डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
राज्य गठन के बाद उत्तराखंड में कृषि क्षेत्रफल में कमी आई है। 26 सालों में की कृषि क्षेत्रफल कम हुआ है। वर्तमान में 6.48 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में लगभग नौ लाख किसान खेती कर रहे हैं। उत्तराखंड को जैविक राज्य बनाने की दिशा में किसानों ने जैविक खेती की तरफ कदम बढ़ाए हैं। जिससे जैविक खेती का रकबा बढ़ रहा है। उत्तराखंड में कृषि क्षेत्र की उपेक्षा बेहद चिंताजनक है। खेती का क्षेत्रफल का लगातार घट रहा है। पहाड़ों से पलायन इसका एक कारण है। सिंचाई के साधनों की कमी और आधुनिक तकनीक का पूरा इस्तेमाल नहीं होने से खेती अलाभकारी साबित हो रही है। मुफ्त अनाज योजना के कारण भी कुछ लोगों ने कठिन परिश्रम से मुंह मोड़ लिया है। सरकार कई योजनाओं के बावजूद छोटे किसानों को परंपरागत खेती में बड़े बदलाव के लिए तैयार नहीं कर पाई है।उत्तराखंड ने राज्य के रूप में 25 साल पूरे कर लिए हैं। लेकिन खेती जैसे बुनियादी क्षेत्र को लेकर गंभीरता नहीं दिख रही है। राज्य बनने के बाद इन 25 वर्षों में हमने खेती का दो लाख हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र खो दिया है। तब 7.70 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खेती हो रही थी, अब वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा 5.68 लाख हेक्टेयर तक सिमट गया है। राज्य गठन के बाद से अब तक करीब 27% भूमि पर खेती बंद चुकी है। इस तरह औसतन 3,500 से 4,000 हेक्टेयर कृषि भूमि हर साल घट रही है। रोजगार के साधनों की कमी के बावजूद लोग खेती क्यों छोड़ रहे हैं? यह गंभीर सवाल है।यह सही है कि शहरीकरण और व्यवसायीकरण के तेज होने से आवासीय कॉलोनियां और औद्योगिक इकाइयां बनने के कारण कृषि भूमि कंक्रीट के जंगलों में बदल रही है। विकास की दृष्टि से इसे जरूरी माना जा सकता है, लेकिन अंधाधुंध तरीके से निर्माण खेती की जमीन को तेजी से निगल देगा। इसके लिए समय रहते सचेत होकर उचित नियोजन करना होगा। भूमि के उचित प्रबंधन के लिए इसे कृषि, आवासीय, उद्योग और निर्माण के लिए कड़ाई से चिन्हित करना होगा। कुछ स्थानों पर अनावश्यक कंक्रीट की कोठियां खड़ी की जा रही हैं। जैसे ऋषिकेश से टिहरी और हल्द्वानी से मुक्तेश्वर मार्ग पर आपको कई बड़ी बड़ी कोठियां नजर आएंगी, लेकिन उनमें कई में साल के ग्यारह महीने कोई नहीं रहता। सर्वेंट क्वाटर में केवल स्थानीय नौकर रहते हैं। इन कोठियों की जगह पहले सेब-नाशपाती के खूबसूरत बगीचे होते थे। आलू, मटर अथवा अन्य फसलों का उत्पादन होता था। इन कोठियों के मालिकों को देश भर में संपत्ति खरीदने का कानूनी अधिकार है। उनको गलत नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन हमें इसे रोकने के लिए व्यवस्था बनाने से कौन रोक रहा है? हिमाचल के भू-कानून का बार बार उल्लेख इसलिए होता है। हिमाचल ने दसकों पहले एक तर्कसंगत कानून (हिमाचल भू-कानून की धारा 118) बनाकर इस तरह खेती की जमीन बर्बाद करने पर रोक लगा दी थी।