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भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस नौकरियां जाने का खतरा फिलहाल कम है.

20/08/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
आर्टिफिशल इंटेलिजेंस जैसी तकनीक के आने से दुनिया में यह डर पैदा हुआ है कि कहीं मजदूरों की जगह रोबॉट (यंत्र-मानव या कंप्यूटर मानव) न ले लें। पर संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों का मानना है कि नयी तकनीक से व्यापक बेरोजगारी जैसी समस्या पैदा होने की संभावना नहीं है क्योंकि मनुष्य अपनी रचनात्मक क्षमताओं के चलते वह अब भी इन चीजों से आगे हैं।साथ ही संयुक्त राष्ट्र का यह भी कहना है कि तकनीक से लोगों को जोड़ना होगा ताकि लोग उसका आसानी से इस्तेमाल कर सकें। इसके लिए नीतियों की जरूरत है क्योंकि तकनीकी प्रगति का बहाना बनाकर नीतियों के स्तर पर हाथ पर हाथ रखे नहीं बैठा जा सकता। संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन (आईएलओ) वृहद आर्थिक नीति एवं रोजगार प्रभाग के प्रमुख एक्कहार्ड अर्नस्ट का कहना है कि विनिर्माण क्षेत्र को आर्टिफिशल इंटेलिजेंस से लाभ नहीं होगा। ऐसे में, कम से कम विकासशील देशों में तो इसके चलते रोजगार के अवसरों का सफाया होने के अनुमान सही नहीं होंगे। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस का असर निर्माण कार्य, स्वास्थ्य सेवा और कारोबार पर पड़ेगा और इन क्षेत्रों में रोजगार के अवसर प्रभावित हो सकते है। ‘मामला नौकरी के अवसर खत्म होने से ज्यादा काम के स्वरूप में बदलाव का है। इन क्षेत्रों के कर्मचारियों के नाम के आगे नए तरह के काम जुड़ेंगे जिसमें उनकी मदद के लिए कंप्यूटर और रोबॉट लगे होंगे। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के एल्गॉरिदम से उन कामों में मशीन का इस्तेमाल हो सकता है जो निरंतर एक ढर्रे पर चलते हैं। मन्युष्य ऐसे कामों की जगह पारस्परिक संपर्क, सामाजिक और भावनात्मक कौशल से जुड़े क्षेत्रों पर ध्यान देगा। आईएलओ के व ने यह भी कहा है कि कंप्यूटर आधारित आर्टिफिशल इंटेलिजेंस से विकासशील देशों को भी लाभ होगा और वहां यह लाभ कृषि जैसे क्षेत्रों में अधिक होगा। उनका कहना है कि उनके किसान अब यंत्रों के माध्यम से मौसम के अनुमान और बाजार की कीमतों की ताजा से ताजा जानकारी हासिल कर रहे हैं। अफ्रीका महाद्वीप में सहारा मरुस्थल के दक्षिण के देशों के किसान मोबाइल एप के माध्यम से फसलों पर लगे कीटों की पहचान की पहचान कर सकते है। उन्हें संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की मदद से विकसित किया गया है। अर्नेस्ट का कहना है कि जरूरत लोगों को डिजिटल/ कंप्यूटर प्रौद्यगिकी से जोड़ने की है ताकि उनको ऐसा न लगे कि वे मशीन को चला ही नहीं सकते, उसके साथ निर्देश के आदन-प्रदान नहीं कर सकते। वे मशीन को उसी तरह से इस्तेमाल कर सकें जैसे वह कोई सामान्य औजार हो, जैसे कोई कुल्हाड़ी या कार का इस्तेमाल करता है। उन्होंने कहा कि ‘तकनीक के क्षेत्र में प्रगति का बहाना बना कर नीतिगत क्षेत्र में हाथ पर हाथ रख कर नहीं बैठे रहा जा सकता है। जरूरत है कि (तकनीक के जरिए) अच्छे समाधान के लिए पहल की जाए।’ संयुक्त राष्ट्र आर्थिक एवं सामाजिक कार्य विभाग के एक ताजा अध्ययन के अनुसार आर्टिफिशल इंटेलिजेंस का श्रम बाजार तथा विषमताओं पर ‘बड़ा असर’ पड़ेगा। लेकिन इस अध्ययन में कहा गया है कि यह नहीं कहा जा सकता कि यह असर ठीक इसी तरह से होगा और इसे स्थानीय, राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर नीतियां के माध्यम से आकार दिया जा सकता है। हालांकि आज भी यह एक प्रचलित धारणा बनी हुई है, लेकिन तकनीकी बेरोजगारी की गलत भविष्यवाणियां सभी अर्थशास्त्रियों से छिपी नहीं हैं। कुछ आशावादी आकलन यह तर्क देते हैं कि एआई श्रमिकों को प्रतिस्थापित करने के बजाय उनकी क्षमता को बढ़ाएगासंभवतः सबसे कम कुशल श्रमिकों की। वहीं कुछ अन्य का तर्क है कि श्रमिकों को प्रतिस्थापित करना जितना आसान लगता है, उतना आसान नहीं है क्योंकि नौकरियां कई कार्यों का समूह होती हैं और एआई उन सभी कार्यों को सहजता से करने में सक्षम नहीं हो सकता है।