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सरकारी योजनाओं को पलीता, बड़ी समस्या

12/03/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
प्रदेश में जिन सरकारी विभागों पर कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने और विकास कार्यों को गति देने का जिम्मा है, वे बजट खर्च में पिछड़ने पर धनराशि समर्पित कर रहे हैं।10 करोड़ या इससे अधिक राशि खर्च नहीं होने पर यह नौबत आई है। ऐसे 28 विभागों ने 2366.13 करोड़ की राशि का उपयोग करने से ही हाथ खड़े कर दिए।भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) ने वित्तीय वर्ष 2023-24 के लिए अपनी रिपोर्ट में राज्य के वित्त और बजटीय प्रबंधन में इन खामियों को निशाने पर लिया है।यही नहीं, अनुपूरक बजट की 2477 करोड़ की राशि को भी खर्च नहीं करने के कारण लौटाना पड़ा। इस प्रकार 4000 करोड़ से अधिक का अनुपूरक अनुदान अनावश्यक साबित हुआ।प्रदेश सरकार जनहित में बजट के अधिक सदुपयोग पर जोर तो दे रही है तो विभाग अनुपूरक अनुदान के लिए हामी भरने में पीछे नहीं रहते, लेकिन बजट खर्च को लेकर तस्वीर एकदम उलट जाती है।शिक्षा, खेल एवं युवा कल्याण और संस्कृति के मद में वर्ष 2023-24 में मूल रूप से 9905.15 करोड़ का बजट रखा गया। बाद में अनुपूरक में 243.22 करोड़ और प्राप्त किए गए। हालत देखिए, कुल मिलाकर इसमें से 634.21 करोड़ की राशि खर्च नहीं हो सकी। यानी बच गई।चिकित्सा, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग ने अनुपूरक में 598.81 करोड़ मांग लिए, बाद में 860.61 करोड़ खर्च होने से ही बच गए।इसी प्रकार के कारनामे में कल्याण योजनाएं, सहकारिता, ग्रामीण विकास, लोक निर्माण, उद्योग, खाद्य, वन, पशुपालन, अनुसूचित जातियों व जनजातियों का कल्याण के मदों में बजट का उपयोग करने वाले कई विभाग सम्मिलित हैं।देश के अन्य राज्यों की भांति उत्तराखंड भी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के क्रियान्वयन में अनियमितताओं के दंश से अछूता नहीं है।भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है। राज्य में वर्ष 2019 से 2024 तक मनरेगा की लेखा परीक्षा से जुड़ी यह रिपोर्ट मंगलवार को विधानसभा के बजट सत्र में सदन के पटल पर रखी गई।इसके मुताबिक योजना के क्रियान्वयन और वित्तीय प्रबंधन में एक नहीं अनेक खामियां उजागर हुई। न तो ठीक से निगरानी की व्यवस्था को पुख्ता किया गया और न मनरेगा के प्रविधानों के अनुपालन को लेकर गंभीरता दिखाई गई।यही नहीं, कार्य की मांग का गलत अनुमान लगाया गया। और तो और ग्रामीण क्षेत्रों में 100 दिन के रोजगार की गारंटी होने के बावजूद छह वर्ष में मात्र चार प्रतिशत परिवारों को ही 100 दिन के काम का पूरा हक मिल पाया।कैग की रिपोर्ट के अनुसार राज्य में वर्ष 2019 से 2024 के दौरान मनरेगा के अंतर्गत पंजीकृत परिवारों की संख्या 10.35 लाख से लेकर 11.84 लाख के बीच थी।इस अवधि में 4.72 लाख से लेकर 6.54 लाख परिवारों को ही प्रतिवर्ष औसतन प्रति परिवार 21 दिनों का रोजगार मिल पाया। जमीनी स्तर पर परामर्श के बिना श्रम बजट स्वीकृत किया गया और आधारभूत सर्वेक्षण की अनदेखी की गई।इसके चलते मांग का गलत अनुमान लगाया गया और अभिसरण पहल में कमी आई। रोजगार के परिणाम असंतोषजनक पाए गए। पंजीकृत परिवारों में से मात्र एक से चार प्रतिशत को ही 100 दिन का रोजगार मिल पाया।साथ ही औसत वित्तीय लाभ भी लक्ष्य से काफी कम थे। कई जाब कार्डधारकों को आवेदन करने के बावजूद रोजगार से वंचित रखा गया। यही नहीं, वैधानिक प्रविधान होने के बावजूद बेरोजगारी भत्ते का भुगतान नहीं किया गया।कैग ने राज्य आकस्मिकता निधि, राजस्व बकाया वसूली, करेत्तर राजस्व में सुधार की आवश्यकता व्यक्त की है।आकस्मिकता निधि का उपयोग तो वेतन, कार्यालय खर्च, मानदेय, मजदूरी जैसे नियमित प्रकृति के लेन-देन के लिए हो रहा है। इसमें 111.30 करोड़ की राशि नियमों का उल्लंघन कर उपयोग में लाई गई। कैग ने इसे खराब बजटिंग का नमूना बता दिया।रिपोर्ट के अनुसार लेखा परीक्षा में यह बात भी सामने आई कि मनरेगा से संबंधित मस्टररोल में संदिग्ध प्रविष्टियां पाई गईं।अधिकांश मस्टररोल कार्य आरंभ होने के बाद भी अनुपलब्ध थे। इससे मजदूरी वितरण की सटीकता पर प्रश्न उठने लाजिमी हैं।बजट को लेकर आम लोगों के बीच आने वाले समय में इन घोषणाओं का जमीन पर कितना असर दिखाई देता है, यह देखना दिलचस्प होगा. लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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