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कम बर्फबारी बड़ा जलसंकट

18/12/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
हिमालय को थर्ड पोल कहा जाता है. हिमालय में लगभग 10 हजार छोटे-बड़े ग्लेशियर हैं और यह पीने के पानी का सबसे बड़ा स्रोत है. हिमालय क्षेत्र में मौजूद ग्लेशियरों को हर साल पड़ने वाली बर्फ उनकी सेहत सुधारती है. लेकिन पिछले कुछ समय से ग्लेशियरों की सेहत खराब हो रही है. यानी ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, उनका आकार घट रहा है और ग्लेशियर की न सिर्फ चौड़ाई बल्कि लंबाई भी कम हो रही है.उत्तराखंड में मौजूद हिमालय के ग्लेशियरों की सेहत खराब हो रही है. इसकी मुख्य वजह कम बर्फबारी है. दूसरी वजह यह है कि जो बर्फबारी हो रही है, वह भी ग्लेशियर पर टिक नहीं पा रही है. अब वैज्ञानिक इस बात से चिंतित हैं कि अगर यही हाल लगातार बना रहा, तो उत्तराखंड के हिमालय क्षेत्र में मौजूद ग्लेशियर—जिनमें गंगोत्री, मिलम, खतलिंग, पिंडारी, काफनी जैसे कई ग्लेशियर शामिल हैं वैज्ञानिक से खास बातचीत में जानकारी दी कि गर्मियों का सीजन बढ़ रहा है और सर्दियों का सीजन घट रहा है बताया कि दिसंबर और जनवरी में पड़ने वाली बर्फ अब मार्च और अप्रैल में पड़ रही है, जबकि मार्च-अप्रैल में तापमान—धरती का और हवा का—बढ़ा हुआ होता है. ऐसे में बर्फ ग्लेशियर पर टिक नहीं पा रही और बहुत तेजी से पिघल रही है. स्नोफॉल पड़ने का शिफ्टिंग रेट 10 से 15 फीसदी हो गया है. इसके अलावा जलवायु परिवर्तन का ऐसा असर हो रहा है, जिसकी वजह से 2500 मीटर तक होने वाली बारिश अब 3000 मीटर से ऊपर तक पड़ रही है. देश के विभिन्न हिस्सों में दिसंबर की ठंड ने अलग-अलग रूप दिखाने शुरू कर दिए हैं। मौसम विभाग के अनुसार उत्तर भारत के पहाड़ी राज्यों में जहां सर्दी का प्रकोप लगातार बढ़ रहा है, वहीं मैदानी इलाकों में घना कोहरा और तापमान में गिरावट जनजीवन को प्रभावित कर रही है। कुछ क्षेत्रों में दिन के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी भी दर्ज की गई है, जिससे मौसम का मिजाज विरोधाभासी नजर आ रहा है। हिमालय के पहाड़ों पर तापमान में लगातार बढ़ोतरी और बर्फबारी में कमी के कारण प्राकृतिक संकट गहराता जा रहा है. मौसम की असमान्य परिस्थितियों ने न केवल पहाड़ों को संवेदनशील बना दिया है बल्कि कृषि, बागवानी और पर्यटन क्षेत्रों पर भी बुरा असर डाला है. विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार घटती बर्फबारी और बारिश के कारण हिमालयी ग्लेशियरों का पुनर्भरण नहीं हो पा रहा है, जिससे जल स्रोतों और नदियों पर संकट उत्पन्न हो रहा है.कई मौसम एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि यह मौसम चक्र पिछले वर्षों से बिल्कुल अलग है और दिसंबर के अंत तक राहत की संभावना कम है. इससे पहले, पश्चिमी विक्षोभ अक्टूबर मध्य से सक्रिय होना शुरू होते थे, जो नवंबर और दिसंबर में भारी बर्फबारी कराते थे, लेकिन इस बार मौसम बेहद शुष्क रहा है. ग्लेशियर लगातार पिघल रहे हैं और नई बर्फबारी न होने से उनका पुनर्भरण नहीं हो पा रहा है. इससे हिमालयी नदियों में पानी का बहाव कम हो रहा है और मैदानी इलाकों में भी जल संकट पैदा हो सकता है. यह लंबे समय तक चलने वाला शुष्क मौसम जल स्रोतों पर गंभीर असर डाल सकता है. बर्फबारी और बारिश में कमी का सबसे बड़ा प्रभाव कृषि और बागवानी पर पड़ा है. सेब की खेती पर विशेष संकट है और आने वाले सीजन की पैदावार प्रभावित होने की संभावना है. इसके अलावा पर्यटन क्षेत्र भी असामान्य मौसम से प्रभावित हुआ है. हिल स्टेशन और स्कीइंग रिसॉर्ट्स में बर्फ की कमी के कारण पर्यटक कम हो गए हैं, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ा है. जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के चलते इस साल पहाड़ों में बर्फबारी घटी है। इससे पहाड़ी राज्यों में पर्यटन और खेती पर भी असर पड़ा है। साल दर साल घटती बर्फबारी और बढ़ती गर्मी से पहाड़ों में जमी बर्फ में भी कमी आ रही है। हाल के एक अध्ययन में सामने आया है कि हिमालय की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट के ऊपरी हिस्से में हिम आवरण 150 मीटर तक घट गया है। सेटेलाइट से प्राप्त तस्वीरों के जरिए किए गए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने तेजी से घटते ग्लेशियरों को लेकर चिंता जताई है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि लगातार बढ़ते तापमान और बर्फबारी में कमी से हिमालय के इस क्षेत्र में ग्लेशियर का पिघलना तेज हो सकता है। इससे हिमालय के बर्फ भंडारों पर निर्भर जल संसाधन और पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ सकता है। हिमालय-हिंदुकुश पर्वत श्रृंखला में इस साल की बर्फबारी पिछले 23 वर्षों में सबसे कम रही है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंटकी नई रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, इस क्षेत्र में मौसमी बर्फ का आवरण औसतन 23.6 प्रतिशत कम रहा है, जो जल सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। यह स्थिति लगातार तीसरे साल देखने को मिली है और इसने दो अरब से अधिक लोगों की चिंता बढ़ा दी है, जो ग्लेशियरों से निकलने वाले पानी पर निर्भर हैं। “इस साल बर्फबारी देर से शुरू हुई और पूरे मौसम में औसत से काफी कम रही।” इसका सीधा असर नदी के बहाव, भूजल के स्तर और कृषि उत्पादन पर पड़ने की आशंका है। साथ ही सूखा, जल संकट और गर्मी की लहरें भी अधिक घातक रूप ले सकती हैं। कार्बन उत्सर्जन के चलते हिंदुकुश क्षेत्र में बर्फ की हानि अब एक अपरिवर्तनीय रास्ते पर चल पड़ी है।” उन्होंने कहा कि यदि अभी भी पर्यावरण संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो स्थिति और भी गंभीर हो सकती है।संयुक्त राष्ट्र के मौसम विज्ञान संगठन ने भी चेताया है कि एशिया जलवायु आपदाओं से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र बन चुका है। पिछले छह वर्षों में से पांच साल ऐसे रहे हैं, जब ग्लेशियरों में सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई।, बर्फबारी में लगातार गिरावट एक गंभीर संकेत है, जो जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय असंतुलन की ओर इशारा करता है. अगर इस दिशा में जल्द ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में हिमालयी क्षेत्रों की पारिस्थितिकी और जल स्रोतों पर गहरा असर पड़ सकता है. सरकार, वैज्ञानिकों और आम जनता को मिलकर इस समस्या के समाधान की दिशा में कार्य करना होगा, ताकि हिमालय का यह पवित्र क्षेत्र प्राकृतिक संतुलन बनाए रख सके. हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को संरक्षित करने के लिए ठोस नीतियां बनाई जाएं. इसके साथ ही जल संरक्षण के उपाय किए जाएं, जिससे ग्लेशियरों से मिलने वाले पानी का सही उपयोग हो सके. *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं*

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