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पारंपरिक पहाड़ी फलों माल्टा और संतरे के पेड़ों पर संकट के बादल मंडराए

23/11/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में इन दिनों सिट्रिक फलों में शामिल माल्टा, संतरा और बड़े नींबू पेड़ों पर लदे हुए हैं. खरीदार न मिलने से यहां के काश्तकार काफी परेशान हैं, जिस वजह से ये फल पेड़ों पर ही सड़ रहे हैं. पहाड़ के काश्तकार बड़ी मेहनत करके इन्हें बचाए रखते हैं लेकिन अब बिक्री न होने की वजह से वे भी निराश हैं. पिथौरागढ़ जिले की बात करें, तो यहां इनकी खरीदारी न के बराबर है और इसे जिले से बाहर मैदानी इलाकों में भेजने की व्यवस्था भी न होने के चलते किसानों को इसका मूल्य ही नहीं मिल रहा है. माल्टा को पहाड़ी फलों का राजा कहा जाता है क्योंकि यह एक रसीला और काफी ज्यादा मात्रा में होने वाला फल है, लेकिन इसका समर्थन मूल्य लागू नहीं होने के कारण किसानों को बाजार ही नहीं मिल रहा है. माल्टे को GI टैग मिलने के बाद भी हालात नहीं सुधर रहे हैं. यह फल राज्य के किसानों के लिए नई उम्मीद का प्रतीक बन गया है. सदियों से सर्दियों के मौसम में पहाड़ों की पहचान बना माल्टा अब देशभर में अपने स्वाद और सेहतमंद गुणों के कारण जान जाता है.
माल्टा खट्टे-मीठे स्वाद वाला रसदार फल है, जिसे पहाड़ी लोग सर्द धूप में बैठकर बड़े चाव से खाते हैं. यह फल न केवल स्वादिष्ट है, बल्कि औषधीय गुणों से भरपूर भी है. विशेषज्ञों के अनुसार, माल्टा कीवी से भी अधिक पोषक तत्वों से युक्त है. इसमें मौजूद विटामिन C, पोटेशियम, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट शरीर को डिटॉक्स करने, ब्लड प्रेशर नियंत्रित रखने और इम्यून सिस्टम को मजबूत करने में मदद करते हैं. माल्टा एक मौसमी फल है, माल्टा के पल्प से जूस और स्क्वायश बनाया जाता है. इसके बीज से नर्सरी तैयारी की जाती है और इसका जो बाहरी छिलका है, उससे कई तरह के कॉस्मेटिक आइटम्स बनते हैं. पहाड़ का यह फल नैनीताल, भीमताल, भवाली समेत ठंडे क्षेत्रों में अधिक मात्रा में मिलता है. जो दिसंबर महीने तक पककर तैयार हो जाता है. पिथौरागढ़ जिले में कोल्ड स्टोर भी नहीं होने से यह फल ऐसे ही पेड़ों पर बर्बाद हो रहा है. किसानों को उम्मीद है कि अगर स्टोर करके इसे गर्मियों में बेचा जाता, तो इसके अच्छे दाम मिल सकते हैं. माल्टा पहाड़ों में काफी उगता है, जिस वजह से यहां इसे खरीदने वाले लोग कम ही हैं. वह काश्तकारों से इसे लेते भी हैं, तो इसकी बिक्री काफी कम होती है. एक अन्य विक्रेता ने कहा कि पिथौरागढ़ में बाहर से आने वाले कीनू (किन्नू) का मूल्य कम और क्वालिटी अच्छी होने के कारण इसकी बिक्री यहां ज्यादा होती है. यहां कम ही लोग माल्टे को खरीदते हैं. कीनू ज्यादातर पंजाब से आता है. गौरतलब है कि पहाड़ों के उत्पाद पहाड़ों में ही सड़कर रह जा रहे हैं, जिससे यहां के किसान काफी मायूस हैं और यही वजह भी है कि यहां बागवानी से लोग दूर हो रहे हैं. जरूरत है तो यहां के उत्पादों को एक बाजार मुहैया कराने की, जिससे पहाड़ के किसानों का हौसला बढ़ाया जा सके. प्रदेश सरकार ने राज्य के फल उत्पादकों को उनके उत्पादों का उचित मूल्य दिलाने के उद्देश्य से वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए “सी” ग्रेड माल्टा और पहाड़ी नींबू (गलगल) का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित कर दिया है। इस बाबत कृषि मंत्री ने पत्रावली में अनुमोदन कर दिया है। शीघ्र ही एमएसपी घोषित करने का आदेश जारी किया जाएगा। कृषि मंत्री ने मुख्यमंत्री