डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
बारिश नहीं होने से फसलें सूखने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। इससे काश्तकारों की चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं। दरअसल, उत्तराखंड में नवंबर और दिसंबर में बारिश-बर्फबारी हुआ करती थी। इससे फसलों को काफी लाभ पहुंचता था। इस बार नंबवर में 98 फीसद कम बारिश हुई, जबकि 15 दिसंबर तक राज्य में एक बूंद भी बारिश नहीं होने से संकट गहरा रहा है। इसका असर आगे की फसलों पर भी पड़ेगा। बारिश की कमी से उत्तरकाशी के सेब उत्पादक परेशान हैं। सेब के लिए 25 दिन का चिलिंग ऑवर्स जरूरी हैं। बागवानों के मुताबिक, सेब के लिए बर्फबारी जरूरी है। इस बार बारिश और बर्फबारी नहीं हुई है। अगर इस महीने में आगे भी ऐसा रहता है और जनवरी में भी बर्फ नहीं गिरी तो सेब किसानों को बड़ा नुकसान होगा। चमोली जिले के काश्तार भी बारिश की कमी से परेशान हैं। हरिद्वार समेत मैदानी जिलों में भी किसानों को बारिश नहीं होने से नुकसान उठाना पड़ रहा है। सिंचाई के लिए ट्यूबवैल का ज्यादा प्रयोग करना पड़ रहा है। ऐसे में खेती की लागत बढ़ रही है, जिससे किसान परेशान हैं।बाईस सौ मीटर की ऊंचाई पर स्थित स्योरी फल पट्टी मे सूखे की वजह से काश्तकार चिंतित है, काश्तकारों को पौधों की काट छांट तथा थाले बनाने में परेशानी हो रही है. वहीं, किसानों की मटर और गेंहू की फसल इस वर्ष सूखे की चपेट में आ गई है. समय पर बारिश न होने से खेतों में नमी का अभाव बना हुआ है, जिससे बोई गई फसलों का अंकुरण प्रभावित हो रहा है और कई स्थानों पर फसल सूखने लगी है.जनपद में पिछले तीन माह से क्षेत्र में बारिश नहीं हुई है, जबकि दिसंबर का महीना आधा बीत चुका है. काश्तकारों का कहना है कि बगीचों में सेब की नई पौध लगाने की तैयारी में है किंतु सख्त हुई मिट्टी में गड्ढे बनाने में दिक्कतें आ रही हैं. स्योरी फल पट्टी में करीब बारह सौ परिवारों के सेब के बगीचे हैं, जिन पर उनकी आजीविका टिकी हुई है, स्योरी फल पट्टी में करीब डेढ़ लाख पेटियों का उत्पादन होता है, लेकिन समय पर बारिश और बर्फबारी न होने से लगातार उत्पादन पर असर दिखाई दे रहा है.साल 2025 में स्योरी फल पट्टी में पच्चीस प्रतिशत उत्पादन भी नहीं हो पाया था, इस वर्ष भी मौसम की बेरुखी काश्तकारों की उम्मीदों पर पानी फेर सकता है. दिसंबर माह में सेब बागवान बगीचों में पौधों की काट छांट कर पेस्ट लगाना, पौधों को गोबर की खाद देना, नई पौध लगाने के लिए गड्ढे बनाने का कार्य करते हैं, किंतु दिसंबर माह में भी बारिश नहीं हुई है, जिससे काश्तकार चिंतित हैं.काश्तकार विजय बंधानी, गजेंद्र नौटियाल, प्रेम सिंह राणा का कहना है कि दिसंबर का आधा महीना बीत चुका है, किंतु अभी तक बारिश नहीं हुई है. जबकि दिसंबर माह में बर्फवारी जरूरी है, पौधे की चिलिंग हावर्स की अवधि पूरी न होने पर फल की गुणवत्ता और आकार में कमी आएगी जिसका उत्पादन पर असर पड़ेगा.