डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड माल्टा यह सिट्रस प्रजाति का फल है, जिसका वैज्ञानिक नाम सिट्रस सिनानसिस है.-उत्पादन में देश में सर्वोच्च स्थान रखता है. यहां करीब 1000 मीट्रिक टन माल्टा हर साल पैदा होता है. सरकार भी उत्तराखंड के स्थानीय फल माल्टा फलों को माल्टा महोत्सव के द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना चाहती है. इसके लिए जगह-जगह माल्टा महोत्सव आयोजित होते हैं. माल्टा उत्तराखंड की पहचान और परंपरा से जुड़ा है। पहाड़ में धूप में बैठकर इसके स्वाद का आनंद ही कुछ और है। इसके बावजूद दूरदराज के क्षेत्रों में किसानों को माल्टे और नींबू वर्गीय फलों के अच्छे दाम नहीं मिल पा रहे हैं। इसे देखते हुए सरकार ने माल्टे की ब्रांडिंग और इसे बेहतर बाजार उपलब्ध कराने के लिए पहली बार राजकीय उद्यान सर्किट हाउस गढ़ीकैंट में माल्टा महोत्सव का आयोजन किया। लेकिन जमीनी स्तर पर अभी इस मुहिम का उतना फायदा नहीं दिख रहा, जितना होना चाहिए था. प्रदेश के पहाड़ी इलाकों समेत उत्तराखंड के सीमांत पिथौरागढ़ जिले में इन दिनों माल्टा के पेड़ फलों से लदे हुए हैं. धूप में बैठकर रसदार माल्टा फल का स्वाद लिया जाता है, लेकिन माल्टा उगाने वालों की जेब भी खाली ही रहती है. माल्टा का न्यूनतम समर्थन मूल्य बेहद कम है और बाजार की कोई व्यवस्था नहीं है. पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट, बेरीनाग और डीडीहाट के ग्रामीण क्षेत्रों में माल्टा बड़ी मात्रा में होता है. एक पेड़ पर तकरीबन दो क्विंटल तक की उपज होती है. पूर्व में राज्य सरकार ने माल्टा की तीन ग्रेड बनायी थी. 7-10 रुपये प्रति किलो तक न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय किया था. लेकिन खरीद की कोई व्यवस्था नहीं बनायी गई है. काश्तकारों का कहना है कि उद्यान विभाग ने अपने स्टॉल नहीं लगाए हैं. न ही माल्टा को कोई बाजार मिल पाया. पिछले दिनों सीएम के द्वारा माल्टा महोत्सव का आयोजन कर माल्टा को बढावा देने की बात कही गई थी. पूर्व सीएम के द्वारा लगातार माल्टा महोत्सव का आयोजन जा रहा है. गांवों में आकर लोग 8-10 रुपये किलो के हिसाब से फल खरीद रहे हैं. अगर बाजार तक फल ले जाओ तो 10-12 रुपये तक कीमत मिल पाती है. माल्टा एक पहाड़ी और शक्तिवर्धक फल है. यह दिखने में बिलकुल संतरे या मौसमी की तरह होता है. माल्टा फल उतराखंड के पहाड़ी इलाकों में सबसे ज्यादा पाया जाता है. यह फल सर्दियों में तैयार हो जाता है. माल्टा पहाड़ी क्षेत्रों में वाला फल है. इस फल को धरती का सबसे सेहमंद भी माना जाता है. माल्टा फल एक संतरे या मौसमी फल के आकार में गोल या रसीला होता है. आम को फलों का राजा कहा जाता है तो माल्टा को पहाड़ी फलों का राजा भी कहा जाता है. माल्टा चमोली जिले के ग्वालदम, लोल्टी, थराली, गैरसैंण, पिथौरागढ़, रुद्रप्रयाग, बागेश्वर, चम्पावत तथा उत्तरकाशी में बहुतायत में होता है. पहाड़ में एक माल्टा ही ऐसा फल है जिसका न केवल फल बल्कि बीज एवं छिलका भी काम आता है. योजनाओं के सही तरीके से लागू नहीं होने के कारण ज्यादातर माल्टा बर्बाद हो रहा है. चौंकाने वाली बात ये है कि माल्टा वाले प्रदेश उत्तराखंड में पंजाब और हिमाचल का किन्नू धड़ल्ले से बिक रहा है. जबकि उत्तराखंड के माल्टा में किन्नू से लगभग दोगुना विटामिन सी होता है. किन्नू मार्केट में माल्टा से ज्यादा कीमत पर बिक रहा है. मार्केट में किन्नू 100 रुपए में 5 से 6 पीस मिलते हैं. यानी जहां किन्नू करीब 100 रुपए किलो बिक रहे हैं, वहीं पहाड़ के माल्टा को प्रति किलो सिर्फ 7 से 8 रुपए ही मिल पा रहे हैं. लोहाघाट के गुमदेश, पंचेश्वर, पुलहिंडोला, चमदेवल, कोटला, खीड़ी, ढोरजा, फोर्ती, बिशंग, चौड़ी बलांई आदि क्षेत्रों में माल्टा, बड़ा नींबू और संतरा पैदा होता है लेकिन यहां के किसानों को इनका उचित मूल्य नहीं मिल पाता है। किसान माल्टा को छह से आठ रुपये, बड़ा नींबू छह रुपये किलो और संतरा 25 से 50 रुपये किलो तक बेच जा रहे हैं। काश्तकार रमेश सिंह, प्रकाश का कहना है कि अब सिटरस फलों की खेती करना भी घाटे का सौदा हो रहा है। दूर गांवों से लोहाघाट बाजार तक फलों को लाने