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पुरानी मानव सभ्यता के अवशेष हैं लख उडियार

09/10/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र
उत्तरखण्ड अल्मोड़ा से 14 किमी दूर लखुडियार में सुआल नदी के किनारे स्थित चट्टान के आठ मीटर लंबे और छह मीटर ऊंचे हिस्से में अनेक शैल चित्र बने हैं। ये शैल चित्र प्रागैतिहासिक काल के माने जाते हैं। इन चित्रों में नृत्य मुद्रा में मानव आकृतियां बनी हुई हैं। इन आकृतियों के अलावा ज्यामितीय डिजाइन, बिंदु समूह, सर्पीलीकार रेखाएं, पेड़ों जैसी आकृतियां और पशु आदि के चित्र भी बने हैं। इसी तरह अल्मोड़ा-ताकुला मोटर मार्ग में डीनापानी से करीब तीन किमी दूर ल्वेथाप में भी शैल चित्र मौजूद हैं। लख उडियार (हिन्दी: एक लाख गुफाऐं) उत्तराखण्ड राज्य के कुमाऊँ मण्डल में अल्मोड़ा-सेराघाट मार्ग पर अल्मोड़ा से १३ किमी की दूरी पर स्थित एक प्राचीन गुफा है। गुफा के भीतर एक विशाल चट्टान पर प्राचीन चित्र देखे जा सकते हैं। माना जाता है कि ये चित्र प्रागैतिहासिक काल में आदिमानवों द्वारा बनाये गए थे। इन चित्रों में उनके दैनिक जीवन, जानवर और शिकार के तरीकों को काले, लाल और सफेद रंगों में उंगलियों द्वारा बनाया गया है।मानव सदा से ही अपने विचारों को, भावनाओं को चित्रकारी, संगीत, नृत्य, साहित्य आदि माध्यमों से अभिव्यक्त करता रहा है। पाषाण काल में भी जब मानव अन्न, आश्रय हेतु घर, वस्त्र, अग्नि से परिचित भी नहीं था, तब भी मानव ने गुफाओं की दीवारों पर चित्र अंकित कर अपनी रचनात्मकता व कला का अद्वितीय उदाहरण दिया है।सम्पूर्ण संसार में ऐसे अनेक चित्रित शैलाश्रय पाये गये हैं । भारत में भी अनेक चित्रित शैलाश्रय, गुफायें पायी गई हैं जिनमें भीमबेटका, अजन्ता, एलौरा, बाघ उदाहरणीय हैं। उत्तराखंड में लाखु उड्यार गुफा, ग्वारख्या गुफा, हुडली, ल्वेथाप, किमनी, पेटशाल आदि ऐसे ही स्थल हैंलाखु उड्यार गुफा एक पूर्व एतिहासिक पाषाण कालीन चित्रित शैलाश्रय है । यह आदम युग के मानव के आवास के लिये उपयोग होती रही होगी, जो उसे मौसमी घटनाओं से बचने के लिये एक प्राकृतिक आवास प्रदान करती होगी चितई मन्दिर से आगे बाड़ेछीना के पास एक संरक्षित जगह है लखुडियार। यहां पर पुरानी मानव सभ्यता के अवशेष हैं (सिन्धु घाटी के समकालीन) यहां पर उनके द्वारा पेंटिग्स बनायी गयी हैं, जो आज भी दिखाई देती हैं। यह स्थान ASI के सरक्षण में है, लेकिन इसे सरकारी स्तर पर विकसित करने का कोई प्रयास अभी तक नहीं हुआ है और ना ही यह अभी तक पर्यटन मानचित्र में अपना स्थान बना पाया है।
जब कि यह बहुत ही ऎतिहासिक स्थान है, यह इस बात का भी प्रतीक है कि उस जमाने में भी हमारे यहां मानव सभ्यता विद्यमान थी। संभवतः पूरे उत्तराखण्ड में अकेला ऎसा स्थान है, जो मानव सभ्यता के प्रमाण देते हैं।