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दो सप्ताह की बाल रगमंच कार्यशाला के समापन पर आयोजित हमीद के चिमटे

23/05/23
in उत्तराखंड, देहरादून
Reading Time: 1min read
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देहरादून। वुमन सेल, आइ०क्यू०ए०सी, स्कूल ऑफ़ लैंग्वेजेस, और रंगमंच विभाग दून विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित दो सप्ताह की बाल रगमंच कार्यशाला के समापन पर आयोजित हमीद के चिमटे नाटक का उदघाटन कुलपति महोदया प्रो० सुरेखा डंगवाल, कुलसचिव डॉ मंगल सिंह मन्द्रवाल, प्रो० एच० सी पुरोहित, प्रो० हर्ष डोभाल, डॉ चेतना पोखरियाल ने दीप प्रज्वलित कर नाट्य समारोह का शुभारंभ किया।

इस बाल रंगमंच कार्यशाला की संयोजक डॉ चेतना पोखरियाल विभागाध्यक्ष अंग्रेजी विभाग ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा नाटक का निर्देशन रंगमंच विभाग के अध्यापक डॉक्टर अजीत पँवार ने किया।

हामिद का चिमटा कहानी का सार–

हामिद का चिमटा कहानी कथा सम्राट प्रेमचन्द की प्रसिद्ध कहानी है। कहानी का आरम्भ स्कूल के क्लास से मेले में जाने की तैयारी के साथ शुरू होता है। गाँव में बड़े-बच्चे सभी मेले में जाने की तैयारी में लगे है। बच्चे सबसे अधिक उत्साहित है। बच्चे अपने माता-पिता से जो पैसे पाये हैं उसे बार-बार गिनकर अपने पास रख लेते हैं। इन लड़को में एक छः वर्ष का लड़का हामिद भी है। इसके माता-पिता भगवान को प्यारे हो चुके है और उसका पालन-पोषण उसकी बूढ़ी-गरीब दादी अमीना करती है। अबोध हामिद को बताया गया है कि उसकी माँ भगवान के पास गए है और अच्छी-अच्छी चीजें लेकर आयेगी। उसके पिता रुपये कमाने गये हैं। उसकी दादी को आज पर्व के दिन अपनी गरीबी खल रही है। ईद का दिन है और घर में एक दाना नहीं है। हामिद को अपनी दादी से बीस रुपए हैं जिसे लेकर वह मेले में जाने के लिए उत्साहित है। सभी बच्चे अपने पिता के साथ मेले में जा रहे है और हामिद की दादी को चिन्ता है कि वह इस छोटी-सी जान को मेले में कैसे जाने दें ? कही खो गया तो ? तीन कोस पैदल यह छोटा बच्चा कैसे जायेगा, पर हामिद अपनी दादी से कहता है, ‘तुम डरना नहीं अम्मा, मैं सबसे पहले आऊँगा । बिल्कुल न डरना।’ मुझे कुछ नही होगा। मैं अपने दोस्तों के साथ जा रहा हूं। बच्चे आपस में बातें करते मेले में जा रहे हैं, हामिद भी उनके साथ है । जिन्नात और उसक शक्ति के बारे में सुनकर हामिद को विश्वास हो आता है कि उसके गाँव के चौधुरी के पास जिन्नात के कारण बहुत रुपये-पैसे है। इसी बीच पुलिस लाइन आने पर बच्चे पुलिस की करतूतों पर तर्क वितर्क करते हैं। सहसा बच्चे ईदगाह के पास पहुँचते है जहाँ नमाज पढ़ने वालों की पंक्तियों दूर-दूर तक फैली है। ऐसा लगता है मानो भातृत्व का एक सूत्र इन समस्त आत्माओं को एक सूत्र में पिरोये हुए है। नमाज समाप्त होने पर लोग एक दूसरे के गले मिलते है और बच्चे खिलौनो और मिठाइयों की दुकानों की ओर दौड़ पड़ते है। वे और अपनी-अपनी शक्ति अनुसार खिलौने मिठाइयाँ खरीदते हैं और हिंडोला आदि पर चढ़कर आनन्द लेते हैं। कहानी का नायक हामिद इन सबसे दूर खड़ा है क्योंकि उसके पास मात्र तीन पैसे हैं जिन्हें वह बेकार खर्च करना नहीं चाहता है। हामिद के साथी अपनी पसन्द का खिलौना खरीदते हैं। मोहसिन भिस्ती, नूरे वकील और महमूद सिपाही खरीदते है पर हामिद की अनुभवी आँखें कुछ और ढूंढ रही है। मोहसिन उससे रेवड़ी लेने को कहता है, पर जब हामिद उसके पास जाता है। तो वह रेवड़ी अपने मुँह मे डाल लेता है। हामिद का दिल कचोट कर रह जाता है। मेले में मौत का कुवां दिखाई देता है । जहां पर कलाकार हाथ छोड़कर मोटर सईकिल चलाते है। हामिद लोहे का समान बिकने वाली दुकान पर जाता है और तीस रुपए के चिमटे को मोल-भाव कर बीस रुपए में खरीद लेता है। मन ही मन उसे यह जानकर बहुत खुशी होती है कि चिमटे को देखकर उसकी बूढ़ी दादी बहुत खुश होगी । अब रोटी बनाते समय उसके हाथ नहीं जलेंगे। बच्चे जब आपस मे अपने खिलौने की श्रेष्ठता सिद्ध करने का प्रयास करते हैं तो हामिद अपने तर्क बल पर चिमटे की श्रेष्ठता सिद्ध कर देता है और कहता है, “मेरा बहादुर चिमटा आग में, पानी में, आंधी तूफान में बराबर डटकर खड़ा रहेगा। सब बच्चे जब खिलौने लेकर घर पहुँचते तो आपसी लढाई में सबके खिलौने देखते-देखते टूट गये। भिस्ती की टांग टूट गयी वकील साहब का मिट्टी का चोला मिट्टी में मिल गया। सिपाही की एक टांग भी टूट गयी । बचा केवल हामिद का चिमटा । हामिद जब घर पहुँचा तो उसके हाथ में चिमटा देखकर उसकी दादी ने कहा, “लाया क्या चिमटा ? सारे मेले में तुम्हे और कोई चीज न मिली जो यह चिमटा उठा लाया ।” हामिद ने अपराधी की तरह कहा, “तुम्हारी उंगलियाँ तवे से जल जाती थी इसलिए मैंने इसे लिया ।” बच्चे का अपने प्रति श्रद्धाभाव देखकर बूढ़ी अमीना की आँखें भर आयी और उसका रोम-रोम हामिद को दुआएं देने लगा।