कानून उत्तराखंड में भी है। प्रदेश से बाहर के एक परिवार को अधिकतम 250 वर्ग मीटर भूमि आवासीय उद्देश्य से खरीदने की इजाजत दी गई है। जब भूमि खरीदने का उद्देश्य आवासीय था तो फिर वहां कोई रहता क्यों नहीं? यह कौन पूछेगा? इसके अलावा भी इस कानून की कई कमजोरियां हैं। 250 मीटर की सीमा पूरे परिवार के लिए है, लेकिन लोगों ने एक ही परिवार के कई लोगों के नाम पर जमीनें खरीद ली हैं। ऐसी जमीनों के अलावा उद्योग लगाने के नाम पर आवंटित जमीनों का सालाना मुआयने की व्यवस्था करना आवश्यक है, जिससे यह पता चल सके कि जमीन का उपयोग सही हो रहा है। आवासीय भूमि पर पर तीन साल में घर नहीं बनाने या फिर बनाकर खाली रखने की भी निगरानी आवश्यक है।उत्तराखंड में जंगली जानवरों सुअर और बंदर के आतंक और शिक्षा-चिकित्सा जैसी जरूरी सुविधाओं की कमी के कारण लोग गांव के साथ खेती भी छोड़ रहे हैं, जिससे भूमि बंजर होती चली जा रही है। खासकर पहाड़ों पर परंपरागत खेती महंगाई के दौर में अलाभकारी हो चुकी है। मजदूरी करके खाद्यान्न खरीदना बेहतर विकल्प बन रहा है। अलाभकारी इसलिए भी कि पहाड़ों पर ज्यादातर जमीन असिंचित है। बारिश होगी तो खेती होगी, वरना नहीं। इस साल का उदाहरण लें, रवि भी बुआई का सीजन निकल गया, परंतु अभी तक बारिश नहीं होने के कारण किसान बुआई नहीं कर पाए हैं। पहाड़ पर अगर मजदूर लगाकर खेती की जाए तो लगभग 20 हजार रुपये की लागत में औसतन 16 हजार का गेहूं पैदा होता है। अगर गेहूं की जगह सरसों बोएं तो फिर लागत निकलने के बाद कुछ लाभ भी हो सकता है। हां, सरसों बेचने के बजाय उसका तेल निकालकर बेचने पर खेती लाभकारी साबित हो जाएगी। इसी तरह हल्दी, अदरक, सुंगंध पौध आदि विकल्प हो सकते हैं। कई योजनाएं होने के बावजूद हमारा सरकारी सिस्टम परंपरागत खेती में न तो बदलाव के लिए किसान को तैयार कर पाया और न ही हल-बैल की जगह आधुनिक पावर टिल्लर और नए उपरकणों का इस्तेमाल सिखा पाया। किसानों को प्रशिक्षित करके कुछ गांवों में सामूहिक खेती का प्रयोग शुरु किया जा सकता है।कृषि योग्य भूमि के क्षेत्रफल में उत्तराखंड ही नहीं, पूरे देश में कमी आ रही है। हालांकि देश में दो दशक में पांच प्रतिशत के आसपास खेती की जमीन कम हुई, लेकिन उत्तराखंड में 25 साल में 27 फीसदी कृषि भूमि सिकुड़ गई। इसका मुख्य कारण बढ़ता शहरीकरण, औद्योगिक विकास और कृषि भूमि का गैर-कृषि कार्यों जैसे मकान और सड़कें आदि बनाने के लिए उपयोग होना है। देश में जहां कृषि भूमि का कम होना मुख्य रूप से शहरीकरण से जुड़ा है, वहीं उत्तराखंड में इसके अलावा फसलों का अलाभकारी होना, मानव-वन्यजीन संघर्ष, पलायन और आपदा आदि कारण भी जिम्मेदार हैं।