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भारतीय हस्तशिल्प को नया रूप देने के लिए मास्टर बुनकर खेमराज सुंद्रियाल को पद्म श्री से सम्मानित किया गया

27/01/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
खेमराज सुंद्रियाल ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव सुमाड़ी से प्राप्त की. इसके बाद उन्होंने दसवीं तक की शिक्षा श्रीनगर गढ़वाल से पूरी की और वहीं से डिप्लोमा भी हासिल किया ग्रामीण मोहन चंद्र काला बताते हैं कि खेमराज सुंद्रियाल ने प्रारंभिक शिक्षा गांव में रहकर ही प्राप्त की और आठवीं तक की पढ़ाई गांव में पूरी की. इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए उन्हें श्रीनगर जाना पड़ता था.दसवीं कक्षा और डिप्लोमा की पढ़ाई के दौरान वे प्रतिदिन लगभग 15 किलोमीटर की कठिन यात्रा पैदल या साधनों के सहारे करते थे. इसके बावजूद उनकी पढ़ाई में कभी कमी नहीं आई. शिक्षा के प्रति उनका समर्पण गांव के बच्चों और युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत रहा है.मोहन चंद्र काला ने बताया खेमराज सुंद्रियाल बचपन से ही काफी मेहनती और कृषि बागवानी में परिवार का पूरा सहयोग करते थे. इसके साथ ही समय मिलने पर गांव के बच्चों को पढ़ाया भी करते थे. वे बच्चों के साथ एक सख्त लेकिन मार्गदर्शक शिक्षक की तरह व्यवहार करते थे. अनुशासन, समय पालन और मेहनत के संस्कार उन्होंने बच्चों में रोपेस जिसका लाभ आज भी कई ग्रामीणों को मिला है.. खेमराज सुंद्रियाल ने उत्तराखंड के एक साधारण किसान परिवार से पानीपत के विश्व प्रसिद्ध हथकरघा केंद्र के रूप में उभरने के पीछे एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने तक की अपनी उल्लेखनीय यात्रा साझा की।भारत सरकार के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ने भारतीय हस्तशिल्प में उनके छह दशकों के नवाचार, समर्पण और परिवर्तनकारी योगदान को मान्यता दी है।उत्तराखंड के सुमादी गांव में एक ऐसे परिवार में जन्मे खेमराज, जिसका बुनाई की कोई विरासत नहीं थी, को शुरुआती संघर्षों का सामना करना पड़ा।”छात्र के रूप में मुझे अपने संस्थान तक प्रतिदिन छह किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। मुझे ताने सुनने पड़ते थे और सामाजिक उपेक्षा का सामना करना पड़ता था क्योंकि मेरे जैसे पृष्ठभूमि के व्यक्ति के लिए बुनाई को एक प्रतिष्ठित पेशा नहीं माना जाता था,” उन्होंने याद किया।”लेकिन मैंने बुनाई को अपने जीवन का लक्ष्य चुना। ब्राह्मण या क्षत्रिय जैसी कोई चीज नहीं होती; काम ही सबसे बड़ा धर्म है।”वाराणसी से सरकारी तबादले के बाद 1966 में पानीपत पहुंचने पर, उन्होंने जवाहरलाल नेहरू और पुपुल जयकर के समर्थन से स्थापित बुनकर सेवा केंद्र में काम करना शुरू किया, जहां विभाजन के दौरान विस्थापित हुए लोगों को रोजगार दिया जाता था।उन्होंने कहा, “वह एक महत्वपूर्ण मोड़ था। मैंने पारंपरिक खेस बुनाई के साथ प्रयोग किया, इसे बेडशीट, बेड कवर और आधुनिक उत्पादों में परिवर्तित किया, जिससे नए बाजार खुल गए।”उनकी सबसे क्रांतिकारी उपलब्धि जामदानी कला को – जो परंपरागत रूप से सूती मलमल पर की जाती थी – ऊनी शॉल पर रूपांतरित करना था।उन्होंने बताया, “लोगों ने कहा था कि यह असंभव है, लेकिन मैंने साबित कर दिया कि ऊन पर इसे खूबसूरती से किया जा सकता है।” इस उपलब्धि ने उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार दिलाए और उद्योग को पुनर्जीवित किया। खेमराज ने एमएफ हुसैन की पेंटिंग्स को भी जीवंत बुनी हुई टेपेस्ट्री के रूप में पुनः प्रस्तुत किया।