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काला जीरा सीमांत किसानों को दे रहा है रोजगार

06/01/20
in उत्तराखंड, हेल्थ
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंडी नाम-शियाजीरा, कालजीरा, शाहीजीरा, शिंगुजीराजन्मस्थल संबंधी सूचना पश्चिम एशिया उत्तरी अफ्रीका व यूरोप काला जीरे के जन्मस्थल माना जाता है। उत्तराखंड में ऊपरी पहाड़ियों में 2700-3600 मीटर की ऊंचाई वाले जंगलों में पाया जाता है और अब इस पौधे की खेती भी होती है। काला जीरे का पौधा गाजर के पौधे जैसा ही होता है। काला जीरा पाषाण युग से ही उपयोग में आता रहा है। दवाई के रूप में 5000 सालों से काला जीरा उपयोग में है। दक्षिण यूरोप में फोजिल्स में काला जीरा मिला है। आयुर्वेद में कार्वी प्राथमिक काल से उपयोग होता आ रहा है। अरब में यह शताब्दियों से दवाई व मसाले के रूप में उपयोग होता रहा है। लोककथाओं में कहा जाता है कि यूनानी डाक्टर ने नीरो को शाही जीरा उपयोग की सलाह दी थी। विदेशों में इसके सुगंधित तेल को उच्च क्वालिटी की शराब में मिलाकर सुगंधित बनाया जाता है।
यूरोप के बाजारों में काले जीरे की मांग इतनी है कि अभी तक मांग के अनुरूप भारत से मात्र 10 प्रतिशत निर्यात ही हो पा रहा है।भारत सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले मसाला बोर्ड के अनुसार जीरा एक छोटे से पतले वार्षिक शाक का शुष्क, भूरे रंगवाला सफेद फल है। इस फल के ऊपरी भाग पर पांच स्पष्ट रेखाएं, एकान्तर रूप में चार अस्पष्ट मध्यम रेखाएं और असंख्य छोटे रोयें होते हैँ। इसका पौधा 15.5 से.मी. ऊंचा होता है। इसके सफेद या गुलाबी रंग के फूल छोटे-छोटे पुष्प छत्रों में खिलते हैं। जीरे का उत्तत्ति का स्थान उत्तर ईजिप्ट, सीरिया, मेडिटेरेनियन क्षेत्र, ईरान और भारत का माना जाता है। मेक्सिको, चीन, सिसिली और माल्टा में भी इसकी खेती की जाती है।
जीरा उष्ण कटिबन्धी पौधा है और इसकी खेती ऐसे इलाकों मे जहां फरवरी-मार्च के दौरान वायुमण्डलीय आर्दता कम रहती है, रबी फसल के रूप में की जाती है। उत्तराखंड के किसानों की आर्थिकी मजबूत कर रहा है। यूरोप के बाजार में काला जीरा की भारी मांग है। ऐसे में अधिक कीमत पर यूरोप के बाजारों में काले जीरे को बेच किसान अधिक मुनाफा कमा रहे हैं। यह जड़ी.बूटी शोध संस्थान के वैज्ञानिकों के अथक प्रयासों से संभव हो पाया है। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में काला जीरा बोनियम परसिकम नहीं उगाया जाता है। यहां जीरे के रूप में कैरम कार्बी की खेती भोटिया जनजाति के लोगों की ओर से की जाती है। हालांकि यह भी बदलते जमाने के साथ नाममात्र रह गई है। ऐसे में हिमाचल में उगाए जाने वाले काले जीरे को जड़ी बूटी शोध संस्थान के वैज्ञानिकों ने उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में उगाने की मुहिम शुरू की तो किसानों ने इसे हाथों हाथ लिया।