खेती के क्षेत्रफल में पिछले पांच वर्षों में अधिक तेजी से कमी आई है। इसका कारण अलाभकारी खेती, पलायन के अलावा पांच किलोग्राम मुफ्त अनाज की योजना भी है। यह हमारी जटिल मानसिकता है कि जब किसी को बिना मेहनत घर बैठे मुफ्त राशन मिल जाएगा तो वह खेतों में पसीना क्यों बहाएगा? जिस तेजी से कृषि क्षेत्र घट रहा है, उससे राज्य की जीडीपी में प्राथमिक क्षेत्र का योगदान भी लगातार कम होता चला जाएगा। किसान, कृषि वैज्ञानिकों और सरकार को मिलकर इस समस्या के समाधान का रास्ता बनाना होगा। पहाड़ी क्षेत्रों में 80% से अधिक कृषि वर्षा आधारित है और इसमें कृत्रिम उर्वरकों का उपयोग बहुत कम होता है, इसलिए राज्य की पहाड़ी खेती को अक्सर “अनजाने में जैविक” माना जाता है। यह शून्य बजट प्राकृतिक खेती जैसी रासायनिक मुक्त और कम लागत वाली प्राकृतिक कृषि पद्धतियों के लिए एक अनूठा और तैयार आधार प्रदान करता है।विकास के प्रमुख कारक और संभावनाएं प्रचुर मात्रा में हैं। अंतर्निहित शक्तियों में शामिल हैं – राज्य में 64% वन क्षेत्र है, जो पारंपरिक कृषि खाद के लिए पर्याप्त मात्रा में पत्तों का कचरा और प्राकृतिक बायोमास प्रदान करता है। जैव विविधता में लचीलापन है: बारह अलग-अलग फसलों की अंतर्फसल जैसी पारंपरिक प्रणालियां प्राकृतिक कीट प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करती हैं, मिट्टी की गुणवत्ता बढ़ाती हैं और छोटे किसानों को जलवायु संबंधी जोखिमों से बचाती हैं।वर्तमान में, नीतिगत समर्थन भी मौजूद हैराष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन (एनएमएनएफ) और ‘परंपरागत कृषि विकास योजना’ (पीकेवीवाई) जैसे कार्यक्रम क्लस्टर गठन, प्रशिक्षण और सहभागिता गारंटी प्रणाली (पीजीएस) प्रमाणन के लिए सक्रिय रूप से वित्तपोषण करते हैं।कृषि-पर्यटन का एकीकरण एक और उभरता हुआ कारक है। उत्तराखंड सरकार पारंपरिक जैविक और प्राकृतिक कृषि केंद्रों को ग्रामीण होमस्टे और पर्यावरण-पर्यटन से जोड़ने के लिए सक्रिय रूप से प्रयासरत है। इस जुड़ाव से किसानों को मूल्यवर्धित उत्पाद सीधे पर्यटकों को अधिक कीमत पर बेचने में मदद मिलती है। इसके अलावा, पर्वतीय क्षेत्रों में उगाई जाने वाली नकदी फसलों, विशेष रूप से औषधीय जड़ी-बूटियों सुगंधित पौधों, दालों और जैविक बाजरा की निर्यात और घरेलू मांग में भी भारी वृद्धि देखी जा रही है।हालांकि, इसके विस्तार में कई बड़ी चुनौतियां हैं जिन पर सरकार को ध्यान देना चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि श्रम और भौगोलिक स्थिति इसमें बाधा डालती हैं। ऊबड़-खाबड़, खड़ी पहाड़ी इलाके मशीनीकरण को सीमित करते हैं, जिससे शारीरिक श्रम की लागत बढ़ जाती है। इसके अलावा, जलवायु संबंधी जोखिम भी हैं, जैसे कि वर्तमान में अनुभव किए जा रहे हैं। गंभीर भूमि क्षरण, अनियमित मानसूनी बारिश, बादल फटने और बार-बार भूस्खलन से ऊपरी मिट्टी का कटाव होता है और सीढ़ीदार खेत नष्ट हो जाते हैं।