शंकर सिंह भाटिया
एक पहाड़ी गाना है, पहाड़ में काम धाम मैं लीजा शहर, यह ट्रेंड पूरे उत्तराखंड के पहाड़ों में देखा जा रहा है। पहाड़ में गांव के गांव पलायन से खाली हो रहे हैं। पहाड़ से पलायन की इस समस्या का समाधान कोई नहीं ढूंढ पाया है। अल्मोड़ा के रवि टम्टा ने जो उड़ने वाली कार बनाई है, उसके पीछे उनका मन्तव्य यह बताया गया है कि डेढ़ घंटे के सफर को उड़ने वाली कार के जरिये दस मिनट में तय किया जा सकता है। इससे चढ़ाई उतराई, पहाड़ों की खराब सड़कों की समस्या का एक ही झटके में समाधान निकल आएगा। क्या यह संभव है?
रवि टम्टा एक ऐसा नाम है, जिन्होंने बचपन से ही न जाने कितने नवाचार कर पहाड़ की समस्याओं के हल ढूंढने का प्रयास किया है। उनकी वेबसाइट पर ये सभी नवाचार देखने को मिल जाते हैं। नवाचारों के इस क्रम में उड़ने वाली कार नवीनतम और अब तक के नवाचारों में सबसे आकर्षक और अर्थपूर्ण भी है। पहाड़ की परिस्थितियों की गहराई से समझ रखने वाला कोई व्यक्ति इस तरफ कदम बढ़ा सकता है।
उड़ने वाली यह कार इलेक्ट्रिक वाहन है। मतलब यह कि ग्रीन उर्जा से चलने वाला, वातावरण में प्रदूषण न फैलाने वाला वाहन है। इसलिए इसका भविष्य उज्जवल है। अब सवाल यह उठता है कि पहाड़ की कठिन परिस्थितियों को सरल बनाने की मुहिम का हिस्सा बनने वाली यह उड़ने वाली कार सामान्य लोगों के जनजीवन को कब तक आसान बना पाएगी? जिस तरह सड़क पर चलने वाले वाहन अब लोगों के जन जीवन का सामान्य हिस्सा बन गए हैं, उड़ने वाली कार उसी तरह आम आदमी के जनजीवन का हिस्सा बन जाएगी? ऐसा कब तक हो सकेगा? कितने साल लग जाएंगे, यह सब होने में?
इसके बाद एक सवाल खड़ा होगा कि यदि अधिक मात्रा में उड़ने वाले वाहन प्रचलन में आ जाएंगे तो एयर ट्रेफिक कंट्रोल किस तरह हो सकेगा। इसके बिना तो उड़ने वाले वाहनों की आसमान में टकराने की संभावना काफी बढ़ जाएगी, जो समाधान के बजाय एक नई समस्या के रूप में खड़ी हो जाएगी। कहा जाता है कि यदि कोई वस्तु सुविधाजनक होती है तो उसके नुकसान भी होते हैं। इसलिए दोनों पहलुओं पर विचार किए बिना किसी सुविधा से लाभान्वित होना नुकसानदायक हो सकता है।
पहाड़ के इस युवा का नवाचार शानदार और दमदार है। इसमें कोई दोराय नहीं हो सकती है। लेकिन इस नवाचार का जनजीवन में उतारने से पहले इसके सभी पहलुओं की अच्छी तरह से जांच परख करना आवश्यक होगा, तभी इसके लाभ लोगों को मिल पाएंगे।