वहीं दूसरी ओर से पुरोला के काश्तकार श्यालिक राम नौटियाल, जगमोहन कैडा, रमेश असवाल, गोपाल भंडारी व नवीन गैरोला समेत अन्य किसानों का कहना है कि बुवाई के समय जंगली कबूतरों व बंदरों ने खेतों में बोए गए बीजों को भारी नुकसान पहुंचाया. ऊपर से लगातार बारिश न होने के कारण मटर व गेंहू की फसल ठीक से उग नहीं पाई और अब सूखे के हालात बन गए हैं.किसानों ने बताया कि असिंचित क्षेत्रों के खेतों (उखड़ी खेत) में अभी तक बुवाई भी नहीं हो सकी है. यदि शीघ्र बारिश नहीं हुई तो किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है. किसानों ने प्रशासन से मांग की है कि सूखे की स्थिति को देखते हुए राहत के उपाय किए जाएं और वन्यजीवों से हो रहे नुकसान से बचाव के लिए ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि आने वाले समय में किसानों को और कठिनाइयों का सामना न करना पड़े. उत्तरकाशी की रवाईं घाटी में अक्तूबर तक खेतों में नमी होने की वजह से किसानों ने मटर, गेंहू की बुवाई कर दी थी। नवंबर में महज .1 एमएम ही बारिश हुई। यह बारिश सामान्य 6.1 एमएम से 98 फीसदी कम रही। नवंबर में प्रदेश में नौ जिलों में बारिश की एक बूंद भी नहीं गिरी। 14 दिसंबर तक एक बूंद बारिश की नहीं हुई है। जबकि सामान्य बारिश 6.3 एमएम बारिश है। मौसम निदेशक के मुताबिक प्रदेश में अभी मौसम शुष्क बना है। बताया कि प्रदेश के विभिन्न जिलों में 21 दिसंबर तक मौसम शुष्क रहने की संभावना बनी हुई है। फिलहाल किसी भी जिले में बारिश का कोई पूर्वानुमान नहीं है। उन्होंने बताया कि आज चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ जिले के ऊंचाई वाले स्थानों पर हल्की बारिश और बर्फबारी की संभावना है।इस बार बारिश और बर्फबारी नहीं हुई है। अगर इस महीने में आगे भी ऐसा रहता है और जनवरी में भी बर्फ नहीं गिरी तो सेब किसानों को बड़ा नुकसान होगा। चमोली जिले के काश्तार भी बारिश की कमी से परेशान हैं। हरिद्वार समेत मैदानी जिलों में भी किसानों को बारिश नहीं होने से नुकसान उठाना पड़ रहा है। सिंचाई के लिए ट्यूबवैल का ज्यादा प्रयोग करना पड़ रहा है। ऐसे में खेती की लागत बढ़ रही है, जिससे किसान परेशान हैं। मंडी का कारोबार पहाड़ के अधिकतर फसलों पर निर्भर है. लेकिन पहाड़ों पर बारिश और बर्फबारी नहीं होने से फसल बर्बाद होने के कगार पर आ चुकी है. सबसे ज्यादा नुकसान मटर की फसल और सेब की पैदावार पर होने जा रहा है. क्योंकि सेब की पैदावार के लिए बर्फबारी के साथ ही तापमान माइनस डिग्री में होना बहुत जरूरी है. लेकिन इस बार बर्फबारी नहीं होने से सेब की पैदावार पर असर पड़ सकता है. मैदानी क्षेत्र के मटर खत्म होने के बाद पहाड़ पर भारी मात्रा में मटर की पैदावार होती है. लेकिन पहाड़ों रक मटर की फसल तैयार होने के कगार पर है, लेकिन बारिश नहीं होने के चलते मटर की फसल में रोग पकड़ लिया है. जिसके चलते किसानों को मटर में भारी नुकसान होने की संभावना जताई जा रही है. *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं*