आपूर्ति श्रृंखला में मौजूद कमियों को भी दूर करने की आवश्यकता है। दूरस्थ, अलग-थलग पहाड़ी गांवों में सुदृढ़ कोल्ड-चेन लॉजिस्टिक्स, प्रसंस्करण केंद्र और प्रत्यक्ष बाजार पहुंच का अभाव है, जिससे फसल कटाई के बाद नुकसान होता है। दीर्घकालिक पलायन की समस्या भी है। कृषि उपज में गिरावट के कारण ऐतिहासिक रूप से बड़ी संख्या में युवा मैदानी इलाकों में पलायन करते रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप कई सीढ़ीदार खेत पूरी तरह से वीरान हो गए हैं।हालांकि, लागू किए जाने वाले रणनीतिक समाधान उपलब्ध हैं। सूक्ष्म-मौसम अवसंरचना की आवश्यकता है – डेटा-आधारित मॉडलों को दोहराना, जैसे कि टिप्ली (टिहरी गढ़वाल) में जलवायु-स्मार्ट स्कूल और सूक्ष्म-मौसम स्टेशन परियोजना, किसानों को स्थानीय जलवायु परिवर्तन के अनुसार बुवाई के कार्यक्रम में बदलाव करने में मदद करती है। किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) और साझा सुविधा केंद्रों (सीएफसी) का विस्तार करने से छोटे किसानों को सामूहिक रूप से उत्पादन करने, परिवहन लागत कम करने और उच्च मूल्य वाले शहरी बाजारों तक पहुंच बनाने में मदद मिलती है। विशेषज्ञ स्थानीय जैव-उपकरणों – जैसे जीवामृत, घनजीवामृत और वानस्पतिक कीट निवारक पर विस्तार कार्य को बढ़ाने की आवश्यकता पर भी बल देते हैं, जो मानक पैदावार के लिए जागरूकता की कमी को दूर करते हैं।समस्याएँ तो मौजूद हैं, लेकिन नवीन समाधानों के बाद मिलने वाले परिणाम निश्चित रूप से लाभप्रद होंगे। उत्तराखंड में प्राकृतिक खेती पर जोर दिया जा रहा है. ताकि, किसान प्राकृतिक रूप से खेती कर अपनी उपज बढ़ा सके और लोगों की थाली तक भी केमिकल रहित फल-सब्जियां पहुंच सके. विश्व में खाद्यान्नों की बढ़ती माँग को जैविक खेती से पूरा किया जा सकता है। परन्तु सवाल यह है कि हरित क्रान्ति के दौरान बाद के पिछले पाँच-छह दशकों में खेती में रसायनों का इस तरह से उर्वरकों के इस्तेमाल के कारण मिट्टी का स्वास्थ्य बुरी तरह बिगड़ चुका है।इस मिट्टी में अब बिना रसायनों के प्रयोग की खेती घाटे का सौदा है। वैज्ञानिक बताते हैं कि रसायनों के प्रभाव से खेती को मुक्त करने के लिये लगातार तीन-चार साल तक जैविक खेती करने की जरूरत होती है। इस अवधि में तुलनात्मक रूप से उत्पादन में भी गिरावट आ सकती है। इस प्रकार खाद्यान्न की आपूर्ति कुछ समय के लिये असन्तुलित हो सकती है।जैविक खेती में जैविक उर्वरक और खाद जैसे- कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट, गाय के गोबर की खाद आदि का उपयोग किया जाता है और बाहरी उर्वरक का खेतों में प्रयोग किया जाता है. प्राकृतिक खेती में मृदा में न तो रासायनिक और न ही जैविक खाद डाली जाती है. वास्तव में बाहरी उर्वरक का प्रयोग न तो मृदा में और न ही पौधों में किया जाता है. यहां जैविक भी और कम लागत से ज्यादा फसल पर भी किसान काम करते हैं। सरकार को चाहिए कि खेती का पारंपरिक ज्ञान का अध्ययन कर किसानों के हित में व्यवहारिक योजनाओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











