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काफल: स्वाद और औषधीय गुणों से भरपूर फल

09/08/19
in उत्तराखंड, संस्कृति, हेल्थ
Reading Time: 1min read
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डा. हरीश चंद्र अन्डोला दून विश्वविद्वालय में तकनीकी, अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं
नाम- काफल
वानस्पतिक नाम Myrica Esculenta काफल एक लोकप्रिय पहाड़ी फल है। यह मध्य हिमालयी क्षेत्रों में पाये जाने वाला सदाबहार वृक्ष है। यह स्वादिस्ट फल गर्मी के मौसम में लगता है।
काफल का यह पौधा 1300 मीटर से 2100 मीटर तक की ऊँचाई वाले क्षेत्रों में पैदा होता है। काफल ज्यादातर हिमाचल प्रदेशए उतराखंड, उत्तर.पूर्वी राज्य मेघालय, और नेपाल में पाया जाता है। इसे box myrtle और bayberry भी कहा जाता है। यह स्वाद में खट्टा.मीठा मिश्रण लिए होता है। काफल के अपने बहुत ही फायदे है।
काफल खाने के फायदे
1 यह जंगली फल एंटी.ऑक्सीडेंट गुणों के कारण हमारे शरीर के लिए फायदेमंद है।
2 इसका फल अत्यधिक रस.युक्त और पाचक होता है।
3 फल के ऊपर मोम के प्रकार के पदार्थ की परत होती है जो कि पारगम्य एवं भूरे व काले धब्बों से युक्त होती है। यह मोम मोर्टिल मोम कहलाता है तथा फल को गर्म पानी में उबालकर आसानी से अलग किया जा सकता है।
4 इसके अतिरिक्त इसे मोमबत्तियांए साबुन तथा पॉलिश बनाने में उपयोग में लाया जाता है।
5 इस फल को खाने से पेट के कई प्रकार के विकार दूर होते हैं।
6 मानसिक बीमारियों समेत कई प्रकार के रोगों के लिए काफल काम आता है।
7 इसके तने की छाल का सारए अदरक तथा दालचीनी का मिश्रण अस्थमाए डायरियाए बुखारए टाइफाइडए पेचिश तथा फेफड़े ग्रस्त बीमारियों के लिए अत्यधिक उपयोगी है।
8 इसके पेड़ की छाल का पाउडर जुकामए आँख की बीमारी तथा सरदर्द में सूँधनी के रूप में प्रयोग में लाया जाता है।
9 इसके पेड़ की छाल तथा अन्य औषधीय पौधों के मिश्रण से निर्मित काफलड़ी चूर्ण को अदरक के जूस तथा शहद के साथ मिलाकर उपयोग करने से गले की बीमारीए खाँसी तथा अस्थमा जैसे रोगों से मुक्ति मिल जाती है।
10 दाँत दर्द के लिए छाल तथा कान दर्द के लिए छाल का तेल अत्यधिक उपयोगी है।
11 काफल के फूल का तेल कान दर्द, डायरिया तथा लकवे की बीमारी में उपयोग में लाया जाता है। इस फल का उपयोग औषधी तथा पेट दर्द निवारक के रूप में होता है। उत्तराखंड में ष्बेड़ू पाको बारामासाए नारेणी काफल पाको चैता मेरी छैलाष् बड़ा प्रसिद्ध गीत है। सभी जानते हैं और गीत में जिक्र है कि काफल चैत के महीने पकता है। अगर चैत का मौसमी फल काफल चार महीने पहले मंगसीर में ही पेड़ पर नजर आ जाए तो आप हैरान जरूर होंगे। जी हां, ऐसा हुआ है। कुमाऊं में सामान्यत काफल का फल मार्च.अप्रैल में होता है। कुदरत के इस करिश्मे पर वैज्ञानिक आश्चर्यचकित हैं। अलबत्ता, काफल से लदे ये पेड़ पर्यटकों और स्थानीय लोगों के लिए कौतूहल का केंद्र बने हैं। वैज्ञानिक भी इसे अपनी.अपनी तरह से देख रहे हैं। कोई इसे ग्लोबल वार्मिंग का नतीजा कह रहा हैए जबकि कोई जेनेटिक चेंज की बात कर रहा है। दैनिक जागरण की खबर के मुताबिक पिछले साल तक बाजार में काफल अधिकतम 150 से 180 रुपए किलो तक बिकता थाए लेकिन शनिवार को बेतालघाट ब्लाक के पाडली गांव निवासी हरीराम ;60द्ध जब काफल के पांच.पांच किलो के दो टोकरे लेकर पहुंचे तो मंडी में ही खरीदारों की भीड़ लग गई। काफल का एक टोकरा तो हल्द्वानी का कोई व्यापारी खरीद ले गयाए जबकि दूसरा टोकरा स्थानीय कारोबारी गोपा भाई ने खरीदा। शनिवार को मंडी में काफल का रेट 200.250 के भाव थाए जबकि गोपा भाई ने फुटकर में इसे 400 रुपए किलो के हिसाब से बेचा। महंगा होने के बावजूद शाम तक टोकरी खाली हो गई। यदि इसमें इतने गुण है तो क्या हम इसे खेती की दृष्टि से देखे और रोजगार से जोड़े तो क्या यह सही विकल्प होगा।
फलों में, प्रोटीन, फाईवर विटामिन, राइवोफिलिम, के फलों में प्रोटील, फाईवर विटामिन, राइवोफिलिम, थाईमीन, के अलावा मिनरल,जैसे कापॅर, कोवाल्र,जिंक मैम्म्निषियय, कैलषियम, पोटेषियम लिथियम, के मात्रा भी भरपूर-मात्रा में पायी जाती है।क्या ऐसी ही वनस्पतियों को यदि रोजगार से जोड़ा जाए तो कुछ तो फायदे होंगे। ऐसी वनस्पतियों को यदि रोजगार से जोड़े तो शायद इसमें मेहनत भी कम हो सकती है क्योंकि यह स्वतः ही पैदा हो जाने वाली जंगली वनस्पति है। हिमालय की विविध भूस्थलाकृतिक विशेषताओं के कारण यहंा वानस्पतिक संसाधनों का विशाल एवं स्थायी भंडार चिर काल से उपलब्ध रहा है। जहां एक ओर विभिन्न औषधीय गुणो की वजह से समूचे विश्व में आधुनिक औषधि निर्माण एवं न्यूट्रास्यूटिकल कम्पनियों मंे इन औषघीय पौधांै की माॅग दिनों दिन बढ रही है वही लोगों तथा सरकार द्वारा इनके आर्थिक महत्व पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा है। यदि इन वहुउद्ेशीय पादपों के आर्थिक महत्व पर गहनता से कार्य किया जाता है तो पहाड़ो से पलायन जैसी समस्या से काफी हद तक निजात पाया जा सकता है स्थानीय स्तर पर उपलब्ध प्रकृतिक संसाधनों का संरक्षित सदुपयोग, आधुनिक तकनीकों के प्रयोग से कृशि आधारित व्यवसायिक व ओद्योगिक समृद्धिकारण के माध्यम से पर्वतीय क्षेत्र के युवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना है, ताकि पर्वतीय क्षेत्र से ग्रामीण युवाओं के पालायन को रोका जा सके और पर्वतीय जनों की जीवन षैली में आवष्यक बदलाव लाया जा सके.

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