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सदियों का संकल्प सिद्धी को प्राप्त हो रहा राम मंदिर

25/11/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
रामनगरी की बिगड़ने में तो देर नहीं लगी, किंतु बनने के लिए उसे सदियों तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। एक मार्च 1528 को वह चंद घंटे का अभियान था, जब बाबर के सेनापति मीर बाकी ने तोप के गोलों से रामजन्मभूमि पर बने मंदिर को ध्वस्त किया और इसी के बाद से अस्मिता पर आघात से खोया गौरव वापस पाने का शुरू हुआ अभियान अनेक उतार-चढ़ावो से गुजरता हुआ सुदीर्घ काल तक चला।497 वर्ष सात माह और 22 दिन बाद मंगलवार को राम भक्तों के लिए वह स्वर्णिम और निर्णायक घड़ी आएगी, जब भव्य राम मंदिर के स्वर्ण शिखर पर प्रधानमंत्री के हाथों ध्वजारोहण के साथ रामनगरी की बिगड़ी शत-प्रतिशत पूर्णता के साथ संवरेगी। रामजन्मभूमि मुक्ति का सुदीर्घ संघर्ष अदम्य साहस और सतत प्रतिबद्धता के साथ ऊबन, घुटन और हताशा का भी उदाहरण प्रस्तुत करने वाला रहा है। नौ नवंबर 2019 को रामलला के पक्ष में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आने के कुछ पूर्व तक भी अंतिम रूप से यह नहीं कहा जा सकता था कि मंदिर बनेगा ही। 464 वर्ष बाद छह दिसंबर 1992 को मस्जिद का बाना पहनाए गए बिखंडित भवन से मुक्ति तो मिली, किंतु बाद के 27 वर्ष तक रामलला को तंबू-कनात के अस्थायी मंदिर में रहना पड़ा। ऐसे में भव्य मंदिर की बात तो दूर, रामलला के लिए कामचलाऊ मंदिर की परिकल्पना भी राम भक्तों को राहत देने लगी थी। यद्यपि रामजन्मभूमि न्यास ने 1989 में ही रामजन्मभूमि पर नागर शैली के भव्य मंदिर का मानचित्र तैयार करा लिया था, किंतु लंबी प्रतीक्षा के चलते इस पर अमल होने का विश्वास डगमगा रहा था। मानचित्र के अनुरूप तराशी गई शिलाओं पर काई जमने लगी थीअवरोह की घुटन भरी घाटियों से गुजरी रामनगरी आज इस सत्य की परिचायक बन कर प्रतिष्ठित हुई है कि पतन-प्रतिकूलता से उबर कर अनुकूलता और वैभव के किस शिखर पर पहुंचा जा सकता है।न केवल रामजन्मभूमि न्यास ने साढ़े तीन दशक पूर्व जिस मंदिर की कल्पना की थी, उससे भी विशाल और भव्य मंदिर निर्मित हुआ है, बल्कि भव्य राम मंदिर के साथ विश्व स्तरीय सांस्कृतिक नगरी के रूप में रामनगरी भी दिव्य आकार ले रही है। गत 55 माह में एक-एक कर आकार ग्रहण करते राम मंदिर के शिखर-उप शिखर के साथ रामनगरी ने भी भव्यता के अनेक शिखर-उप शिखर प्रशस्त किए हैं।महर्षि वाल्मीकि अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट, वैश्विक स्तर का अयोध्या धाम रेलवे स्टेशन, राम पथ, भक्ति पथ, धर्म पथ एवं अनेक उपरिगामी सेतु से युक्त मार्गों के अति उन्नत प्रबंधन सहित 50 हजार करोड़ रुपये से भी अधिक की परियोजनाओं के साथ आज रामनगरी के बारे में राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त की यह पंक्तियां अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होंगी, ‘देख लो साकेत नगरी है यही स्वर्ग से मिलने गगन को जा रही।’आज पूरा विश्व राममय है. हर रामभक्त के दिल में संतोष और अपार अलौकिक आनंद है. उन्होंने कहा कि सदियों की वेदना आज विराम पा रहा है. सदियों का संकल्प सिद्धी को प्राप्त हो रहा है. आज जब राम मंदिर के प्रांगण में कोविदार फिर से प्रतिष्ठित हो रहा है। यह केवल एक वृक्ष की वापसी नहीं है। हमारी अस्मिता का पुनर्जागरण है। देश को आगे बढ़ना है तो अपनी विरासत पर गर्व करना होगा। अपनी विरासत पर गर्व के साथ साथ गुलामी की मानसिता से मुक्ति भी जरूरी है। आज से 190 साल पहले 1835 में मैकाले नाम के एक अंग्रेज ने भारत को अपनी जड़ों से उखाड़ने के बीज बोए थे। मैकाले ने भारत में मानसिक गुलामी की नींव रखी थी। 2035 में इस घटना को 200 साल पूरे होंगे। हमें आने वाले दस सालों तक भारत को गुलामी की मानसिकता से मुक्त करना है। आज जब राम मंदिर के प्रांगण में कोविदार फिर से प्रतिष्ठित हो रहा है। यह केवल एक वृक्ष की वापसी नहीं है। हमारी अस्मिता का पुनर्जागरण है। देश को आगे बढ़ना है तो अपनी विरासत पर गर्व करना होगा। अपनी विरासत पर गर्व के साथ साथ गुलामी की मानसिता से मुक्ति भी जरूरी है। आज से 190 साल पहले 1835 में मैकाले नाम के एक अंग्रेज ने भारत को अपनी जड़ों से उखाड़ने के बीज बोए थे। मैकाले ने भारत में मानसिक गुलामी की नींव रखी थी। 2035 में इस घटना को 200 साल पूरे होंगे। हमें आने वाले दस सालों तक भारत को गुलामी की मानसिकता से मुक्त करना है। अयोध्या धाम में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के भव्य मंदिर पर ध्वजारोहण एक यज्ञ की पूर्णाहुति नहीं, बल्कि एक नए युग का शुभारंभ है। आज का दिन उन संतों, योद्धाओं, श्री राम भक्तों की अखंड साधना, संघर्ष को समर्पित है, जिन्होंने इस पूरे आंदोलन और संघर्ष के लिए अपना जीवन समर्पित किया। श्रीराम मंदिर पर फहराता यह केसरिया ध्वज धर्म का प्रतीक है, मर्यादा का प्रतीक है, सत्य, न्याय और राष्ट्र धर्म का भी प्रतीक है। यह विकसित भारत की संकल्पना का प्रतीक भी है, क्योंकि संकल्प का कोई विकल्प नहीं। 25 नवंबर का दिन विवाह पंचमी भी है, जिसे त्रेतायुग में भगवान राम और सीता के विवाह दिवस के रूप में जाना जाता है. यह ध्वज पारंपरिक उत्तर भारतीय नागर आर्किटेक्चरल शैली में बने राम मंदिर के शिखर पर फहराया जाएगा, जबकि मंदिर के चारों ओर दक्षिण भारतीय आर्किटेक्चरल परंपरा में डिजाइन किया गया 800 मीटर का परकोटा मंदिर की आर्किटेक्चरल विविधता को दिखाता है। राम जन्मभूमि परिसर में मुख्य मंदिर की बाहरी दीवारों पर वाल्मीकि रामायण पर आधारित भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़े बारीकी से पत्थर पर उकेरे गए 87 प्रसंग हैं। घेरे की दीवारों पर भारतीय संस्कृति से जुड़े 79 कांस्य ढाल वाले प्रसंग रचे गए हैं। *लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं।लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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