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किडनी की बीमारी के अचूक आयुर्वेदिक औषधि है पुनर्नवा

10/04/20
in उत्तराखंड, हेल्थ
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
पुनर्नवा या शोथहीन या गदहपूरना एक आयुर्वेदिक औषधीय पौधा है। श्वेत पुनर्नवा का पौधा बहुवर्षायु और प्रसरणशील होता है। क्षुप 2 से 3 मीटर लंबे होते हैं। ये प्रतिवर्ष वर्षा ऋतु में नए निकलते हैं व ग्रीष्म में सूख जाते हैं। इस क्षुप के काण्ड प्रायः गोलाई लिए कड़े, पतले व गोल होते हैं। पर्व संधि पर ये मोटे हो जाते हैं। शाखाएं अनेक लंबी, पतली तथा लालवर्ण की होती हैं। पत्ते छोटे व बड़े दोनों प्रकार के होते हैं। लंबाई 25 से 27 मिलीमीटर होती है। निचला तल श्वेताभ होता है व छूने पर चिकना प्रतीत होता है आसवन किसी मिश्रित द्रव के अवयवों को उनके वाष्पन सक्रियताओं के अन्तर के आधर पर उन्हें अलग करने की विधि है। यह पृथक्करण की भौतिक विधि है न कि रासायनिक परिवर्तन अथवा रासायनिक अभिक्रिया। व्यावसायिक दृष्टि से आसवन के बहुत से उपयोग हैं। कच्चे तेल क्रूड आयल के विभिन्न अवयवों को पृथक करने के लिये इसका उपयोग किया जाता है। पानी का आसवन करने से उसकी अशुद्धियाँ जैसे नमक निकल जातीँ हैं और अधिक शुद्ध जल प्राप्त होता हैदेश में किडनी की समस्या से जूझ रहे अधिकतर मरीजों के लिए डायलिसिस जिंदगी का जरिया है।
एलोपैथी में किडनी की समस्या के उपचार के लिए सीमित विकल्प को देखते हुए पारंपरिक चिकित्सा पद्धति के विशेषज्ञों ने दावा किया है कि सावधानी से भोजन करने और पुनर्नवा का सेवन बीमारी के बढ़ने की गति को धीमी कर सकती है और बीमारी के लक्षणों से निजात दिला सकती है। दो हालिया वैज्ञानिक अध्ययनों में दावा किया गया है कि पुनर्नवा जैसे पारंपरिक औषधीय पौधे पर आधारित औषधि का फार्मूलेशन किडनी की बीमारी में रोकथाम में कारगर हो सकता है और बीमारी से राहत दिला सकता है। एक नए अध्ययन के मुताबिक, किडनी की समस्या से जूझ रही एक महिला को पुनर्नवा से बनाया गया सीरप एक महीने तक दिया गया, जिससे उनके रक्त में क्रिएटिनिन और यूरिया का स्तर स्वस्थ स्तर पर आ गया।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में किया गया अध्ययन 2017 में वर्ल्ड जर्नल ऑफ फार्मेसी एंड फार्मास्युटिकल्स साइंस प्रकाशित हुआ। इंडो अमेरिकन जर्नल ऑफ फार्मास्युटिकल रिसर्च में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में भी कमल के पत्ते, पत्थरचूर और अन्य जड़ी बूटियों सहित पुनर्नवा से बनायी गयी औषधि के प्रभाव का जिक्र किया है। आयुर्वेद में कई आयुर्वेदिक औषधियां हैं, जो हमारे शरीर के लिए बहुत ही फायदेमंद हैं। पुराने समय में भी इन देसी नुस्खों और जड़ी.बूटियों का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे ही आज हम आपको पुनर्नवा औषधि के बारे में बताने जा रहे हैं, जो हमारे स्वास्थ के लिए बहुत फायदेमंद हैं।
यह एक बरसाती पौधा है। असम में इसे सब्जी के रूप में भी खाया जाता है। यह पौधा कई औषधीय गुणों से भरपूर है। पुनर्नवा को कैंसर के लिए सबसे बेहतरीन औषधि माना जाता है। एक शोध में चूहों पर इसका प्रयोग किया गया तो पता चला कि प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को बढ़ाता है और चूहों में बी16 .10 मेलेनोमा कोशिकाओं की मेटास्टैटिक प्रगति को रोकता है। डायबिटीज के लिए भी पुनर्नवा का काफी महत्व है। पुनर्नवा इंसुलिन के स्त्राव में सुधार करने का काम कर सकता है। पीलिया के रोगों में भी पुनर्नवा का बहुत महत्व है। पुनर्नवा की जड़, छाल, पत्ती, फूल और बीज को शहद या मिश्री के साथ सेवन करें तथा इसका रस या काढ़ा पिएं। पुनर्नवा के संपूर्ण पौधे के रस में हरड़ के फलों का चूर्ण मिलाकर लेने से पीलिया में काफी लाब होता है।
