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औषधीय गुणों से भरपूर मकोय

02/04/20
in उत्तराखंड, हेल्थ
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
मकोय प्रजाति लगभग सम्पूर्ण भारत में पायी जाने वाली वनस्पति है, जो अधिकतर आद्र और छायादार जगहों पर उगती है, इसके पौधे की अधिकतम लम्बाई 2 से 2.5 फीट तक हो सकती है। आयुर्वेद के नजरिये से देंखे तो यह दिव्य औषधि है जिसे संस्कृत में काक्माची कहते है। इसके पत्ते मिर्च के पत्ते की तरह लट्टवकार 2 से 3 इंच लम्बे और 1 से 1.5 इंच चौड़े होते है। मकोय के फुल गुच्छो में लगते है जिनकी संख्या एक गुछे में 4 से 6 तक हो सकती है, इनका रंग सफ़ेद और आकार में बिलकुल छोटे होते है। इसके फल जिसे रसभरी भी कह सकते है सवा इंच के व्यास में छोटे और गोल होते है, पकने पर ये लाल, नील या पीले रंग के हो जाते है। ये फल पकने पर मीठे हो जाते है खेतों में अनावश्यक रूप से उगने वाली मकोय, गजरा, आलू का तना डरका जैसे खरपतवार कई दवाइयों को बनाने में काम आते हैं।
आयुर्वेदिक व अंग्रेजी दवा कम्पनियों में ऐसे खरपतवारों की अच्छी मांग रहती है। खाली सीजन में क्षेत्र के कई गाँवों के लोग इन खरपतवारों को खेतों से इकठ्ठा करके बेचने का कार्य करते हैं। जिससे बिना लागत के किसानों की आमदनी हो जाती है। एक कुंतल ताज़ी मकोय से लगभग 25 किलो सूखा माल निकलता है। इस तरह लगभग रोज 300 से 400 रुपए तक काम हो जाता है। यह सीजन केवल महीने भर का होता है। महीने भर में लगभग 12 से 15 हजार रुपए की अतिरिक्त कमाई हो जाती है, जिससे परिवार का खर्च निकल जाता है। मेडिकल की दुकान चलाने वाले बताते हैं, मकोय का प्रयोग इंजाइम बनाने वाली सीरप में अधिक किया जाता है। इसके अलावा मकोय का प्रयोग लीवर गठिया, बवासीर, सूजन, दिल के रोग आंखों की बीमारी, खांसी उल्टी और कफ जैसी बीमारियों की आयुर्वेदिक व अंग्रेजी दवाइयों को बनाने में होता है। इसके साथ ही इसका साग बना कर खाने से पेट से सम्बंधित सभी बीमारियों का खात्मा हो जाता है।
काली मकोय किस्म की रसभरी लगाई। इससे एक लाख रुपए प्रति बीघा की कमाई ले रहे हैं। काली मकोय रसभरी खाने के साथ आयुर्वेदिक दवा में काम आती है। इससे ह्रदय और लीवर की कई बीमारियों की दवा बनती है। इन बीमारियों में इसका सामान्य रूप से उपयोग करना भी हितकारी होता हैए इसलिए इसकी बाजार में मांग रहती है। इसका बाजार भाव करीब 150 से 200 रुपए तक रहता है। दिल्ली इसका बड़ा मार्केट है।
इस किस्म की रसभरी की पैदावार एक बीघा में करीब 800 किलो तक है। बाजार भाव करीब 150 से 200 रुपए किलो तक रहता है। आम, केला, चीकू, खट्टे नींबू, काली मिर्च, नारियल, हल्दी, अदरक, काजू के उत्पादन में भारत विश्व में प्रथम स्थान पर हैं। सिक्किम देश का पहला राज्य था। सिक्किम ने लम्बे समय तक मिट्टी की उर्वरकता बनाये रखने, पर्यावरण, पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण, स्वस्थ जीवन और हृदय सम्बन्धी खतरे को कम करने के मकसद से इस लक्ष्य को हासिल करने का संकल्प लिया था उत्तराखंड ने जैविक खेती में मिसाल पेश की है राज्य ने एक बार फिर से भारत का मान बढ़ाया है। अपने शरीर को कुछ खाद्य पदार्थ खिलाने से आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत रह सकती है खेती के कारण उसके आसपास गांवों के लोगों को इससे रोजगार भी मिल रहा है। किसान को भी इसकी खेती से दोगुनी आमदनी हो रही है। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में प्रदेश में उच्च गुणवत्तायुक्त के फसल उत्पादन कर देश.दुनिया में स्थान बनाने के साथ राज्य की आर्थिकी तथा पहाड़ी क्षेत्रों में पलायान को रोकने का अच्छा विकल्प बनाया जा सकता है।
अगर ढांचागत अवस्थापना के साथ बेरोजगारी उन्मूलन की नीति बनती है तो यह पलायन रोकने में कारगर होगी उत्तराखण्ड हिमालय राज्य होने के कारण बहुत सारे बहुमूल्य उत्पाद जिनकी अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में अत्यधिक मांग रहती है प्रदेश विज्ञान एवं पर्यावरण परिषद को भी पेटेंट करवाया की जरूरत है। उत्तराखंड की संस्कृति एवं परंपराओं ही नहीं, यहां के खान.पान में भी विविधता का समावेश है। जिससे आज यह औषधि विलुप्त होने के कगार पर है, अतः इसका संरक्षण आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

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