डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड की मिट्टी से निकले डॉ. Iरमेश चंद्र पांडेय ने करीब चार दशक पहले अमेरिका की धरती पर कदम रखा। इसके बाद विज्ञान, चिकित्सा और औषधीय शोध के क्षेत्र में उन्होंने ऐसा काम किया, जिसने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।
सिकल सेल एनीमिया जैसी गंभीर बीमारी के उपचार के लिए दवा के विकास में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। औषधीय पौधों पर शोध किया और भारतीय पारंपरिक चिकित्सा, खासकर आयुर्वेद, को आधुनिक वैज्ञानिक शोध से जोड़ने की दिशा में लगातार काम किया।
लेकिन इस कहानी का सबसे भावुक पहलू कुछ और है।
डॉ. पांडेय ने विवाह नहीं किया। अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा शोध और दूसरों की मदद में लगा दिया। उन्होंने अपने कई नाते-रिश्तेदारों और परिचितों को अमेरिका में आगे बढ़ने और बसने में मदद की। आज करीब 96 वर्ष की उम्र में वही इंसान बेहद अकेला है।
जिसने न जाने कितने लोगों के जीवन को संवारने में मदद की, आज उसे अपने जीवन के इस कठिन पड़ाव पर साथ, अपनापन और देखभाल की जरूरत है।
इसलिए यह सिर्फ़ डॉ. पांडेय की कहानी नहीं है। यह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी का सवाल है। उत्तराखंड ने ऐसे लाल को जन्म दिया, जिसने दुनिया में देवभूमि का नाम रोशन किया। अब वक्त है कि देवभूमि भी अपने इस लाल को याद करे।
अगर उत्तराखंड सरकार, सामाजिक संस्थाएँ, प्रवासीh उत्तराखंडी और समाज के सक्षम लोग मिलकर उनके लिए कोई सम्मानजनक और सुरक्षित व्यवस्था खड़ी कर सकें, तो शायद इससे बड़ी श्रद्धांजलि उनके जीवन और योगदान के लिए कोई नहीं होगी।
जिन्होंने पूरी जिंदगी दूसरों के लिए रास्ते बनाए, क्या हम उनके जीवन के इस आखिरी पड़ाव पर उनके साथ खड़े हो सकते हैं?
लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