इस औषधि की जड़ के तेल में गर्म कर के त्वचा पर मालिश करें। यह सभी प्रकार के रोंगों के इलाज में उपयोगी है। यह रक्त को शुद्ध करता है और त्वचा को युवा बनाता है। पुनर्नवा की जड़ का पानी त्वचा की एलर्जी जैसे खुजलीए चकत्ते आदि के इलाज के लिए भी उपयोग हो सकता है। इस औषधि का नियमित उपयोग त्वचा को प्राकृतिक चमक देता हैण् पुनर्नवा का उपयोग वजन कम करने में भी लाभकारी हैण् इसका बर्बल दवाओं के रूप में उपयोग कि या जाता हैण् यह जड़ी.बूटी इलेक्ट्रोलाइट्स या पोटेशियम की मात्रा को शरीर में कम किए बिना पेशाब को उत्तेजित करता है और शरीर से अतिरिक्त तरल और अपशिष्ट पदार्थ को हटाने में मदद करता है। इस प्रकार, पुनर्नवा वजन घटाने में मदद करता है। पहाड़ों के दुर्गम रास्तों पर अगर किसी मरीज को अस्पताल जाना हो तो वहां पहुंचना बहुत ही मुश्किल होता है। ऐसे में वहां के स्थानीय लोग जड़ीबूटी व औषधियों से ही अपना इलाज करते हैं। ये कहा जा सकता है कि पहाड़ी लोग आज भी आयुर्वेदिक ज्ञान को समेटे हुए हैं।
उत्तराखंड के पिथौराखंड जिले के रहने वाले पवन थापा ने बताया कि यहां हमारे यहां जब भी किसी को चोट लगती है तो ढाक के पत्तियों का लेप लगाते हैं, उससे घावों के भरने में मदद करता है। ऐसे ही पुनर्नवा आंत की बीमारी और मुंह के छाले में लाभदायक होता है। पहाड़ों पर पाने वाले बिच्छू घास को लोग बुखार आने, शरीर में कमजोरी होने, जकड़न और मलेरिया जैसे बीमारी को दूर भागने में इस्तेमाल करते हैं। बिच्छू घास की पत्तियों पर छोटे.छोटे बालों जैसे कांटे होते हैं। बिच्छू घास के बीजों को पेट साफ करने वाली दवा के रूप में प्रयोग किया जाता है। उत्तराखंड को औषधि प्रदेश, यानी हर्बल स्टेट भी कहा जाता है। यहां पाई जाने वाली औषधीय गुणों की वनस्पतियों के सही उत्पादन व मार्केटिंग पहुंचना बहुत ही मुश्किल है। यहां अश्वगंधा, ब्राह्मी, शंखपुष्पी, सफेद मूसली समेत कई अन्य अमूल्य औषधियां मिलती हैं। वर्तमान आंकड़ों के तहत मूसली, अश्वगंधा, प्लाश, शंखपुष्पी, भूमि आंवला, खेर के बीज, गांद, कसीटा, धावड़ा, कमरकस जड़ी.बूटी विलुप्त हो गई हैं।
केंद्र सरकार ने औषधीय पौधों सफेद मूसली, लेमन, मेंथा, पाल्मारोजा, अश्वगंधा जैसी औषधियों को बचाने के लिए औषधीय उद्योगों के मध्य समन्वय की आवश्यकता महसूस की। इसके बाद केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय औषधीय वनस्पति समिति का गठन किया गया। समिति ने 32 औषधियों के विकास को प्राथमिकता में रखा है। इनमें आंवला, अशोक, अश्वगंधा, अतीस, बेल, भूमि अम्लाकी, ब्राह्मी, चंदन, चिराता, गुग्गल, इसबगोल, जटामांसी, कालमेघ, कोकुम, कथ, कुटकी, मुलेठी, सफेद मूसली, पत्थरचुर, पिप्पली, दारुहल्दी, केसर, सर्पगंधा, शतावरी, तुलसी, वत्सनाम, मकोय प्रजाति के विकास की योजना बनाई। इनमें कुछ विशेष प्रकार की जड़ी.बूटियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। हालात यह हैं कि जागरूकता के अभाव में लोग इन औषधीय पेड़.पौधों को नष्ट कर रहे हैं। वर्तमान में अर्जुन के पेड़ों के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा हैं। दरअसल सहरिया आदिवासी लोग अर्जुन के पेड़ की छाल निकाल ले रहे हैं। इससे इन पेड़ों का विकास अवरुद्ध हो रहा है। कई छोटे पेड़ तो छाल निकलने के कुछ समय बाद उखड़ जाते हैं। संरक्षण की दृष्टि से प्रकृति में पेड़.पौधों एवं जीव.जन्तुओं के अस्तित्व पर नजर रखने वाली अन्तरराष्ट्रीय संस्था इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन अॉफ नेचर ने इस पौधे को अति संकट ग्रस्त श्रेणी में रखा है।

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