डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के लिपुलेख दर्रे से भारत और तिब्बत के बीच सदियों से पारंपरिक व्यापार होता रहा है. साल 1962 के भारत और चीन के बीच युद्ध के बाद यह व्यापार बंद हो गया था. लंबी कवायद के बाद में साल 1992 में तकलाकोट (पुरांग) मंडी से फिर से व्यापार शुरू हुआ, लेकिन कोरोना महामारी के चलते साल 2019 के बाद यह व्यापार फिर बंद हो गया. आखिरकार 6 साल बाद भारत-चीन के बीच यह व्यापार शुरू हुआ, लेकिन इसमें भी कई अड़चनें आई.भारत-चीन सीमा व्यापार में आया गतिरोध टूटने के बाद अब व्यापारियों की आवाजाही ने जोर पकड़ लिया है। चीन की ओर से सकारात्मक संदेश मिलने के बाद भारतीय व्यापारियों का तिब्बत जाने का सिलसिला एक बार फिर से शुरू हो गया है। इसी क्रम मेंपहले से ही सीमांत मंडी गुंजी में इंतजार कर रहे नौ व्यापारी और उनके आठ सहायक (कुल 17 लोग) अपने व्यापारिक सामान के साथ तिब्बत की तकलाकोट मंडी के लिए रवाना हो गए हैं।व्यापार में आए इस सुचारू बदलाव से सीमांत के कारोबारियों ने बड़ी राहत की सांस ली है। हालांकि, जानकारी यह भी है कि दूसरे दल के व्यापारी अभी अपने साथ बहुत अधिक सामान के साथ तिब्बत नहीं गए हैं| पहले दल में तकलाकोट गए व्यापारियो में से एक व्यापारी शंकर सिंह गुंजयाल अपना सामान ले जाने के लिए भारत आए हैं |भारत-चीन व्यापार के लिए 68 व्यापारियों के ट्रेड पास जारी किए गए थे. पहला दल जुलाई महीने में व्यापार के लिए निकला, जिसमें सिर्फ 20 व्यापारी ही तकलाकोट तक जा सके, लेकिन चीन से व्यापार की अनुमति नहीं मिल पाई. ऐसे में वो सामान वहीं पर छोड़ कर वापस आ गए. अब लंबी दांव पेंच के बाद चीन ने व्यापार को लेकर हामी भरी है. जिसके बाद भारतीय व्यापारियों का 17 सदस्यीय दूसरा दल रवाना हुआ. इस साल व्यापार के लिए जिला प्रशासन की ओर से पहले ही पास जारी करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई थी. शुरुआती चरण में 20 व्यापारियों का पहला दल तकलाकोट पहुंच गया था. दूसरी तरफ तकलाकोट प्रशासन की ओर से ट्रेड कार्यालय को अगला संदेश नहीं आने तक व्यापारियों को न भेजने को कहा गया था. ऐसे में व्यापारियों के तकलाकोट गए एक माह का समय बीत जाने के बाद भी व्यापार शुरू नहीं होने से व्यापारियों में हताशा थी. लिपुलेख दर्रे से तकलाकोट के लिए रवाना किया गया. सभी व्यापारी सामान लेकर गए हैं. एक व्यापारी वहां से सामान लेकर भारत आया है. एक महीने के लंबे इंतजार के बाद व्यापारियों को एक बार फिर परंपरात व्यापार के पटरी पर आने की उम्मीद हैपहला दल 31 जुलाई को तकलाकोट के लिए रवाना हुआ था. दूसरा दल 38 दिन बाद चीन रवाना हुआ है. लंबे समय बाद ही सही दूसरे दल के व्यापारियों को सामान लेकर तकलाकोट जाने की अनुमति मिलने से व्यापारियों में राहत है. इस दूसरे दल में 9 व्यापारी और 8 हेल्पर शामिल हैं. सभी व्यापारी सामान लेकर गए हैं. व्यापारियों को उम्मीद है कि इस बार व्यापारिक गतिविधियां सुचारू रूप से संचालित होंगी.गौर हो कि तकलाकोट मंडी के पारंपरिक व्यापार में भारतीय व्यापारी आमतौर पर मसाले, चाय, गुड़, मिश्री और सौंदर्य प्रसाधन की सामग्री समेत अन्य घरेलू उपयोग की वस्तुएं लेकर जाते हैं. तकलाकोट मंडी से भारतीय व्यापारी ऊन, ऊनी धागा, पश्मीना, याक के बाल, ऊनी कपड़े, जूते और अन्य स्थानीय उत्पाद लेकर आते रहे हैं. इस सामान की भारत में काफी मांग रहती है. दोनों देशों के बीच होने वाला यह व्यापार लंबे समय से धारचूला और आसपास के क्षेत्रों की आर्थिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है. इसके लिए परस्पर विश्वास और नियमित संवाद आवश्यक होगा. त्वरित प्रगति का दृष्टिकोण जमीनी हकीकत को दर्शाता है कि सीमा विवाद का पूर्ण समाधान तुरंत संभव नहीं है, लिहाजा क्रमबद्ध समझौतों के माध्यम से ही टकराव घटाने और विश्वास कायम करने की उम्मीद की जा सकती है. वहीं, कैलाश मानसरोवर यात्रा और सीमावर्ती व्यापार का धीरे-धीरे खुलना भी यह रेखांकित करता है कि दोनों देश रिश्तों को अलग-अलग खांचों में बांटकर आगे बढ़ने की रणनीति अपना रहे हैं, ताकि बड़े रणनीतिक विवादों के बावजूद चुनिंदा क्षेत्रों में सहयोग जारी रखा जा सके. भारत और चीन के बीच बनी इस सहमति का समय भी महत्वपूर्ण है, जो द्विपक्षीय स्तर कुछ कूटनीतिक स्थिरता प्रदान करता है. खासतौर से तब, जब दोनों देश शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ और ब्रिक्स जैसे मंचों पर सक्रियता बढ़ा रहे हैं.इस सबके बावजूद हालिया वार्ता को एक बड़ा रणनीतिक बदलाव मानने के बजाय तनाव को घटाने की कवायद भर समझा जाना चाहिए. ऐसा इसलिए, क्योंकि दोनों देशों के बीच अविश्वास की जड़ें काफी गहरी हैं. एलएसी पर इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण, हिमालयी सीमा पर सैन्य शक्ति का संतुलन, गहराता व्यापार घाटा और क्षेत्रीय दबदबे की होड़ जैसे पहलू भविष्य में भी भारतीय नीति की दिशा को निर्धारित करेंगे. स्पष्ट है कि भारत कूटनीतिक उम्मीदों के फेर में पड़कर अपनी रणनीतिक चौकसी और तैयारियों में कोई ढिलाई नहीं बरतेगा. कुल मिलाकर, 25वें दौर की इस वार्ता का मर्म यही है कि भारत और चीन के रिश्ते 2020 से पहले वाली स्थिति में वापस नहीं जा रहे, बल्कि अब नियंत्रित होड़ के नए दौर में दाखिल हो चुके हैं. इसका उद्देश्य दोनों देशों की बुनियादी सामरिक प्रतिस्पर्धा की रेखा को एकाएक मिटाना नहीं, बल्कि एक तरह से उसे धुंधला कर किसी नए सैन्य टकराव में तब्दील होने से रोकना है. एक महीने के लंबे इंतजार के बाद व्यापारियों को एक बार फिर परंपरात व्यापार के पटरी पर आने की उम्मीद हैलेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं











