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स्वामी चिन्मयानन्द जगत की अमूल्य धरोहर विश्व को पढ़ायाअध्यात्म का पाठ

10/05/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
स्वामी चिन्मयानन्द का जन्म 8 मई 1916 को केरल राज्य के इरनाकुलम शहर में हुआ था। ‘स्वामी चिन्मयानन्द’, उनको यह नाम आध्यात्मिक पथ पर चलते समय मिला था, किन्तु उनका वास्तविक नाम था बालकृष्ण मेनन। बालकृष्ण ने वर्ष 1942 में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हुए ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में अहम भूमिका निभाई थी। जिसके लिए उनके खिलाफ ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तारी का वारंट भी जारी किया था। यह खबर बालकृष्ण को मिलते ही, वह अंग्रेजों से बचते हुए पहले अबोटाबाद गए और फिर दिल्ली।दो साल बाद जब उन्हें लगा कि अंग्रेज सरकार उनकी गिरफ्तारी को भूल चुकी है तब वह पंजाब आए और संगठन के काम में वापस जुट गए। किन्तु अंग्रेज सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और कुछ दिनों तक जेल में प्रताड़ित करने के बाद उन्हें सड़क पर बेसहारा और बेसुध छोड़ दिया गया। जेल की दूषित वातावरण में उन्हें टाइफस बीमारी ने जकड़ लिया था। स्वास्थ्य की स्थिति में सुधार आने के बाद बालकृष्ण ने पत्रकारिता को चुना और नेशनल हेराल्ड अखबार में संवाद-दाता के रूप में काम करने लगे। कुछ ही समय में उनके लेख लोगों में प्रचलित होने लगे और उनका नाम भी प्रचलित होने लगा। अध्यात्म से आमना-सामना होने से पहले बालकृष्ण धर्म और रीति-रिवजों में विश्वास नहीं रखते थे। जिस वजह से रीति-रिवाजों का पर्दाफाश करने के लिए वह ऋषिकेश स्वामी शिवानंद सरस्वती जो उस समय के विख्यात आचार्य एवं सनातन धर्म के नेता थे, उनसे मिलने गए। ऋषिकेश में 6 महीने रहने के पश्चात उन्होंने पत्रकारिता का कार्य छोड़ भगवा वस्त्र धारण कर लिया, साथ ही उनका नाम भी बालकृष्ण से स्वामी चिन्मयानन्द हो गया। स्वामी चिन्मयानन्द ने सनातन धर्म के प्रसिद्ध साधु स्वामी तपोवन के सानिध्य में 10 वर्षों तक ग्रंथ एवं शास्त्रों का अध्ययन किया। जब उन्हें लगा कि ग्रंथों में लिखे उपदेशों को अधिक लोगों तक पहुँचाना चाहिए, तब उन्होंने आश्रम छोड़, भारत भ्रमण का फैसला किया। उन्होंने मंदिरों में अपने उपदेश एवं शास्त्रों के ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाना आरम्भ किया और कुछ ही समय में उन्हें सुनने वालों की संख्या बढ़ने लगी। सनातन धर्म की विशेषताओं को दुनिया में प्रचार-प्रसार करने के लिए 8 अगस्त 1953 को ‘चिन्मय मिशन’ आरम्भ किया गया। साथ ही बड़े-बड़े शहरों में ज्ञान-यज्ञ को आरम्भ किया गया, फिर यह ज्ञान-यज्ञ छोटे शहरों में भी प्रारम्भ हुआ। कुछ समय बाद स्वामी चिन्मयानन्द विदेशों में भी प्रवचन के लिए जाने लगे और वहां भी ज्ञान-यज्ञ की मांग तेज होने लगी। देश एवं विदेशों में सनातन धर्म के प्रति लोगों की आस्था और भी अटूट होती रही।ऐसे ही धर्म-गुरु एवं साधुओं ने विश्वभर में सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार किया है और अब यह हमारा दायित्व है कि इस लिबरल दुनिया में सनातन धर्म के उपदेशों को कहीं खोने न दें। गुरुदेव स्वामी चिन्मयानंद एक ऐसे व्यक्ति का दुर्लभ और दिलचस्प उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, जो धर्म और ईश्वर के मामलों में एक कट्टरपंथी संशयवादी से वैश्विक धार्मिक और आध्यात्मिक संगठन के संस्थापक में बदल गया। बालकृष्ण मेनन, जैसा कि उन्हें मठवासी जीवन से पहले बुलाया जाता था, हमेशा धार्मिक प्रथाओं और ईश्वर की पूजा को तर्कहीन और अनावश्यक मानते थे। फिर भी, बचपन से ही, उन्होंने