डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
भारतीय राजनीति में लंबी पारी खेलने वाले नारायण दत्त तिवारी के जीवन में आये कई तरह के विवादों के बावजूद आमजन में उनकी छवि ‘विकास पुरूष’ की ही रही। वह देश के एकमात्र ऐसे नेता थे भारतीय राजनीति में लंबी पारी खेलने वाले नारायण दत्त तिवारी के जीवन में आये कई तरह के विवादों के बावजूद आमजन में उनकी छवि ‘विकास पुरूष’ की ही रही। वह देश के एकमात्र ऐसे नेता थे उत्तराखंड बनने के बाद ही नहीं उससे पहले ही उन्होंने जिले के विकास की नींव रख दी थी। उन्होंने उत्तर प्रदेश के सीएम रहते समय हरिद्वार को अलग जिला बनाया। वर्ष 1988 में जब यूपी के सीएम के रुप में उनका कार्यकाल अंतिम चरण में था 21 साल पहले उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने रामनगर के विकास और जन सुरक्षा के लिए महत्वाकांक्षी ड्रीम प्रोजेक्ट तटबंध बाईपास का जो सपना देखा था, उसे उनके बाद आए नौ मुख्यमंत्री भी आज तक धरातल पर नहीं उतार पाए।यह स्थिति तब है, जब इस परियोजना का बकायदा शासनादेश जारी हो चुका था और बजट के लिए दो बार शासन को प्रस्ताव भी भेजा गया था। यह पूरा मामला भरतपुरी-पंपापुरी बाईपास और तटबंध निर्माण से जुड़ा है।साल 2005 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने कोसी नदी के उफान से भरतपुरी और पंपापुरी क्षेत्र को बचाने तथा शहर के ट्रैफिक दबाव को कम करने के लिए कोसी बैराज से आमडंडा तक एक बहुआयामी तटबंध बाईपास बनाने की घोषणा की थी। 24 अगस्त 2005 को जारी शासनादेश (घोषणा संख्या 139 ए) आज भी सरकारी अभिलेखों में दर्ज है। उस वक्त सिंचाई विभाग और लोक निर्माण विभाग (लोनिवि) ने इसके लिए 17 करोड़ रुपये का एस्टीमेट तैयार कर शासन को भेजा था। वर्ष 2007 में उत्तराखंड में सत्ता परिवर्तन हुआ और इसी के साथ यह महत्वपूर्ण योजना ठंडे बस्ते में चली गई। इसके बाद वर्ष 2010 में भाजपा सरकार के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने इस योजना को दोबारा शुरू करने के लिए नया एस्टीमेट मांगा।इस बार दोनों विभागों ने लागत बढ़ने के कारण 40 करोड़ रुपये का नया प्रस्ताव भेजा। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि इसके बाद भी 21 साल से अधिक का समय बीत चुका है।मगर इस जनहित की योजना के लिए आज तक एक रुपया भी स्वीकृत नहीं हो सका। नतीजा यह है कि रामनगर की जनता आज भी बाढ़ के साये में जीने और रोजाना जाम से जूझने को मजबूर है। बाईपास तटबंध योजना को सोच-समझकर तैयार किया गया था। कोसी नदी के किनारे-किनारे तटबंध बनता तो बाढ़ से डिग्री कालेज, भरतपुरी, पंपापुरी के मोहल्लों की सुरक्षा होती। वहीं, तटबंध के ऊपर बाईपास भी बनना था।ऐसे में काशीपुर से पहाड़ और पहाड़ से काशीपुर और हल्द्वानी आने-जाने वाले वाहनों को शहर में नहीं घुसना पड़ता। इससे लोगों का जाम की परेशानी से भी नहीं जूझना पड़ता। मगर नेताओं के आश्वासनों और अफसरशाही की लेटलतीफी के कारण यह परियोजना आज भी अधर में लटकी पड़ी है। एनएच की ओर से अब आमडंडा तक बाईपास निकालने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। जिसमें करोड़ों रुपये खर्च होने का अनुमान है। क्योंकि वन विभाग ने एनएच को एलीवेटेड रोड बनाने के लिए एनएच को कहा है।क्योंकि वन क्षेत्र होने से वन्य जीवों की आवाजाही रहती है। ऐसे में चौड़ीकरण से वाहनों की तेज स्पीड चलने से वन्य जीवों की आवाजाही प्रभावित होगी। तटबंध बाईपास योजना सबसे बेहतरविकल्पथा।तटबंध बाईपास योजना पूर्व सीएम एनडी तिवारी के समय की थी। लेकिन कांग्रेस ही इस योजना को धरातल पर नहीं उतार पाई। शायद फारेस्ट क्लीयरेंस की वजह से भी योजना आगे नहीं बढ़ी हो। अब उस योजना का कोई पता नहीं है। एनएच की ओर से आमडंडा के लिए बाईपास निकालने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। इस मामले में उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी ने दोनों को ही विकास विरोधी बताया है. उन्होंने कहा उक्त मांग को लेकर यहां के लोग कई बार सरकारों पर दबाव बना चुके हैं. उन्होंने कहा कोसी नदी पर तटबंध व बाईपास बनाना बहुत जरूरी है. जिससे नदी से कटाव होने के कारण लोगों के मकानों को खतरा उत्पन्न हो रहा है वह नहीं होगा. उन्होंने कहा यदि बाईपास व तटबंध का निर्माण होता है तो जनता को इसका लाभ मिलेगा. उन्होंने कहा लगातार देखा जा रहा है कि प्रदेश में विकास कार्यों को लेकर वन विभाग के अधिकारियों द्वारा लगातार अडंगा लगाया जा रहा है,जो कि प्रदेश हित में ठीक नहीं है. उनकी राजनीतिक और प्रशासनिक पारी को देखकर ये कहना सही होगा कि नारायण दत्त तिवारी अपने पीछे एक लंबा और गौरवपूर्ण राजनीतिक इतिहास छोड़गये हैं, जिससे अगर आज के नेता प्रेरणा ले सके तो निसंदेह ही देश और खासकर उत्तराकंड को खासा फायदा होगा।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.














