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उत्तराखंड में पलायन बनी समस्या

12/03/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड में पलायन मात्र रोजगार का ही संकट नहीं रहा, यह तो पिछले दो सौ सालों से हो रही हलचल से उपजीबहुआयामी संरचनात्मक विफलता दिखा चुका है. औपनिवेशिक उत्पीड़न के दौर से यहाँ खेती-किसानी जीवन निर्वाह या गुजारे तक सिमटती जा रही थी. यहाँ रहते नकद आय जुटाने की क्षमता चुक चुकी थी. बाजार तक पहुँच बनाने में पहाड़ी उत्पादों के लिए मूल्य श्रृंखला की कड़ियाँ अनुपस्थित थीं. पहाड़ के उद्योग-धंधों का इतिहास विकास प्रयासों की आड़ में यहाँ के नैसर्गिक साधनों की लूट के साथ नीतिगत असंगतियों का कुचक्र दिखाते रहा. परिवार आधारित लघु और कुटीर उद्योग दम तोड़ते रहे तो पढ़-लिख-प्रशिक्षण-सुविधा-अवसर के लिए पहाड़वासी को उसी के पहाड़ से बाहर निकल अलग पहचान बनानी पड़ी. उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन एक बड़ी समस्या बन गई है। पलायन रुक नहीं रहा है। पलायन के कारण कई गांव जनविकसन हो गए हैं और कुछ गांव जनविकसन के अंतिम छोर पर पहुंच गए हैं। इस राज्य में आज भी प्रवास बदस्तूर जारी है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बेहतर जीवन-स्तर की तलाश में लोग लगातार मैदान की ओर जा रहे हैं। राज्य सरकार पलायन रोकने की दिशा में प्रयास कर रही है, लेकिन सरकार का यह प्रयास नाकाम साबित हो रहा है, जिस कारण पलायन पर रोक नहीं लग पा रही है। इस समस्या के समाधान के लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है। उत्तराखंड में पलायन के प्रमुख पहलुओं में शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, रोजगार के अवसरों की कमी, और कठोर वनस्पति शामिल हैं। राज्य के कई दूर-दराज के इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र नहीं हैं और बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा की दवाएं भी नहीं हैं। रोजगार के अवसरों की कमी से युवा वर्ग शहरों और अन्य राज्यों में नौकरी की तलाश में लगा हुआ है। पलायन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, यदि इन आतिशबाजी कलाकारों को पूरा नहीं किया गया तो पहाड़ों में गांव खाली होने का फिल्मांकन जारीरहेगा।पलायन आयोग ने सुझाव दिया है कि रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का विकास कर आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। राज्य सरकार ने इस दिशा में कुछ प्रयास किए हैं, जिनमें स्थानीय कृषि उत्पादों का विपणन, पर्यटन को बढ़ावा देना और छोटे व्यापारियों का विकास शामिल है।पलायन आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार 3,07,310 लोग राज्य से पलायन कर चुके हैं, जिनमें से 28531 लोग स्थायी रूप से राज्य छोड़ चुके हैं। इस आंकड़े से स्पष्ट है कि पहाड़ों में आज भी जीवन का संकट गहराता जा रहा है। गांवों की मरम्मत के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में सुधार की आवश्यकता है। सरकार का उद्देश्य है कि ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल जर्नल का विकास कर वहां उपयुक्त वातावरण बनाया जाए। विशेषज्ञ का मानना ​​है कि अगर राज्य सरकार कश्मीर में रोजगार के अवसर बढ़ाए और शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की पुष्टि करे, तो पलायन को जा सकती है। इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर कोचिंग कार्यक्रम के माध्यम से युवाओं को नौकरी के अवसर प्रदान करना भी एक अस्थायी उपाय साबित हो सकता है।