इस प्रकार के तर्क महत्वपूर्ण हैं और कार्य के सूक्ष्म अर्थशास्त्र पर आधारित हैं। हालांकि, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सामने व्यापक बेरोजगारी के खिलाफ सबसे ठोस तर्क व्यापक अर्थशास्त्र द्वारा ही प्रस्तुत किए जाते हैं।अक्सर इस बात को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है कि तकनीक में स्वाभाविक रूप से अपस्फीति उत्पन्न करने की क्षमता होती है। जब इसका व्यापक प्रभाव होता है, तो तकनीक लागत और कीमतों को कम करती है, जिससे उपभोक्ताओं की वास्तविक आय और नए सामान और सेवाओं की मांग बढ़ती है – और इस प्रकार, नए रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। श्रम बाजार का ऐसा पुनरुद्धार संयोग से कहीं अधिक तर्कसंगत है और यह बार-बार देखने को मिला है। कम कीमतें अर्थशास्त्रियों की भाषा में वास्तविक आय लाभ कहती हैं – उपभोक्ता कम खर्च करते हैं और अपने बजट में बची अतिरिक्त राशि का उपयोग अक्सर नए सामान और सेवाओं की खपत बढ़ाने के लिए करते हैं, जिससे अंततः नए रोजगार सृजित होते हैं। यह सच है कि इस प्रक्रिया में हमेशा कुछ क्षेत्रों में नौकरियों का नुकसान होता है और इस प्रकार सूक्ष्म आर्थिक संकट उत्पन्न होता है, लेकिन यह नए रोजगार और व्यापक आर्थिक लाभ का एक विश्वसनीय मार्ग भी साबित हुआ है।असफलता के ऐसे इतिहास को देखते हुए, यह आश्चर्यजनक लग सकता है कि निराशावादी लोग तकनीकी बेरोजगारी की भयावह कहानियों पर ही टिके हुए हैं। लेकिन प्रौद्योगिकी के कारण होने वाली नौकरी की हानियों को पहचानना आसान है, जो अक्सर एक ही जगह केंद्रित होती हैं और तेजी से घटित हो सकती हैं, जबकि नई नौकरियों के सृजन को पहचानना मुश्किल है, जो आमतौर पर बिखरी हुई होती हैं और समय के साथ घटित होती हैं। तकनीकी विकास उपभोक्ताओं की मांग और कंपनियों की आपूर्ति पर निर्भर है। यह इस पर निर्भर है कि कर्मचारी तकनीक को विकसित करने में कितने सक्षम हैं और ग्राहक ऐसी तकनीक चाहता है या नहीं। उन्होंने ऑनलाइन खरीदारी के बढ़ते ट्रेंड को भी उपभोक्ताओं के व्यवहार में आए बदलाव का उदाहरण माना है।उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक रूप से देखा जा सकता है कि प्रौद्योगिकी ने नए उत्पाद और बाजार का निर्माण किया है। 20वीं सदी में ऑटोमोबाइल सेक्टर ने घोड़ागाड़ी को चलन से बाहर कर दिया, लेकिन इसी के साथ उसने कार निर्माण से लेकर सर्विसिंग तक ढेरों रोजगार के अवसर पैदा कर दिए। हाल के वर्षो में मोबाइल एप बनाने वालों का बड़ा बाजार तैयार हो गया है। स्मार्टफोन आने से पहले इनका कोई अस्तित्व ही नहीं था। अन्‌र्स्ट ने एआइ तकनीक को अपनाने में आने वाली कई नियामकीय चुनौतियों का भी जिक्र किया।भारतीय कंपनियों में नियुक्तियों की स्थिति इस साल बेहतर रहने की उम्मीद है। यूबीएस एविडेंस लैब के सी-सुइट सर्वे में यह बात सामने आई है। इसके मुताबिक, बढ़ती मांग को देखते हुए कंपनियां अपने यहां स्टाफ बढ़ाने की तैयारी में हैं। नियुक्तियां पिछले साल से बेहतर रह सकती हैं। विभिन्न कंपनियों के 247 एक्जीक्यूटिव (सीईओ, सीएफओ, स्ट्रेटजी व फाइनेंस निदेशक आदि) के बीच इस सर्वे को अंजाम दिया गया।यूबीएस ने अनुमान जताया है कि अगले पांच साल सालाना 40 लाख की औसत से रोजगार सृजन होगा। पिछले पांच साल में यह औसत सालाना 20 लाख रोजगार का रहा है। सर्वे में यह भी कहा गया है कि ऑटोमेशन की नई तकनीकों से रोजगार पर अभी कोई नकारात्मक असर पड़ता नहीं दिख रहा है। भारत की बड़ी आबादी और बड़ी वर्कफोर्स इसका एक प्रमुख कारण है. देश में बहुत से लोग ऐसे काम करते हैं, जिनमें मशीनों की मदद से तुरंत बदलाव करना आसान नहीं है. भारत की करीब 40% वर्कफोर्स कंस्ट्रक्शन और रिटेल ट्रेड से जुड़ी है. इन क्षेत्रों में अभी AI का असर बहुत ज्यादा नहीं दिख रहा है. सबसे ज्यादा बदलाव सर्विस सेक्टर में देखने को मिल सकता है.। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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