जिस गुफा में यह शैल चित्र बने हैं वह पूरी तरह से खुली है और बरसात का पानी रिसकर अंदर पहुंचता है जिससे शैल चित्र खराब होने लगे हैं। यदि शैल चित्रों को संरक्षित नहीं किया गया तो मानव इतिहास से जुड़ी यह अनूठी कृति कहीं कहानी बनकर न रह जाए। पुरातत्व विभाग ने इस गुफा के संरक्षण की योजना बनाकर भारत सरकार को भेजी है लेकिन अभी तक इसे मंजूरी नहीं मिली है। इनमें पेटशाल के निकट लखुडियार के शैल चित्रों को राज्य पुरातत्व विभाग ने 1992 में संरक्षण पर ले लिया, लेकिन ल्वेथाप, फलसीमा, फड़कानौली, कसारदेवी और कफ्फरकोट की कुछ चट्टानों पर बने शैल चित्र संरक्षण में नहीं लिए गए। ये बरबाद होने की स्थिति में हैं। अल्मोड़ा से 14 किमी दूर लखुडियार में सुआल नदी के किनारे स्थित चट्टान के आठ मीटर लंबे और छह मीटर ऊंचे हिस्से में अनेक शैल चित्र बने हैं। ये शैल चित्र प्रागैतिहासिक काल के माने जाते हैं। इन चित्रों में नृत्य मुद्रा में मानव आकृतियां बनी हुई हैं।इन आकृतियों के अलावा ज्यामितीय डिजाइन, बिंदु समूह, सर्पीलीकार रेखाएं, पेड़ों जैसी आकृतियां और पशु आदि के चित्र भी बने हैं। इसी तरह अल्मोड़ा-ताकुला मोटर मार्ग में डीनापानी से करीब तीन किमी दूर ल्वेथाप में भी शैल चित्र मौजूद हैं। यहां उकेरी गई कुछ आकृतियां लखुडियार से हटकर हैं। इनके अलावा अल्मोड़ा के निकट फलसीमा, कसारदेवी, फड़कानौली और कफ्फरकोट में भी शैलाश्रय हैं।प्राचीन काल में यहाँ पर दोबारातों की आपस में भैंट होने से खूनी संघर्ष हो गया। यह संघर्ष इतना विकराल हुआ था कि जिनके खून से इस प्रकार के चित्र बना दिये गये, और लाख उडियार भी बनाये गये” आज भी आम जन में यह धारणा सत्य है परन्तु खून से निर्मित चित्र नहीं है। यदि लोक में देखा जाये तो अवश्य ही आज भी पिछड़े एंव ग्रामीण क्षेत्रों में (दो दुल्हों) दो बारातों की भैट नहीं करवाते हैं। पूर्व की तरह आज भी दो में से एक को उनमें से छुपा देते अथवा एक दूसरे पर नजर नहीं डालते हैं।यदि हिमालय को सही मायने में बचा लिया तो उसके धारे भी लौटेंगे और लौटेगा इस संस्कृति पर आधारित पूरा जीवन और जीवन-दर्शन। लखुडियार के अलावा अन्य स्थानों के शैलाश्रयों के बारे में स्थानीय लोगों को भी जानकारी नहीं है। यदि पुरातत्व विभाग ने शीघ्र योजना नहीं बनाई तो ये सदा के लिए विलुप्त हो सकते हैं।अल्मोड़ा तहसील के फलसीमा में काली मंदिर के निकट एक चट्टान पर बने शैलचित्र पिछले कुछ सालों में पूरी तरह नष्ट हो गए। पुरातत्वविद कौशल किशोर सक्सेना ने बताया कि दो दशक पहले तक यह शैलाश्रय वहां मौजूद थे, लेकिन इन्हें भी संरक्षित नहीं किया गया। हाल के वर्षों में पत्थर के धंधेबाजों ने इस चट्टान को नुकसान पहुंचाकर यह शैलाश्रय भी नष्ट कर दिए। वास्तव में लखुडियार एक ऎसी धरोहर है, जिसे बहुत संभाल के रखने की आवश्यकता है। इससे पता चलता है कि हमारे उत्तराखण्ड मे मानव सभ्यता न जाने कितने वर्षों से निवास करती आ रही है। राज्य सरकार और ASI  को चाहिये कि आपसी समन्वय स्थापित कर इस स्थान को संरक्षित करने का प्रयत्न किया जाय, ताकि आने वाली पीढ़ी यह जान सके कि हमारी विरासत कितनी समृद्ध है और हमारे पूर्वज न जाने कितने साल पहले से यहां पर निवास कर रहें हैं।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं*

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