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जीत सिंह नेगी के गीतों में पहाड़ की सतत पीड़ा है

02/02/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
बहुआयामी प्रतिभा के धनी जीत सिंह नेगी जन्म 2 फ़रवरी, 1925; उत्तराखंड के ऐसे पहले लोकगायक थे, जिनके गीतों का ग्रामोफोन रिकॉर्ड 1949 में जारी हुआ। जीत सिंह नेगी ने दो हिंदी फिल्मों में भी बतौर सहायक निर्देशक कार्य किया। वह संगीतकार और रंगकर्मी भी थे। पर्वतीय संस्कृति एवं भाषा के घोर उपासक, गढ़वाली लोकगीतों के प्रख्यात रचनाकार तथा सुप्रसिद्ध लोकगायक श्री जीत सिंह नेगी उत्तराखण्ड का वह सितारा है जो सदा ही सांस्कृतिक क्षेत्र के क्षितिज में चमक बिखेरता है। वस्तुत: गढ़वाली सहगल जैसी उपमा से अंलकृत श्री नेगी जिस तरह से पर्वतीय संस्कृति, भाषा, लोकगीतों, लोकगाथाओं, लोक नृत्य, लोक संगीत आदि स्वस्थ्य परम्पराओं के उत्थान के लिये समर्पित हैं वह उनकी आभा को और ज्यादा विस्तृत करता है। पर्वतीय जनजीवन को बड़े ही मार्मिक, सजीव एवं प्रभावी ढंग से अपने सजित गीतों, नृत्य नाटिकाओं व गीत-नाटकों के माध्यम से जीवंत कर दिया।गीत-संगीत का उनका यह सुनहरा सफर छात्र जीवन से शुरू हुआ, जब सन् 1942 में पौड़ी से स्वरचित गढ़वाली गीतों का सफल गायन आपने किया। वे अपनी आकर्षक सुरीली धुनों में लोकगीत गाकर लोकप्रिय होने लगे। सन् 1949 में उनके लिए सब कुछ बदल गया जब सर्वप्रथम किसी गढ़वाली लोकगायक के रूप में उन्हें यंग इंडिया ग्रामोफोन कम्पनी ने मुम्बई आमंत्रित किया। जहाँ नेगी के छ: गीतों की रिकार्डिंग हुई। ये गीत काफी प्रचलित हुए। और कला जगत में सराहे भी गये। सन् 1952 को गढ़वाल भातृ मण्डल मुम्बई के तत्वावधान में जीत सिंह नेगी ने नाटक ‘भारी भूल ‘ का सफल मंचन किया। इसके बाद नेगी जी ने वर्ष 1954-55 में हिमालय कला संगम, दिल्ली के मंच से उक्त नाटक का निर्देशन व मंचन किया। गढ़वाल के इतिहास पुरुष टिहरी नरेश के सेनापति माधो सिंह भण्डारी द्वारा मलेथा गाँव की कूल के निर्माण की रोमांचक घटना पर आधारित नाटक ‘मलेथा की कूल’ की रचना की। जिसका मचन 1970 में देहरादून में किया गया। इसके अलावा गढ़वाली लोक-कथाओं के प्रसिद्ध नायक बांसुरी वादक जीतू बगड़वाल के जीवन पर गीत नृत्य नाटक ‘जीतू बगड़वाल’ का क्रमश: 1984, 1987 में देहरादून और चण्डीगढ़ में मंचन हुआ। स्वरचित गढ़वाली गीतों को अपन मधुर एवं प्रेरक वाणी में गाकर संगीत जगत को पहाड़ी संस्कति की ओर आकर्षित करने का सर्वप्रथम बीड़ा उठाने वाले जीत सिंह नेगी के गीत- ‘तू होली ऊँची डाँड्यू मां वीरा घसियारी का भेष माँ’ का उल्लेख भारतीय जनगणना सर्वेक्षण विभाग ने सन् 1961 में सर्वप्रिय लोकगीत के रूप में किया है।‘रामी’, ‘राजू पोस्टमैन’ जैसे दिल को छूने वाले आपके गीत नाटिका एवं एकांकी ने काफी ख्याति बटोरी। जीत सिंह नेगी के कई गीत नाटिका आकाशवाणी नजीबाबाद, दिल्ली, लखनऊ से प्रसारित होते रहे हैं तथा ‘रामी’ का हिन्दी रूपांतरण दिल्ली दूरदर्शन से प्रसारण का सौभाग्य प्राप्त कर चुका है। जीत सिंह नेगी की कई रचनाओं के चलचित्र बन चुके हैं। 1957 में एच.एम.