में ही काफी खर्चा आ जाता है। इसके बाद बिचौलियों के हाथ औने-पौने दामों में अपने फलों को बेचना पड़ता है। संवादउत्तराखंड में उत्पादित होने वाले माल्टा से कई उत्पाद बनाए जाते हैं. इनमें प्रमुख रूप से जूस के साथ जैम, मुरब्बा, स्क्वैश और जूस हैं. इन उत्पादों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है. जिला उद्यान अधिकारी पिथौरागढ़ ने बताया किकाश्तकारों को माल्टा का पेड़ 50 प्रतिशत सब्सिडी में दिये जाते हैं. माल्टा को अन्य फलों की पहचान दिलाने की कोशिश करने के साथ ही भविष्य बाजार भी उपलब्ध करवाया जायेगा. माल्टा को पहाड़ की पहचान मिले यह प्रयास किया जा रहा है. माल्टा अभी 10 रुपये किलो से हम खरीदेंगे. भविष्य में इसका मूल्य और बढ़ाया जायेगा माल्टा शरीर की रोग प्रतिरोधात्मक शक्ति को बढ़ाता है. इसमें विटामिन सी भरपूर होता है. माल्टा में केवल 85 कैलोरी होती है. इसमें वसा, कोलेस्ट्रॉल या सोडियम बिलकुल भी नहीं होता है. इसमें विटामिन सी, विटामिन बी, पोटैशियम, कैल्शियम, फॉस्फोरस तथा फैट फ्री कैलोरी होती है. एक और जहां काश्तकार माल्टा को बाजार नहीं मिलने से परेशान हैं, वहीं माल्टा को बंदर बड़ा नुकसान पहुंचा रहे हैं. यदि समय रहते हुए माल्टा को बाजार मिल जाये, तो इन पहाड़ी फल उत्पादकों की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो जायेगी. सरकार की मंशा भले ही माल्टे की ब्रांडिंग और बाजार विस्तार की हो, लेकिन इस महोत्सव ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या ऐसे आयोजनों में किसानों को वास्तविक लाभ मिल पा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर किसान सीधे उपभोक्ताओं से जुड़ें और बिक्री में भागीदार बनें, तो उन्हें बेहतर दाम मिल सकते हैं। इसमें किसानों से 10 रुपये प्रति किलो की दर से खरीदा गया सी ग्रेड माल्टा 40 रुपये बिका। वहीं गलगल और चकोतरा को किसानों से सात रुपये प्रतिकिलो के हिसाब से खरीदा गया जो विभाग ने 15 रुपये प्रतिकिलो बेचा। किसानों का कहना है कि यह पैसा उत्तराखंड औद्यानिक परिषद के खाते में गया। उन्हें अपेक्षाकृत इसका लाभ नहीं मिल सका।महोत्सव में आए जजोली ब्लॉक गंगोलीहाट पिथौरागढ़ के दुर्गा राम बताते हैं कि सरकार ने माल्टे का न्यूनतम समर्थन मूल्य 10 रुपये घोषित किया है, हालांकि यह उनके क्षेत्र में कम बिकता है। दस रुपये में खरीद के लिए कोई क्रय केंद्र भी नहीं है। बागेश्वर से आए रोशन सिंह बताते हैं कि विभाग ने उनसे माल्टा रोड हेड से 10 रुपये प्रतिकिलो के हिसाब से खरीदा।किसान का जो माल्टा बाजार में नहीं बिकता सी ग्रेड के उस माल्टे को 10 रुपये प्रतिकिलो के हिसाब से खेत से खरीदा गया है। माल्टा महोत्सव में विभिन्न जिलों से 253 क्विंटल माल्टा, 29 क्विंटल गलगल, 12 क्विंटल कागजी नींबू, 4.50 क्विंटल चकोतरा लाया गया। जिसमें से 20 क्विंटल माल्टा, सात क्विंटल गलगल, 35 किलो कागजी नींबू, 16 किलो चकोतरा बिका। इसमें 28 क्विंटल फुटकर बिक्री हुई जबकि 271 क्विंटल संरक्षण इकाई को दिया गया। उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में इन दिनों सिट्रिक फलों में शामिल माल्टा, संतरा और बड़े नींबू पेड़ों पर लदे हुए हैं. खरीदार न मिलने से यहां के काश्तकार काफी परेशान हैं, जिस वजह से ये फल पेड़ों पर ही सड़ रहे हैं. पहाड़ के काश्तकार बड़ी मेहनत करके इन्हें बचाए रखते हैं लेकिन अब बिक्री न होने की वजह से वे भी निराश हैं. पिथौरागढ़ जिले की बात करें, तो यहां इनकी खरीदारी न के बराबर है और इसे जिले से बाहर मैदानी इलाकों में भेजने की व्यवस्था भी न होने के चलते किसानों को इसका मूल्य ही नहीं मिल रहा है. माल्टा को पहाड़ी फलों का राजा कहा जाता है क्योंकि यह एक रसीला और काफी ज्यादा मात्रा में होने वाला फल है। गौरतलब है कि पहाड़ों के उत्पाद पहाड़ों में ही सड़कर रह जा रहे हैं, जिससे यहां के किसान काफी मायूस हैं और यही वजह भी है कि यहां बागवानी से लोग दूर हो रहे हैं. जरूरत है तो यहां के उत्पादों को एक बाजार मुहैया कराने की, जिससे पहाड़ के किसानों का हौसला बढ़ाया जा सके.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.












