डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड को भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है. देवभूमि के कण-कण में शिवत्व की अनुभूति का एहसास अनुभव किया जा सकता है. जहां बाबा भोलेनाथ की बात हो रही हो तो उनके वाद्य यंत्र की बात कैसे अछूती रह सकती है. जो भगवान शिव का काफी पसंद है. माना जाता है कि देवभूमि उत्तराखंड में खास मौकों पर बजाया जाने वाला ढोल-दमाऊ की उत्पत्ति शिव के डमरू से हुई है. उत्तराखंड की कुमाऊंनी होली रंगों से ज्यादा अपने संगीत और लोकगीतों के लिए दुनिया भर में मशहूर है. इन्हीं गीतों में एक ऐसी परंपरा शामिल है जो कभी गांवों में हंसी और ठहाकों की गारंटी मानी जाती थी, जिसे ‘भगनौल’ कहा जाता है. हल्के व्यंग्य और चुटकुलों से भरे ये लोकगीत न केवल मनोरंजन का साधन थे, बल्कि आपसी एकता का प्रतीक भी थे. लेकिन पलायन और आधुनिकता के शोर में अब ये पारंपरिक स्वर धुंधले पड़ते जा रहे हैं भगनौल असल में हंसी-मजाक और व्यंग्य से भरे लोकगीत होते हैं. इन्हें खास तौर पर होली के दौरान गांव के बुजुर्गों द्वारा गाया जाता है. इन गीतों में हल्के कटाक्ष और मजेदार बातें शामिल होती हैं. जब गांव के लोग एक जगह इकट्ठा होते हैं, तो ढोलक, मंजीरा और हुड़के की थाप पर भगनौल की महफिल सजती है. इन गीतों में अक्सर किसी व्यक्ति, जानवर या गांव की किसी रोचक घटना को मजाकिया अंदाज में गाया जाता है, जैसे एक लोकप्रिय भगनौल की ये पंक्तियांहैं-
“शाबाश मेरा मोतिया बल्दा, तोड़ी लें गे छे सिंगा,
9 रुपये क मोतिया बल्दा, 100 रुपये क सिंगा.”
इन पंक्तियों के जरिए मजेदार ढंग से बातें की जाती हैं, जिससे सुनने वाले ठहाके लगाने को मजबूर हो जाते हैंभगनौल के बाद ‘जोड़’ गाने की भी एक विशेष परंपरा रही है. जोड़ का अर्थ होता है किसी गीत को आगे बढ़ाना या उसे नया मोड़ देना. इसमें गायक देवी-देवताओं, गांव की प्राचीन मान्यताओं या किसी खास प्रसंग को मुख्य गीत के साथ जोड़ देते थे,
जैसे-
“धार में देवी को थाना, दुधल नवायो,
तेरो जूठ मी नि खांची, माया लें खवायो.”
इस तरह एक गीत से दूसरा गीत जुड़ता जाता था और पूरी रात गीत-संगीत का सिलसिला चलता रहता था. यह परंपरा पीढ़ियों से मौखिक रूप से एक-दूसरे तक पहुंचती रही है. स्थानीय बुजुर्ग बताती हैं कि पहले के समय में होली के दौरान हर शाम बैठकी होती थी, जहां बुजुर्ग अपने अनुभव और लोकगीतों के जरिए नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ते थे. लेकिन आज पलायन और आधुनिकता के कारण यह परंपरा दम तोड़ रही है. युवा पढ़ाई और नौकरी के लिए शहरों की ओर पलायन कर गए हैं और मोबाइल व फिल्मी गानों के बढ़ते चलन ने पारंपरिक लोकगीतों को पीछे छोड़ दिया है. अब गांवों में केवल कुछ ही बुजुर्ग बचे हैं जो भगनौल गा सकते हैं, जबकि नई पीढ़ी इन गीतों की गहराई से पूरी तरह अनजान है. सांस्कृतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते इस परंपरा को नहीं सहेजा गया, तो आने वाले वर्षों में भगनौल केवल किताबों और यादों तक ही सीमित रह जाएंगे. बुजुर्गों का कहना है कि गांवों में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करना और युवाओं को इन गीतों को सीखने के लिए प्रेरित करना बेहद जरूरी है. पहाड़ी होली की यह अनमोल विरासत हमारी सांस्कृतिक जड़ें हैं. हमें मिलकर इस परंपरा को बचाना होगा ताकि आने वाली पीढ़ियां भी पहाड़ की इस सादगी और हंसी से जुड़ी रह सकें. वहीं, स्थानीय लोक संस्कृति के जानकार ने बताया कि एक समय ऐसा भी था, जब चौक बाजार में बैर भगनोल करने वालों की भारी भीड़ हुआ करती थी. आज युवा पीढ़ी इससे काफी दूर है. उन्होंने कहा कि कुछ जानकार आज भी अपनी संस्कृति को बचाए हुए हैं. अगर शासन और प्रशासन इस ओर ध्यान दें तो इस पौराणिक संस्कृति को बचाया जा सकता है. देवभूमि उत्तराखंड में खास मौकों पर ढोल-दमाऊ की थाप सुनाई देती है. इसके बिना देवभूमि में मांगलिक कार्य अधूरे से लगते हैं. ढोल वाद्य यंत्र से देवी-देवताओं का आह्वान किया जाता है. धार्मिक अनुष्ठानों में ढोल-दमाऊ से ही देवताओं की नोबत लगाई जाती है.