम करती हैं।शिवालिक हिमालयी परिवेश में विस्तृत साल के जंगल और हिमालय की तलहटी में फैले मिश्रित वन तथा दून घाटी के मैदानों में स्थित विविध पेड़ और झाड़ियां इसे जैविक रूप से अतिविशिष्ट बनाती हैं।
उन्होंने आज की बातचीत को महत्वपूर्ण करार देते हुए कहा कि यह सार्थक विषय मूलतः दून घाटी की समृद्ध जैव विविधता व विकास से उपजी उसकी चुनौतियों को लेकर है। अंग्रेजों के आने से पहले का वन स्वरूप और उसका प्रबंधन और स्थानीय समाज द्वारा वन उपज का उपयोग,विभिन्न प्रकार के जंगली फलों और शाक – सब्जियों का स्थानीय समाजों द्वारा उपयोग आज वर्तमान में भी किया जाता है. अजय शर्मा ने अंग्रेजों के शासन काल में वनों का दोहन किस प्रकार हुआ, उसका घाटी के परिदृश्य पर क्या प्रभाव पड़ा तथा साथ ही साथ अंग्रेजों के माध्यम से आयी वनस्पतियों ने शहर और आसपास के प्राकृतिक परिवेश को किस तरह बदला इस बात की जानकारी भी दी।
बातचीत में कई पूछे सवालों में अजय शर्मा ने यह भी बताया कि दून घाटी में इमारती लकड़ी के लिए साल वृक्ष का सर्वाधिक दोहन किया गया क्योंकि साल चौखट,खिड़कियों की चौखट और छत की कड़ियों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त लकड़ी मानी जाती थी। . दून घाटी में तों यह कहावत भी थी कि “साल सौ साल खड़ा, सौ साल पड़ा और सौ साल सड़ा”। इसके अलावा शीशम, सेंधन, सीरीस आदि का जम कर कटान हुआ।लकड़ी के बर्तन बनाने के लिए गेठी,खेती के उपकरणों के लिए साल, सेंधन का उपयोग होता था।पत्तल बनाने के लिए मालू और मालू की बेल का इस्तेमाल फूस की छत को बांधने के लिए किया जाता था क्योंकि अधिकांश घर फूस के होते थे।फलों के लिए आम,जामुन, पचनाला, ढेउ और बेर की झाड़ियां यहां बहुतायत में उपलब्ध थीं।
श्री अजय शर्मा ने श्रोताओं को यह भी बताया कि इस घाटी में उपलब्ध कई वनस्पतियों जैसे कि सेमल,डोडा,कचनार,लसोड़ा,बांस और तिमले का उपयोग आम तौर पर लोग सब्जी और आचार बनाने के लिए किया करते थे,
आगे श्री शर्मा ने कहा कि आज की बढ़ती विकास प्रक्रिया ने दून घाटी के जैव विविधता व पर्यावरण को प्रभावित किया है इस बात पर गहन चिंता होनी स्वाभाविक है । मानव गतिविधियों व तीव्र विकास प्रक्रिया से उपजे कारणों का दून के भूमिगत जल व प्रवाहित नदियों के जलस्तर पर भी कहीं कहीं पड़ रहा है।
दून घाटी में तीव्र विकास व अन्य निर्माणों से प्राकृतिक जैव विविधता व जल संसाधनों विनाश से खत्म होेने की कगार पर आ गये हैं।
संचालन करते हुए त्रिलोचन भट्ट ने कहा कि नीतियां बनाते समय स्थानीय पर्यावरण और जैव विविधता को समझना और उनके हिसाब से योजना बनाना बहुत जरूरी बात होगी । अन्त में कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने देहरादून के पर्यावरण को लेकर कई सवाल भी पूछे और अपनी जिज्ञासा का समाधान लिया.
इस अवसर पर कई पर्यावरण प्रेमी सहित, प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. हरि सुमन बिष्ट, अरुण कुमार असफल, मदन मोहन कण्डवाल, डॉ. लालता प्रसाद, सुन्दर सिंह बिष्ट, श्रीमती मिन्नी, जगदीश महर, इन्द्रेश मैखुरी,विजय भट्ट, कुल भूषण, आलोक कुमार, जगदीश बाबला , डॉ. वी. के डोभाल,योगेन्द्र सिंह नेगी, मोहित, अरविन्द, एस.के. गुप्ता व केन्द्र के कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी, पुस्तकालयाध्यक्ष डॉ. डी. के. पाण्डे आदि मौजूद थे।