बी. एवं 1964 में कोलम्बिया ग्रामोफोन कम्पनी के लिए स्वरचित आठ गढ़वाली गीतों को अपनी मधुर आवाज देकर एक कीर्तिमान बनाया। चर्चित गढ़वाली फिल्म ‘मेरी प्यारी बोई’ के गीत-संवाद द्वारा आप अपनी छाप छोड़ने में सफल रहे।प्रसिद्ध लोकगायक जीत सिंह नेगी को लीजेंडरी सिंगर’ सम्मान से नवाजा गया था उनके साथ ही ‘यंग उत्तराखंड लाइफ टाइम अचीवमेंट’ सम्मान से लोकगायक चंद्र सिंह राही को नवाजा गया। यही नहीं जीत सिंह नेगी के गीतों को संस्कृति विभाग ने पुस्तक के रूप में संकलित किया है। यह उनके लिए किसी खास सम्मान से कम नहीं है। म्यारा गीत नाम की इस पुस्तक में नेगी के 1950 व 60 के दशक में गाए गीत शामिल किए गए हैं। अपने समय में ये गीत गढ़वाल व कुमाऊं क्षेत्र में काफी लोकप्रिय थे। लिहाजा इन गीतों को उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर भी माना जाता है।गढ़वाल की प्राचीन व आधुनिक परिवेश में सामाजिक सरोकारों, राजनीतिक आकांक्षाओं एवं धार्मिक विचारों को नाटक तथा गीतों में पिरोकर अभिव्यक्त करने में नेगी जी का कोई सानी नहीं है। गढ़वाली लोकगीतों के स्वर, ताल, लय पर शोध करने वालों के लिए जीत सिंह नेगी एक अनुपम उदाहरण हैं जिन्हें पर्वतीय जनजीवन से बावस्ता लगभग हर विधा को टटोला है और काम किया है। सम्मान एवं पुरस्कारों की कतारें एवं अनगिनत राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संस्थाओं से आपकी सम्बद्धता ही काफी है नंगी जी की ख्याति बताने के लिए। आज के गीतकारों एवं संगीतज्ञों के लिए सदा से प्रेरणा स्रोत रहे जीत सिंह नेगी को यदि गढ़वाली गीतों का गॉडफादर कहा जाये तो शायद अतिशयोक्ति न होगी। आज भी उनकी वाणी में जो मधुरता है, ओज है वह अनुकरणीय है। सच मानिये तो वह हमें प्रेरित करती हैं। उनका एक बहुत पुराना लोक गीत आज मेरे जेहन में आ रहा है। जिसको बाद में गढ़रत्न नरेन्द्र सिंह नेगी ने अपनी आवाज में गाया है। “घास काटी की प्यारी छैला ये, रुमुक ह्वेगे घार ऐ जादी, दूदी का नौना की भिंगर गडीं चा ये रुमुक ह्वेगे घार ऐ जादी”. इसके अलावा उनकी एक बेहतरीन रचना “तू होलि ऊँची डाँड्यों मा बीरा, घसियारी का भेष मा, खुद मा तेरी सड़क्यूँ पर मी रुणू छौं परदेश मा” को भी नरेन्द्र सिंह नेगी जी ने अपना स्वर दिया है. इतना ही नहीं, जीत सिंह नेगी पहले ऐसे गढ़वाली गायक भी हैं,1950 के दशक की शुरूआत में जिनके गाने का ऑल इंडिया रेडियो से सबसे पहले प्रसारण हुआ। इस सुमधुर खुदेड़ गीत के बोल थे, ‘तू होली उंचि डांड्यूं मा बीरा-घसियारी का भेष मां-खुद मा तेरी सड़क्यां-सड़क्यों रूणूं छौं परदेश मा…।’ (तू होगी बीरा उंचे पहाड़ों पर घसियारी के भेष में और मैं यहा परदेश की सड़कों पर तेरी याद में भटक रहा हूं-रो रहा हूं।)जीत सिंह नेगी के निर्देशन में 1954-55 में दिल्ली में आयोजित गढ़वाली नाटक ‘भारी भूल’ के मंचन में मनोहर कांत धस्माना मुख्य भूमिका में नजर आए थे। वह उत्तराखंड के पहले ऐसे लोककलाकार हैं जिनके गीतों का ग्रामोफोन रिकॉर्ड 1949 में यंग इंडिया ग्रामोफोन कंपनी ने जारी किया..लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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