डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
भारतीय हिमालय को आमतौर पर बर्फीली चोटियों, ग्लेशियरों और नदियों के उद्गम क्षेत्र के रूप में देखा जाता है, लेकिन हिमालय की पहचान इन्हीं तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे कहीं ज्यादा है. हिमालय में मौजूद वनस्पतियां सदियों से स्थानीय और आदिवासी समुदायों के लिए भोजन, दवा, ईंधन, चारा, निर्माण सामग्री और धार्मिक-सांस्कृतिक जरूरतों का आधार रही हैं.भारतीय हिमालय की इसी जैव सांस्कृतिक विरासत पर वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण अध्ययन किया है, जिसमें चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं. खास बात ये है कि देश के सभी हिमालयी राज्यों के मुकाबले उत्तराखंड में सबसे ज्यादा 44.6 फीसदी उपयोगी प्रजातियां पाई गई हैं.उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्र को जड़ी-बूटियों का खजाना माना जाता है. लेकिन विडंबना देखिए अत्यधिक दोहन से कई दुर्लभ जड़ी-बूटियां विलुप्त की कगार में पहुंच गई हैं. प्रदेश में एक-एक कर बहुतायत में पाई जाने वाली औषधीय जड़ी-बूटियां विलुप्त की कगार पर पहुंचने से अब संरक्षण की दिशा में कार्य किया जा रहा है. उत्तराखंड उद्यान विभाग द्वारा हर साल राज्य की एक दुर्लभ वनस्पति को संरक्षण के लिए चुना जाता है. वहीं इस साल उच्च हिमालय क्षेत्र में पाए जाने वाली एक गुणकारी वनस्पति जटामांसी को दुर्लभ प्रजाति के तौर पर चुना गया है, जो आयुर्वेद में कई औषधियों में उपयोग किया जाता है.जटामांसी जिसे स्थानीय भाषा में बालछड़ या बालचीर नाम से भी जाना जाता हैं. यह कैप्रीफोलियासी कुल का एक सुगंधित पौधा है. भारत के उच्च हिमालय क्षेत्र समेत जटामांसी भूटान, चीन, म्यांमार और नेपाल की अल्पाइन हिमालय श्रृंखलाओं में समुद्र तल से 2500-5 000 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है. भारत में, यह प्रजाति उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम में पायी जाती है. उत्तराखंड में गढ़वाल (पश्चिमी हिमालय) के छह अल्पाइन क्षेत्रों (हर की दून, दयारा, पंवाली कांठा, तुंगनाथ, फूलों की घाटी चमोली, कुंवारी दरी) में अत्यधिक पाया जाता है.इसको जटामांसी इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसकी जड़े, जटा या बाल जैसी होती हैं. यह 14-50 सेमी ऊंची, सीधी, बारहमासी जड़ी-बूटी है. इसके तने का आधा भाग रोम वाला तथा आधा भाग रोमहीन होता है. भूमि के ऊपर जटामांसी की जड़ों से इसकी जटाकार, रोमयुक्त कई शाखाएं निकलती हैं. इसके पत्ते 15-20 सेमी लम्बे, 2.5 सेमी चौड़े होते हैं. तने के पत्ते (एक या दो जोड़े) 2.5-7.5 सेमी लम्बे होते हैं. इसके पुष्प बैंगनी सफेद रंग के होते हैं. फल 4 मिमी लम्बे, गोलाकार, सफेद रोम से आवृत होते हैं. इसकी जड़ काष्ठीय, लम्बी तथा रेशों से ढकी रहती है. यह चट्टानों, अल्पाइन घास के मैदानों, जुनिपर झाड़ियों, बुरांश और देवदार के जंगलों में अधिक मात्रा में पायी जाती है. जटामांसी में फूल जून-अगस्त माह में आते हैं और अगस्त-सितंबर में फल लगते हैं. प्रजनन बीजों के साथ-साथ प्रकंदों द्वारा भी होता है.जटामांसी स्थानीय पहाड़ी जन-जीवन में धार्मिक रूप से जुड़ा हुआ है. उत्तराखंड और हिमाचल में स्थानीय मान्यतानुसार लोग जटामांसी को अत्यधिक पवित्र मानते हैं. यह उनके नियमित अनुष्ठानों और धार्मिक समारोहों का हिस्सा है. लंबी यात्रा पर निकलने वाले लोग बुरी आत्माओं और घटनाओं से स्वयं की रक्षा करने के लिए इसकी जड़ का थोड़ा सा हिस्सा अपनी टोपी में या कान में रखते हैं. जटामांसी की सूखी जड़ों और प्रकंदों का उपयोग धार्मिक प्रार्थनाओं के लिए हवन सामग्री के रूप में किया जाता है. आयुर्वेद की दृष्टि से जटामांसी कई औषधीय गुणों से भरपूर है. जटामांसी को प्राचीन काल से ही भारतीय, चीनी, तिब्बती, नेपाली, भूटानी, और