हिमाचल में सेब बागानों के अंदर इस काले जीरे को उगाकर किसान लाखों कमाते हैं। इन्हीं संभावनाओं को आगे बढ़ाते हुए शोध संस्थान के वैज्ञानिकों ने चमोली के जोशीमठ, पिथौरागढ़ के धारचूला, मुनस्यारी में काला जीरा की खेती कर किसानों को आमदनी की नई राह दिखाई। अपनी पौधशालाओं में काला जीरा का सफल उत्पादन होने के बाद शोध संस्थान के वैज्ञानिकों के साथ किसान भी उत्साहित हैं। काले जीरे की खेती को बढ़ावा देने के लिए अब इसके बीज किसानों को निशुल्क दिए जा रहे हैं। शोध संस्थान की ओर से अब तक 200 किसानों को काला जीरा के बीज वितरित किए जा चुके हैं। काला जीरा के बीजों का उच्च क्वालिटी के मसालों के रूप में प्रयोग होता है। इसका बाजार भाव 1500 रुपये प्रति किलोग्राम है। यह खाने में स्वाद बढ़ाने के साथ.साथ पेट की बीमारियों, जैसे भूख न लगना, एसिडिटी, कब्ज को ठीक करता है। काले जीरे से तेल भी बनाया जाता है। विदेशों में इसके सुगंधित तेल को उच्च क्वालिटी की शराब में मिलाकर सुगंधित बनाया जाता है।
यूरोप के बाजारों में काला जीरा की मांग इतनी है कि अभी तक मांग के सापेक्ष दस प्रतिशत सप्लाई में ही सफलता मिल पाई है। काले जीरे से तेल भी बनाया जाता है। विदेशों में इसके सुगंधित तेल को उच्च क्वालिटी की शराब में मिलाकर सुगंधित बनाया जाता है। यूरोप के बाजारों में काले जीरे की मांग इतनी है कि अभी तक मांग के अनुरूप भारत से मात्र 10 प्रतिशत ही निर्यात हो पा रही है।
हिमाचल के काला जीरा और चूली के तेल को जीआई यानी जियोग्राफिकल इंडिकेशन ऑफ गुड्स एक्ट में शामिल किया गया है। जीआई एक्ट में शामिल होने से अब दोनों चीजों की मार्केट में ज्यादा वेल्यू होगी। जिसके बाद किन्नौर के लोगों में ख़ुशी की लहर है। हिमाचल प्रदेश विज्ञान एवं पर्यावरण परिषद ने हाल ही में काला जीरा और चूली के तेल कपो पेटेंट करवाया है। पौध रोपण के 14 माह बाद फसल में जब बीज हरे से पीले होने लगे नीचे से फसल को काट लेना चाहिये तथा हल्की छाया में सुखा कर बीज एकत्रित कर नमी रहित भंडारण करना चाहिये। 1.15 कु. बीज प्रति हैक्टर प्राप्त किया जा सकता है। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में बीटा मिरसीन, लीमोनेने, कार्वोनटेरपीनोइड्स, ट्रांसडीहाइड्रोकार्वोंन, लीमोनेने ऑक्साइडरासायनिक यौगिक बहुतायत से मिलते हैं। बीज प्रदेश 250.300 प्रति कि.ग्रा. सुखे बीज प्रदेश में उच्च गुणवत्तायुक्त के काला जीरा फसल उत्पादन कर देश.दुनिया में स्थान बनाने के साथ राज्य की आर्थिकी तथा पहाड़ी क्षेत्रों में पलायान को रोकने का अच्छा विकल्प बनाया जा सकता है। अगर ढांचागत अवस्थापना के साथ बेरोजगारी उन्मूलन की नीति बनती है तो यह पलायन रोकने में कारगर होगी उत्तराखण्ड हिमालय राज्य होने के कारण बहुत सारे बहुमूल्य उत्पाद जिनकी अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में अत्यधिक मांग रहती हैण्
वर्ष 2011 जनवरी में नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस जर्नल में छपे लेखक के शोध पत्र में अध्ययन में प्रकाशित हुआ है।

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