का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि हमारी सरकार किसानों के कल्याण और उनकी आय दोगुनी करने की दिशा में निरंतर कार्य कर रही है। निश्चित रूप से इस कदम से फल उत्पादकों को उचित दाम मिलने के साथ ही स्थानीय फलों को एक नई पहचान मिलेगी। उन्होंने कहा कि राज्य में कृषि और औद्यानिकी का समग्र विकास करते हुए कास्तकारों की आय में गुणात्मक वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण जन कल्याणकारी योजनाएं संचालित की गई हैं। वर्ष 2024-25 “सी” ग्रेड माल्टा का न्यूनतम समर्थन मूल्य 10 प्रति किग्रा. और पहाड़ी नींबू (गलगल) का न्यूनतम समर्थन मूल्य 7 प्रति किग्रा. तय किया गया है। सी ग्रेड माल्टा का एमएसपी वित्तीय वर्ष 2023-24 में 09 रुपये से बढ़ाकर 10 रुपये प्रति किलो किया गया जबकि पहाड़ी नींबू (गलगल) 06 रुपये से बढ़ाकर 07 रुपये प्रति किलो तय किया गया। उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में पारंपरिक रूप से उगाए जाने वाले संतरे और माल्टा के सूखते पेड़ों को बचाने की कवायद उद्यान विभाग ने शुरू कर दी है। करीब डेढ़ दशक पहले कपकोट ब्लाक के रमाड़ी गांव में संतरे के पेड़ सूखने लगे थे। लेकिन रमाड़ी के उद्यमियों और उद्यान विभाग की मेहनत रंग लाई और एक बार फिर से माल्टा, नींबू और संतरा के बागान फलों से लकदक होनेलगे।दरअसल, रमाड़ी का संतरा बागेश्वर और कुमाऊं के साथ ही देश की राजधानी दिल्ली तक लोगों की पसंद है। लोग संतरा खरीदने के लिए हल्द्वानी से व्यापारी रमाड़ी गांव पहुंच जाते थे। इतना ही नहीं, बल्कि दिल्ली तक रमाड़ी का संतरा भेजा जाता था। करीब डेढ़ दशक पहले रमाड़ी के संतरे के पेड़ों पर संकट के बादल मंडराए। एक के बाद एक पड़े सूखने लगे। धीरे-धीरे रमाड़ी का यह प्रसिद्ध संतरा समाप्त होने की कगार पर पहुंच गया। हजारों पेड़ों में से गिने चुने पेड़ ही रह गए थे। इस पर रमाड़ी के किसानों के साथ ही उद्यान विभाग की मेहनत रंग लाई और फिर से फलों की बागवानी शुरू हो गई। अपर उद्यान अधिकारी ने बताया कि उद्यान विभाग ने रमाड़ी के संतरा को पुनर्जीवन देने के लिए अहम कदम उठाए। मिट्टी का परीक्षण कराया। फल उत्पादकों को संतरा के पेड़ों को खाद, पानी देने की विधि बताई। सूखे पेड़ों की कटिंग कर फिर से फल देने लायक बनाया। वर्तमान में विभाग द्वारा प्रतिवर्ष चालीस हजार से ज्यादा पौधे किसानों को दिए जा रहे हैं। संतरा, माल्टा, नींबू के वर्तमान हालातों पर जानकार किसान बताते हैं कि पहले के जमाने में इन फलों की गुड़ाई निराई के साथ ही मेहनत भी खूब की जाती थी, तो फल भी अच्छे होते थे। जलवायु परिवर्तन भी इस एक कारण हो सकता है। उनका कहना है कि किसानों को इस बात पर भी ध्यान देना होगा। वहीं, पर्यावरण प्रेमी कहते हैं कि किसानों को हर साल फल तोड़ने के बाद पेड़ों को नियमित रूप से गोबर की खाद और पानी दिया जाना चाहिए। रासायनिक खाद डालने के बाद सिंचाई की जरूरत पड़ती है। सिंचाई नहीं होने से जो पेड़ सूख जाते हैं उन्हे पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता है। पहाड़ी इलाकों में होने वाले माल्टा के स्वाद के सभी लोग मुरीद होते हैं। देश और दुनिया के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करना वाले माल्टा की उत्तराखंड में बेकद्री होती आई है। विपणन व प्रसंस्करण की उचित व्यवस्था न होने से यहां के मायूस फल उत्पादकों को मजबूरन औने पौने दामों में फल बेचने को विवश होना पड़ रहा है। *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं*

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