उन्होंने गर्व से कहा, “इसमें इतनी बारीकी से काम किया गया था कि देखने वाले यह नहीं बता सकते थे कि यह चित्रित है या बुना हुआ है।”उन्होंने टेपेस्ट्री और दीवार पर टांगने वाली कलाकृतियों को उन्नत रूप दिया, और प्रसिद्ध कलाकृतियों को करघों पर कैनवास जैसी सटीकता के साथ पुन: प्रस्तुत किया। कच्चे रंग से लेकर स्थायी रंगाई तक, उन्होंने गुणवत्ता में सुधार लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।उन्होंने कहा, “शुरुआत में लोग हिचकिचाते थे, लेकिन मैंने प्रशिक्षण की व्यवस्था की। आज पानीपत की रंगाई विश्व स्तरीय है।”पुरस्कार मिलने पर खुशी जाहिर करते हुए खेमाराज ने आभार व्यक्त किया। उन्होंने बताया, “मैंने पिछले साल आवेदन किया था और इस बार मुझे बुलावा आया। परिवार खुशी से झूम उठा।”उनकी बहू ने कहा, “यह एक सपने के सच होने जैसा है। पापा (पिताजी) ने बहुत पहले जिस कला को अपनाया था, उसे अब दुनिया पहचान रही है।” सरकार के योग्यता-आधारित दृष्टिकोण की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा, “अब पुरस्कार योग्यता के आधार पर दिए जाते हैं, न कि सिफारिशों के आधार पर। वर्षों से गुमनाम रहे लोगों को सम्मानित करना सराहनीय है।”युवाओं के लिए उनका संदेश स्पष्ट है: “कड़ी मेहनत रंग लाती है। पारंपरिक कला और हथकरघा को लगन से अपनाएं – यह सम्मान कई लोगों को प्रेरित करेगा।”खेमराज सुंद्रियाल का नाम अब पानीपत की पहचान का पर्याय बन गया है। उनकी नवोन्मेषी विरासत भारत की सांस्कृतिक विरासत में गौरव का संचार करती आ रही है।खेमराज सुंद्रियाल को कला के क्षेत्र में पद्मश्री सम्मान के लिए चुना गया है. खेमराज सुंद्रियाल वैसे तो हरियाणा के पानीपत में रहते है, लेकिन मूल रूप से वो उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के सुमाड़ी गांव के रहने वाले है. खेमराज सुंद्रियाल को पद्मश्री सम्मान के लिए चुना जाने पर उनके गांव सुमाड़ी में जश्न का माहौल है. हरियाणा के पानीपत के हैंडलूम को विदेशों तक पहुंचाने के श्रेय 84 साल के बुनकर खेमराज सुंदरियाल को ही जाता है. लगभग 83 वर्षीय खेमराज सुंद्रियाल ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव सुमाड़ी से प्राप्त की. इसके बाद उन्होंने दसवीं तक की शिक्षा श्रीनगर गढ़वाल से पूरी की और वहीं से डिप्लोमा भी हासिल किया. शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात वे रोजगार की तलाश में गांव से बाहर निकले. संघर्षों से भरी इस यात्रा में उन्होंने विभिन्न स्थानों पर कार्य किया और अपने कौशल व मेहनत के बल पर हैंडलूम के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान बनाई. इससे पूर्व भी खेमराज सुंद्रियाल को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के कार्यकाल में राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया जा चुका है. अब पद्मश्री सम्मान की घोषणा से न केवल उनका परिवार बल्कि पूरा सुमाड़ी गांव और जनपद पौड़ी गढ़वाल गौरवान्वित महसूस कर रहा है. खेमराज सुंद्रियाल की जीवन यात्रा नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है, जिसने यह साबित किया है कि कठिन परिश्रम, लगन और ईमानदारी से किसी भी मुकाम को हासिल किया जा सकता है. गांव में रह रही लगभग 80 वर्षीय वृद्धा और उनकी भाभी रमा देवी भावुक होकर बताती हैं कि खेमराज सुंद्रियाल बचपन से ही अत्यंत कर्मठ, अनुशासित और जिम्मेदार व्यक्ति रहे हैं. परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी. ऐसे में खेती-बाड़ी के साथ-साथ घर के अन्य सभी काम भी उन्हें स्वयं करने पड़ते थे. कठिन परिस्थितियों में पले-बढ़े खेमराज सुंद्रियाल ने मेहनत और लगन को ही अपनी ताकत बनाया. आज उन्हें मिलने वाला पद्मश्री सम्मान पूरे परिवार के लिए गर्व और खुशी का विषय है. : ग्रामीणों ने खुशी जताते हुए कहा कि उनके गांव से दो-दो लोगों को पद्मश्री सम्मान मिलना पूरे गांव और क्षेत्र के लिए गौरव की बात है. इससे न केवल गांव की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर बनी है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली है.वहीं ग्राम प्रधान कृष्णा देवी बहुगुणा ने बताया कि गांव के लिए यह ऐतिहासिक क्षण है. उन्होंने कहा कि खेमराज सुंद्रियाल को पद्मश्री सम्मान मिलना उनकी वर्षों की साधना और योगदान का परिणाम है. ग्राम प्रधान ने आशा व्यक्त की है कि भविष्य में खेमराज सुंद्रियाल गांव आकर अपनी कला और अनुभवों को युवाओं के साथ साझा करेंगे और उन्हें स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रेरित करेंगे. आज खेमराज सुंद्रियाल स्वयं भी इस सम्मान से बेहद प्रसन्न हैं. उनके सम्मान से न केवल उनका परिवार, बल्कि पूरा गांव खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा है.यह कहानी साबित करती है कि सीमित संसाधनों और कठिन हालातों के बावजूद यदि संकल्प मजबूत हो, तो व्यक्ति राष्ट्रीय पहचान हासिल कर सकता है. बता दें कि खेमराज सुंदरियाल 1975 में पानीपत बुनकर सेवा केंद्र पहुंचे थे. यहीं से उनका असली सफर शुरु हुआ था. खेमराज सुंदरियाल को पानीपत इनता भाया कि वो इस शहर में बस गए.बताया जाता है कि खेमराज सुंदरियाल ने लंबे समय तक खड्डी चलाई. ग्रामीण इलाकों में ‘खड्डी’ उस मशीन या लकड़ी के ढांचे को कहते हैं, जिस पर सूती या रेशमी धागों से कपड़ा बुना जाता है. इसके बाद वे टेक्सटाइल इंडस्ट्री से जुड़े और फिर कुछ ऐसे डिजाइन तैयार किए जो देश ही नहीं बल्कि विदेशों में काफी ज्यादा मशहूर हुए. उन्होंने इस दौरान स्थानीय बुनकरों को प्रशिक्षण देना शुरू किया और उनकी कला को एक नया आसमान मुहैया कराया. खेमराज सुंदरियाल ने हजारों लोगों को हैंडलूम की ट्रेनिंग दी और भारतीय हस्तशिल्प को विश्व पटल पर पहचान दिलाई. साथ ही हजारों लोगों को रोजगार का साधन मुहैया कराया. पानीपत में पारंपरिक खेस को किया पुनर्जीवित वर्ष 1975 में पानीपत आकर उन्होंने पारंपरिक खेस को पुनर्जीवित किया। नए डिजाइन, आधुनिक रंगाई और बुनाई तकनीकों के जरिए खेस, बेडशीट और पर्दे के कपड़े को स्वदेशी और विदेशी बाजारों तक पहुंचाया।उन्होंने पानीपत में एक सहकारी समिति की स्थापना की, जो बीते 12 वर्षों से प्रतिवर्ष 25 से अधिक बुनकरों को प्रशिक्षण और रोजगार उपलब्ध करा रही है। उनकी तकनीकों और प्रयासों से पानीपत हैंडलूम एक प्रमुख निर्यात केंद्र के रूप में उभरा। खेमराज सुंदरियाल ने न केवल बुनकरों, बल्कि छात्रों और समाज के वंचित वर्गों के लिए भी कार्य किया।उन्होंने एनआइएफटी, एनआइडी और ललित कला महाविद्यालय के छात्रों को स्वेच्छा से प्रशिक्षण दिया और एनआइएफटी कांगड़ा के विद्यार्थियों को अपनी सहकारी समिति में इंटर्नशिप का अवसर दिया।इसके अलावा तिहाड़ जेल और करनाल जेल के कैदियों सहित एक हजार से अधिक युवाओं को प्रशिक्षण देकर रोजगार और स्वरोजगार की दिशा दिखाई। खेमराज सुंदरियाल का जीवन संघर्ष, नवाचार और समाज सेवा के माध्यम से भारतीय हैंडलूम परंपरा को सशक्त करने की प्रेरक गाथा है।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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