पलायन की चुनौती उत्तराखंड के विकास में एक बड़ी बाधा बनी हुई है। राज्य स्थापना के तीन साल बाद भी राज्य की स्थापना का नाम नहीं रखा गया। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार जैसे असलियत की कमी से लोग अपने को छोड़ रहे हैं। हालाँकि, सरकार इस मुद्दे को लेकर गंभीर है और कई नीतियों पर काम कर रही है। यदि इन परिभाषाओं को सही तरीके से लागू किया जाए और ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार और मानक स्तर का विकास किया जाए, तो उत्तराखंड के क्षेत्र के स्तर पर वापसी हो सकती है और क्षेत्रों में बसावट को फिर से बढ़ावा मिल सकता है। जमीनी हकीकत को मूलभूत बातें कहते हुए तंत्र को आगे बढ़ाया जाएगा। पलायन के लिए विशेष अभियान की आवश्यकता है। इसके लिए प्रत्येक स्तर पर जिम्मेदारी लेने वाली कंपनियां, प्रोग्रामिंग, प्रोग्राम को लेकर, पार्टिसिपेट तय होना चाहिए। आर्थिकी को मजबूत करना होगा, आर्थिकी को मजबूत करना होगा तो पलायन पर भी कब्जा करना होगा। विषम भूगोल वाले उत्तराखंड में इस दृष्टिकोण से देखें तो प्रतिव्यक्ति आय के आख्यानों की चमक सार्वभौम वैज्ञानिक है, लेकिन वास्तविकता कुछ और है। तीन मैदानी सजावटी अंतर और शेष 10 पर्वतीय स्मारक में प्रतिव्यक्ति एक जमीन-आसमान का है। प्रत्येक जिले और विकासखंड की अपनी अलग-अलग चिंताएँ हैं। मैदानी और पर्वतीय ज्वालामुखी के मध्य अर्थव्यवस्था की खाई को पाटने के लिए ऐसे कदम उठाने की चुनौती है, जिससे मूर्तियों की आय के संसाधनों में वृद्धि हो। इस दिशा में पर्यटन, कृषि, मनरेगा, स्थानीय शिक्षा, कौशल विकास, भूमि तीर्थयात्रा, पर्यटन-तीर्थाटन के लिए अलग-अलग नीति, संस्थागत स्तर पर कदम बढ़ाने वाले लोगों को बढ़ावा देना, यहां के पेशेवरों की ब्रांडिंग जैसे विषयों पर विशेष ध्यान देना होगा। इसके लिए चयन से प्रयास करें तो थमेगा और की कनेक्टिविटी फिर से निर्भरता। सहयोगी चिकित्सक न होने से लोग पहाड़ से जबरन वापस शहर के इलाकों की तरफ आ रहे हैं और वहां भी स्थिति कम विकट नहीं है। ऐसे में ढांचागत भवनों के विकास के दृश्य जो भी बने हैं, वे गांव मुख्यालय हैं। साथ ही बजट का सदुपयोग हो। विकास के केन्द्र में योजना होनी चाहिए। परिभाषा की मंत्रिपरिषद में महत्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए। विशेषज्ञ का कहना है कि गांव खुशहाल और समृद्ध हो, इसके लिए आबादी की जिम्मेदारी और समृद्धि सुनिश्चित होनी चाहिए। सुजुकी को जवाबदेह कैसे बनाया जाए, इसके लिए नई सरकार को प्रभावी पहल करनी होगी। राज्य के पर्वतीय क्षेत्र में खेती की जोत बकरी और छोटी हैं। ऐसे में पारंपरिक कृषि में वह बात नहीं रही। इसे देखते हुए सलेम पर फोकस करने के साथ ही कृषि क्षेत्र में बढ़ोतरी को कदम उठाया जाएगा। विशेषज्ञ का कहना है कि कृषि के भंडार संरचनाओं के लिए कृषि और उसकी संरचना की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। यहां की खेती में नवीनता के अनुसार नवीन प्रौद्योगिकी और नवीनतम तकनीक का समावेश होना चाहिए। सींचल के सीमित उपकरणों को देखते हुए ड्रॉप सींचल की उपलब्धि संभव हो सकती है। हर स्तर पर प्रभावशाली पहल की जरूरत है। मनरेगा कंपनी से जुड़ना होगा। किसानी संवरेगी तो खेती में समृद्धि और खुशहाली आएगी। जब खेती होगी तो पलायन भी थमेगा। पलायन का मुख्य कारण पहाड़ के क्षेत्र में भू-अर्जन एवं रोजगार का अवसर न होना है। बेहतर भविष्य की आस में लोग शहरों की ओर भाग रहे हैं। यह ठीक है कि गांव में सभी को सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती, लेकिन रोजगार,स्थान के अवसर तो सृजन किये जा सकते हैं। इसके लिए अलग-अलग वैयक्तिक परक योग्यता का लाभ युवा उठा सकते हैं, लेकिन इसके लिए सबसे पहले कौशल विकास पर ध्यान देना होगा। छोटे-छोटे उद्यमों को बढ़ावा देने के साथ-साथ यहां पर मालदीव के अनुसार खाद्य आपूर्ति की भी आवश्यकताएं स्थापित की जा सकती हैं। समूह के अधिकांश से अधिक अवसर सृजित हों, इसके तंत्र को अपनी जिम्मेदारी का सहजता से लचीलेपन करना होगा। एंटरप्राइज़ स्थापना की अनोखी प्रक्रिया को दूर कर इसका सरलीकरण करना होगा। यह भी देखने की जरूरत है कि किस वर्ग के युवाओं को क्या चाहिए, उनके छात्रों के लिए मनोविज्ञान की मंजूरी को छात्रावास में शामिल किया जाना चाहिए।राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों से लगातार हो रहा पलायन एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। अनेक गांव खाली होते जा रहे हैं और युवाओं को अपने घर छोड़कर रोजगार की तलाश में अन्य राज्यों की ओर जाना पड़ रहा है। ऐसे में प्रदेश की जनता यह जानना चाहती है कि पलायन रोकने के लिए सरकार ने क्या ठोस कदम उठाए और भविष्य की क्या योजना है। पर्वतीय क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, अस्पतालों में संसाधनों का अभाव और आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित उपलब्धता आम जनता के लिए बड़ी समस्या बनी हुई है। चार वर्ष पूरे होने के अवसर पर यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि सरकार स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने के अपने प्रयासों और उपलब्धियों का स्पष्ट विवरण देती। प्रदेश के युवा वर्ग में बढ़ती बेरोजगारी भी एक बड़ा सवाल है। लाखों शिक्षित युवा रोजगार के अवसरों की प्रतीक्षा कर रहे हैं। राज्य बनने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, लेकिन आज भी बड़ी संख्या में युवाओं को प्रदेश से बाहर जाना पड़ रहा है। उत्तराखंड एक आपदा संवेदनशील राज्य भी है। हर वर्ष प्राकृतिक आपदाएं प्रदेश के सामने बड़ी चुनौती बनकर आती हैं। इसलिए आपदा प्रबंधन, पुनर्वास और भविष्य की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाना आवश्यक है। क्या नीति निर्माता पहाड़ के सन्दर्भ में यह स्वीकार करते हैं कि पलायन ऐतिहासिक “अधिकार-ह्रास” का नतीजा है? वन पंचायतों को अभी तक वास्तविक अधिकार क्यों नहीं मिले? वन अधिकार एक्ट 2006 को पहाड़ में लागू करने की जिम्मेदारी किसकी है? बुग्याल और चारागाहों पर समुदाय का पहला हक कब माना जाएगा? तथा यह भी कि कि क्या राज्य सरकार पलायन पर अधिकार प्रभाव मूल्यांकन कराने को तत्पर रहेगी?यदि सरकार सचमुच गंभीर है तो सबसे पहले वन, चारागाह, जल पर सामुदायिक स्वामित्व जैसे अधिकार बहाली पैकेज दिये जाएं. दूसरा, पहाड़ की आजीविका की पुनर्रचना की जाये अर्थात पशुपालन, कृषि-वन को एक नीति में रखा जाए. पहाड़ के उत्पादों का न्यूनतम समर्थन मूल्य व स्थानीय खरीद तंत्र को सशक्त व कारगर बनाया जाए. साथ ही पर्वतीय आजीविका व अधिकार का नियमानुसार कानूनी शक्तियों के साथ स्थापित हो.जब तक सरकार मानती रहेगी कि पलायन विकास की कीमत है, पहाड़ खाली ही होते रहेंगे. पहाड़ को असमंजसकारी योजनाओं की नहीं बल्कि न्याय की जरुरत है. यह कहना बड़ा असहज व अपमान भरा है कि पहाड़ में लोग रहना नहीं चाहते. सच तो यह है कि पहाड़ के लोगों से उनके अधिकार हटाए गये. हक-हकूक केवल अधिकार नहीं बल्कि पहाड़ की जीवन व्यवस्था का संविधान थे. पलायन कोई विकल्प नहीं मज़बूरी था. पलायन केवल रोजगार की कमी नहीं बल्कि सामुदायिक अधिकारों के क्षरण की आर्थिक प्रतिक्रिया का नतीजा था.पलायन इस पर्वत प्रदेश की कमजोरी नहीं था वह ब्रिटिशकालीन औपनिवेशिक नीति का परिणाम था. पलायन दो सौ साल से अधिक पुरानी संरचना थी जो क्रमिक रूप से जोर पकड़ती रही और जिसे समझे बिना आज के उत्तराखंड के विकास की गुणात्मक नीति को उभार पाना संभव भी नहीं है. अब हम आगे के परिप्रेक्षय में रणनीति बनाएँ तो हमें यह स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिये कि पहाड़ अब श्रम निर्यात परिसर नहीं रहा बल्कि जनसंख्या के अवधारण के रूप में दिखाई देता है. यह एक ऐतिहासिक सुधार है. लोगों को इसमें विकास और सुविधाओं की उम्मीद दिखाई दे रही है, वहीं कुछ वर्ग अब भी अपने लिए ठोस योजनाओं की प्रतीक्षा कर रहे हैं. बजट को लेकर आम लोगों के बीच आने वाले समय में इन घोषणाओं का जमीन पर कितना असर दिखाई देता है, यह देखना दिलचस्प होगा. लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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