बाल रंगमंच कार्यशाला-

9 मई से 23 मई 2023 तक बाल रंगमंच कार्यशाला का आयोजन किया गया इस कार्यशाला में 5 से 14 वर्ष के बच्चों ने प्रतिभाग किया कार्यशाला का उद्देश्य बच्चों के व्यक्तित्व विकास करना और उनकी छुपी हुई प्रतिभाओं को अभिव्यक्त करवाना है। कार्यशाला में बच्चों को रंगमंच के माध्यम से विभिन्न गतिविधियों को संचालित की गई जिसके माध्यम से बच्चों ने अपने को मंच पर विभिन्न प्रस्तुत किया। कार्यशाला में बच्चों को आंगिक, वाचिक, आहार्य और सात्विक अभिनय की जानकारी दी गई जिसके माध्यम से बच्चों को नाटक करने में सहजता महसूस हुई। कार्यशाला में बच्चों को खेल- खेल मेँ अक्षर ज्ञान से से परिचय करवाया गया. इसके अतिरिक्त बच्चों को समूह के साथ काम करने की भावना कैसे पैदा हो के लिए भी प्रेरित किया गया तथा बच्चे हम आपस में मिलजुल कर कैसे समाज को सुंदर बनाएं इस पर भी बच्चों के साथ चर्चा की गई । दो सप्ताह तक संचालित होने वाली कार्यशाला के समापन पर बच्चों ने मुंशी प्रेमचंद की कहानी हामिद चिमटा का सुंदर मंचन किया। नाटक में बच्चों की भूमिकाएं- इस नाटक में बच्चों ने विभिन्न प्रकार की भूमिकाएं निभाई जैसे कि दिव्यांश डोभाल- हामिद, शोर्या नौटियाल, नौटियाल-अध्यापक, वीर श्रीवास्तव-दोस्त, रियांश डोभाल-दोस्त, यश कुमार-छात्र, काव्य श्रीवास्तव- दोस्त, नेहा कुमारी-दादी, अवि कुमार-दोस्त, दिव्यांश जोशी- छात्र, ज्योति, लक्ष्य दीक्षित- सिपाही, तनिश प्रकाश-दुकानदार, कार्तिक नैथानी-दोस्त, रवि कुमार-दोस्त, खुशी पँवार-छात्रा, तत्सव माला- छात्रा, वैत्याली तिवारी-छात्रा, विवेक सेमवाल- छात्र आदी बच्चों ने नाटक मेँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस अवसर डॉ स्मिता त्रिपाठी, डॉ राशि मिश्रा, डॉ प्रीति मिश्रा, डॉ गजाला खान, डॉ अदिति बिष्ट, डॉ तन्वी नेगी, डॉ राकेश भट्ट अनुराधा सिंह, रीना पँवार, दीपा देवी, त्रिलोक, अमित कुमार, शोभा राम नौटियाल, विपिन नैथानी आदि लोग उपास्थित थे।

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