जापानी चिकित्सा प्रणालियों में अत्यधिक महत्व दिया जाता रहा है. इसकी जड़ों और प्रकंदों का उपयोग तंत्रिका, पाचन, संचार, श्वसन प्रणाली आदि के विभिन्न विकारों के इलाज के लिए किया जाता है. इस प्रजाति का उपयोग खांसी, बुखार, सिरदर्द, भोजन विषाक्तता, हैजा, आंतों के कृमि, जोड़ों के दर्द, गठिया, पेट के विकार, पीलिया और हृदय संबंधी समस्याओं को ठीक करने और रक्त को शुद्ध करने के लिए भी किया जाता है. जटामांसी की जड़ें इसका मुख्य औषधीय हिस्सा हैं. जटामांसी के पत्ते भी आयुर्वेद एवं पारम्परिक चिकित्सा में उपयोग किये जाते हैं. आयुर्वेद के अनुसार जटामांसी कड़वा, मधुर, शीत, लघु, स्निग्ध, वात, पित्त और कफ तीनों दोषों को हरने वाला होता है. जड़ों का काढ़ा स्मृति बढ़ाने के लिए टॉनिक के रूप में भी लिया जाता है. जटामांसी की जड़ों और प्रकंदों में मिलने वाले तेल में कूमेरिन्स और सेस्क्वीटर्पीन्स यौगिक पाये जाते हैं. इन यौगिकों का प्रयोग इन्फ्लूएंजा, जीवाणु व विषाणु जनित अन्य रोगों के उपचार हेतु विभिन्न औषधियों में किया जाता है. जटामांसी की जड़ के अर्क का उपयोग बाल बढ़ाने वाले टॉनिक एवं औषधियों में किया जाता है. जटामांसी बिना किसी दुष्प्रभाव के अनिद्रा में उपयोगी माना जाता है. इसका प्रयोग इत्र बनाने में भी किया जाता है. पारंपरिक चिकित्सा में जटामांसी के व्यापक उपयोग और अत्यधिक दोहन के साथ-साथ बीजों के कम अंकुरण दर (10-20%) के कारण, यह अब विलुप्त होने के कगार पर है. जड़ के प्रयोग के लिए इसके पूरे पौधे को उखाड़ना पड़ता है, जिसके चलते जटामांसी का अत्यधिक दोहन हो रहा है. यह पौधा अब विलुप्ति की कगार पर है. इसकी संख्या हिमालयी क्षेत्र में तेजी से कम हो रही है.भारत सरकार द्वारा जटामांसी के प्राकृतिक वास से पौधों के अत्यधिक मात्रा में दोहन को प्रतिबंधित किया गया है. अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ ने संकटग्रस्त प्रजातियों की रेड सूची में जटामांसी को सूचीबद्ध किया है. अतः हिमालय क्षेत्र के इस औषधीय पौधे को संरक्षण की आवश्यकता है. उच्च हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले जनजातीय समुदाय के लोग पारंपरिक रूप से जड़ी-बूटियों का कारोबार करते आ रहे हैं. खास तौर पर भोटिया और शौका समुदाय के लोग उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पायी जाने वाली जड़ी-बूटियों और प्राकृतिक उत्पादों की जानकारी रखते हैं. वे इन्हें इकट्ठा करके प्रमुख व्यापार केंद्रों में बेचते हैं. जड़ी-बूटी कारोबार से ही सीमांत के हजारों परिवारों की आजीविका चलती हैं. ये जड़ी-बूटियां कई लाइलाज रोगों के लिए रामबाण साबित होती हैं.उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मेडिकल सुविधाओं के अभाव में यहां रहने वाले लोग इन जड़ी बूटियों का प्रयोग कर अपना इलाज करते हैं. प्रत्येक गांव में स्वास्थ्य उपचार के लिए वैद्य (लामा) होते हैं. जिन्हें पादप प्रजातियों की सटीक जानकारी होती है. वे इनका इस्तेमाल उपचार के लिए करते हैं. जिस साल जितनी अधिक बर्फबारी होगी, उससे बर्फ के नीचे दबी जड़ी-बूटियों में एक्टिव कंटेट (रसायन) उतना ही अधिक मात्रा में बनेगा. इन जड़ी-बूटियों में जितना अधिक रसायन बनेगा, रोगों से लड़ने की क्षमता उतनी अधिक इन जड़ी-बूटियों में रहेगी. फार्मा कंपनियों और जड़ी-बूटियों का सेवन करने वालों को फायदा होगा. हिमालय क्षेत्रों में लगातार हो रहें मानव हस्तक्षेप और वन कटाई से बढ़ रहा कार्बन उत्सर्जन मौसम चक्र के बदलाव में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. ऐसे में अमूल्य निधि को बचाने के लिए जागरुकता बेहद जरूरी है. हालांकि, सरकार और विभिन्न रिसर्च इंस्टीट्यूट विलुप्त हो रही औषधीय पौधों को बचाने का काम कर रहे हैं.!लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.














