डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
कभी बढ़ती आबादी भारत की सबसे बड़ी चुनौतियों में गिनी जाती थी। ‘हम दो, हमारे दो’ जैसे परिवार नियोजन अभियान चलाए जाते थे और चिंता इस बात की होती थी कि बढ़ती जनसंख्या के लिए भोजन, शिक्षा और रोजगार की व्यवस्था कैसे की जाए। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। आज देश में प्रजनन दर में गिरावट दर्ज की जा रही है। इसी बाबत सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दो से अधिक बच्चों वाले व्यक्ति को चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने वाली नीति से जुड़े कानून की प्रासंगिकता अब खत्म हो गई है। अदालत ने माना कि देश में जनसांख्यिकीय बदलावों के कारण ऐसे प्रतिबंध को लेकर दिये जाने वाले तर्क अब बेमाने हो गए हैं। कोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ ही ‘जावेद बनाम हरियाणा राज्य’ (2003) मामले को एक बड़ी बेंच के पास भेज दिया है। दरअसल, इस मामले में तीन जजों की बेंच ने हरियाणा पंचायती राज अधिनियम-1994 की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था। जिसमें दो से अधिक बच्चे होने पर उम्मीदवार को स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने के लिये अयोग्य घोषित किया गया था। निस्संदेह, सुप्रीम कोर्ट की दो बच्चों के नियम पर यह टिप्पणी दुनिया के सबसे अधिक जनसंख्या वाले देश के लिये एक उपयुक्त समय पर आई है। देश की मौजूदा बदलती जनसांख्यिकीय तस्वीर दर्शाती है कि अब वे कानून पुराने व प्रतिकूल हो चुके हैं, जो जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिये जनप्रतिनिधियों को स्थानीय चुनाव में हिस्सा लेने से रोकते थे। उल्लेखनीय है कि जब कोर्ट ने ‘जावेद बनाम हरियाणा राज्य’(2003) के मामले में दो बच्चों के नियम की वैधता को मान्यता दी थी, उस समय भारत की प्रजनन दर लगभग तीन थी। जबकि आज यह घटकर 1.9 हो गई है, जो प्रतिस्थापन दर 2.1 से कम है। सही मायने में इस बदलाव में हमारी वास्तविक सामाजिक स्थिति का अक्स उभरता है। मसलन बढ़ती साक्षरता, शहरीकरण का विस्तार, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार और परिवार नियोजन के उपायों के प्रति समाज में जागरूकता में वृद्धि आदि। अदालत ने महाराष्ट्र के एक पूर्व सरपंच की अयोग्यता को भी रद्द कर दिया है, जिन्हें अपने तीसरे बच्चे के जन्म के बाद चुनाव लड़ने से रोक दिया गया था। इससे जुड़े संवैधानिक प्रश्न के समाधान के लिये मामले को बड़ी बेंच को भेज दिया है।सही मायने में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी दर्शाती है कि जनसंख्या नीति और मौलिक अधिकारों के बीच पर्याप्त संतुलन बनाना जरूरी है। यानी दो बच्चों से ज्यादा होने पर किसी को सार्वजनिक सेवा करने से रोकना तार्किक नहीं होगा। दूसरे शब्दों में ऐसे लोगों के चुनाव लड़ने के हक को रोकना रिवारिक विकल्पों के आधार पर लोकतांत्रिक भागीदारी को सीमित करने जैसा होगा। यानी यह कानून अनुच्छेद 21 अर्थात जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता संरक्षण के तहत प्रजनन स्वायत्तता पर गंभीर सवाल उठाता है। यहां यह उल्लेखनीय है कि आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, राजस्थान व हरियाणा आदि ने पहले ही इस प्रतिबंध को हटा दिया है। इन राज्यों का मानना था कि देश में फिलहाल जनसांख्यिकीय परिस्थितियां बदल चुकी हैं। वास्तव में अन्य राज्यों को भी इस तरह के प्रावधानों पर पुनर्विचार करना चाहिए। इस बाबत कोर्ट का मानना था कि मौजूदा कानून राजनीतिक अधिकारों से वंचित करता है। यह भी कि ज्यादा बच्चे होने पर चुनाव लड़ने से रोकने वाला यह कानून नागरिकों के वर्ग को राजनीतिक प्रतिनिधित्व से बाहर कर देता है। सही मायने में इसका किसी व्यक्ति की सार्वजनिक पद संभालने की क्षमता से कोई खास संबंध नहीं है। उल्लेखनीय है कि भारत में मौजूदा जन्मदर 1.9 है, जबकि प्रतिस्थापन दर 2.1 होनी चाहिए। जिसका मतलब है कि कम प्रजनन के चलते एक पीढ़ी की जगह अगली पीढ़ी पूरी तरह नहीं ले पायेगी। जिसका अर्थ यह है कि बुजुर्गों की आबादी बढ़ने से कामकाजी लोगों की संख्या कम हो सकती है। यदि हमने इन बदलावों को नजरअंदाज किया तो देश के विकास में नकारात्मक प्रभाव सामने आ सकते हैं। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि घटती जन्मदर अंततः बुजुर्गों की आबादी बढ़ाने, कार्यबल में गिरावट और देश की सामाजिक सुरक्षा प्रणाली व स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ा सकती है। भारत के जनसंख्या स्वरूप में आये बदलाव के मद्देनजर बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं, बच्चों की देखभाल सुविधाओं में विस्तार, कौशल विकास और उपयोगी पेंशन योजनाओं को क्रियान्वित करना चाहिए। इसका मतलब यह भी है कि हर दौर में छोटे परिवार की कसौटी तार्किक नहीं हो सकती। भारत की घटती प्रजनन दर किसी संकट की कहानी नहीं, बल्कि बदलते समाज की तस्वीर है। छोटे परिवार अब अपवाद नहीं, बल्कि नया सामान्य बनते जा रहे हैं।शिक्षा, आर्थिक अवसर और महिलाओं की बढ़ती भागीदारी ने परिवार और मातृत्व से जुड़े पारंपरिक विचारों को बदल दिया है। हालांकि आने वाले वर्षों में भारत को बुजुर्ग होती आबादी की चुनौतियों के लिए भी तैयारी करनी होगी।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.