वहीं हुड़के का प्रयोग जागर, झोड़ा, छपेली, चांचरी, भगनौल में किया जाता है. बताते चलें कि ढोल- दमाऊ उत्तराखंड का प्राचीन वाद्य यंत्र है. यह दोनों तांबे से बने होते है और दोनों को साथ ही बजाया जाता है. साथ ही इस बाद्य यंत्र को काफी देखरेख की जाती है. वहीं अब इन बाद्य यंत्रों पर आधुनिकता की मार साफ देखी जा सकती है. शादी-विवाह में अब बैंड बाजों की धुन ज्यादा सुनाई देती है. जिससे पारंपरिक ढोल- दमाऊ बजाने वाले लोगों के आगे रोजी-रोटी का संकट पैदा हो रहा है.अमेरिका की सनसिटी यूनिवर्सिटी के छात्र उत्तराखंड की विलुप्त हो रही परंपरा को सीख रहे हैं. लोकगीत गायन से जुड़े रहे दीवान कनवाल के कथनानुसार, पुरानी गायन शैली के अंतर्गत आने वाले बैर और भगनौल अब समाप्ति की ओर हैं. फाग, भडो, हुड़किया बौल भी लगभग समाप्ति की ओर अग्रसर हैं. हुड़किया बौल में तर्क से हट कर वितर्क किया जा रहा है जिससे उक्त पारंपरिक गायन परंपरा समाप्ति की ओर अग्रसर है. चैती व भिटौली गायन परंपरा आज के डीजे परंपरा में कितने समय तक टिकेगी कहा नहीं जा सकता है. इस लोकगीत रचनाकार का मानना है, गीतों का अपनी जमीन से कटना संस्कृति के लिए बेहद नुकसानदायक है. इससे न गंभीर कलाकार पैदा होंगे, न कला का ही संरक्षण व संवर्धन होगा. गीत रचनाकार व लोकगीत गायक संयम रखे तभी पारंपरिक लोकगायन की लंबी पारी चल सकती है.रंगमंच के क्षेत्र में गहरा अनुभव रखने वाले दीवान कनवाल के कथनानुसार, नाटकों का मंचन पहाड़ी अंचल में लगभग समाप्त हो गया है. काम नहीं दाम का भगुवा हो गया है. आज के स्थापित कलाकारों को सब कुछ करा कराया चाहिए. उन पर मुंबईया फिल्मी शान-शौकत का असर ज्यादा छा गया है. बिना तालीम कलाकार अपने आप को ज्यादा असरदार समझने लगा है. हर संस्कृति में प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है. तालीम जरूरी है.सदा अभावग्रस्त कलाकारों की पैरवी करने वाले लोकगीत गायक दीवान कनवाल को कलाकारों का हित साधने और उनके हित में बोलने वाले चन्द्र सिंह राही, गोपाल बाबू गोस्वामी तथा हीरा सिंह राणा का व्यक्तित्व व्यवहार कुशल लगा. कलाकारों व सांस्कृतिक संस्थाओं के प्रति सरकारी नीतियों व बे-पैर के आदेशों का यह अनुभवी लोकगीत गायक निंदक रहा है. मानना रहा है, सरकार कार्यक्रम तो करवाती है लेकिन गरीब और अभावग्रस्त कलाकारों का मेहताना देने में दो से चार वर्ष तक का समय लगा देती है. कलाकार उक्त सरकारी नीति से टूट रहा है या चापलूसी में जीवन यापन कर रहा है जो अति शर्मनाक है. कलाकारों का उचित पारिश्रमिक समय से चुकता कर देना चाहिए.लोकसंस्कृति को समर्पित इस लोकगीत गायक के कथनानुसार, लोग व्यक्ति को नहीं उसकी कला को तवज्जो देते हैं. रचे जा रहे आंचलिक गीतों में शब्दों का चयन घटिया हो गया है. आंचलिक शब्दो की जगह अन्य बोली-भाषाओं के शब्दों का चयन किया जा रहा है. जरूरत है शुद्ध आंचलिक या साहित्यिक शब्दों का तानाबाना बुनकर उनको गीतों में पिरोने की, जिससे अंचल और अंचल के गीतों की गरिमा बनी रह सके. बोली-भाषा के मानकीकरण पर इस लोकगीत गायक का मानना रहा है, हर कोश पर अंचल में शब्द बदल जाते हैं. बहुप्रचलित शब्दों का प्रयोग गीतों व बोलचाल में हो. अच्छे लोक कवियों की रचनाओं को प्रतिबद्ध होकर आगे लाया जाना चाहिए जो संबल बने. हर शहर में सांस्कृतिक व सामाजिक संस्थाए हैं, अच्छा कार्य कर रही हैं. कलाकारों के मन-मष्तिष्क में सोच होनी चाहिए वे अपनी लोक संस्कृति के लिए कार्य कर रहे हैं, न कि स्वयं के लिए. कलाकार वरिष्ठ कलाकारों का सम्मान करे. संस्कृति का सम्मान करे.अपने दिल की व्यथा-वेदना से प्रकट शब्दो को गीत गायन तक पहुंचाने वाले, आंचलिक बोली-भाषा और लोक संस्कृति के संरक्षण व संवर्धन के लिए सदा समर्पित रहे लोकगीत गायक व गीत रचनाकार दीवान कनवाल का सपना है, उत्तराखंड राज्य सांस्कृतिक स्मृद्धि की ओर बढ़ कर खुशहाल बने. वहीं प्रोत्साहन के अभाव में देवभूमि का ये पारंपरिक अब अपने ही प्रदेश में अपनी अस्तित्व को बचाए रखने की लड़ाई लड़ रहा है. लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.