भगवान शिव के रूप की कल्पना करने की आदत विकसित कर ली थी; जो वास्तव में उपासना के रूप में जाना जाने वाला एक औपचारिक धार्मिक अभ्यास है । इसके अलावा, कहा जाता है कि उन्होंने अपने छोटे दिनों में चट्टंभी स्वामीगल से आध्यात्मिक निर्देश प्राप्त किए थे। हालाँकि, जैसे-जैसे साल बीतते गए, वे एक उग्र व्यक्तित्व और विद्रोही बन गए जो धर्म की आलोचना करते रहे। उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया और सामाजिक सक्रियता के लिए उनकी इच्छा थी। स्वतंत्रता के बाद, उन्होंने एक पत्रकार के रूप में काम किया और भारत के सामने आने वाली सामाजिक चिंताओं के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए बहुत ख्याति अर्जित की। इस पूरे समय उन्होंने धर्म के विचार की आलोचना करना जारी रखा।ऋषिकेश में स्वामी शिवानंद सरस्वती से मिलने के बाद यह सब नाटकीय रूप से बदल गया। बालकृष्ण मेनन ने एक बार हिमालय जाने और साधुओं की “पर्दाफाश” करने का फैसला किया। जब वे ऐसा कर रहे थे, तो उनकी मुलाकात स्वामी शिवानंद से हुई और वे दंग रह गए। वे स्वामी से बहुत प्रभावित हुए, जिनका जीवन समाज की सेवा करने और आध्यात्मिक ज्ञान फैलाने में डूबा हुआ था। बालकृष्ण मेनन का संशयी रवैया कम होने लगा और वे स्वामी शिवानंद से मिलने के लिए बार-बार ऋषिकेश जाने लगे। अंततः उन्होंने मठवासी जीवन अपनाने का फैसला किया। उनके अपने शब्दों में, “यह एकमात्र समझदारी वाली बात थी।” स्वामी शिवानंद ने बालकृष्ण मेनन को संन्यास की दीक्षा दी और उन्हें स्वामी चिन्मयानंद नाम दिया। स्वामी चिन्मयानंद इसके बाद स्वामी तपोवन महाराज के अधीन वेदांत शास्त्रों का गहन अध्ययन करने के लिए उत्तरकाशी चले गए। उनके जीवन का अंतिम भाग भारत और विश्व भर में अद्वैत वेदांत के ज्ञान का प्रचार-प्रसार करने में व्यतीत हुआ। अंग्रेजी में प्रवचन देकर स्वामी चिन्मयानंद ने अद्वैत वेदांत की शिक्षाओं को देश के आधुनिक शिक्षित वर्ग तक पहुँचाया। जैसे-जैसे दिन बीतते गए, उन्होंने बड़ी संख्या में लोगों और समर्पित अनुयायियों को आकर्षित करना शुरू कर दिया। कुछ अनुयायियों ने उनके द्वारा किए जा रहे कार्यों को औपचारिक रूप देने के लिए एक संगठन शुरू करने की इच्छा व्यक्त की और इस प्रकार “चिन्मय मिशन” का जन्म हुआ। स्वामी चिन्मयानंद ने भारत और विश्व भर में धर्म और अध्यात्म पर प्रवचन दिए, गीता ज्ञान यज्ञों आयोजन किया और समाज के सभी वर्गों के लिए कई पहल शुरू कीं: बच्चों के लिए बाल विहार, किशोरों और युवा वयस्कों के लिए चिन्मय युवा केंद्र, बुजुर्गों के लिए वानप्रस्थ; और अद्वैत वेदांत के साधकों के लिए गुरुकुल, संदीपिनी साधनालय का तो जिक्र ही नहीं। 1989 में उन्होंने चिन्मय इंटरनेशनल फाउंडेशन की स्थापना की, जिसका उद्देश्य “अतीत और वर्तमान, पूर्व और पश्चिम, विज्ञान और अध्यात्म, तथा पंडित और जनता के बीच एक सेतु के रूप में खड़ा होना था।” यह संस्थान प्राचीन भारतीय शास्त्रों पर कार्यशालाएँ आयोजित करता है, वेदांत और संस्कृत पर पाठ्यक्रम प्रदान करता है, और संस्कृत में शोध के लिए एक सुप्रसिद्ध केंद्र है। संस्कृत विश्वविद्यालय स्थापित करने का उनका सपना वर्ष 2016 में चिन्मय विश्वविद्यालय की शुरुआत के साथ साकार हुआ। निस्संदेह, स्वामी चिन्मयानंद ने भारतीय आध्यात्मिक विरासत की कालातीत धारा को नया जोश और मजबूती दी।. सनातन धर्म की विशेषताओं को दुनिया में प्रचार-प्रसार करने के लिए 8 अगस्त 1953 को ‘चिन्मय मिशन’ आरम्भ किया गया। साथ ही बड़े-बड़े शहरों में ज्ञान-यज्ञ को आरम्भ किया गया, फिर यह ज्ञान-यज्ञ छोटे शहरों में भी प्रारम्भ हुआ। कुछ समय बाद स्वामी चिन्मयानन्द विदेशों में भी प्रवचन के लिए जाने लगे और वहां भी ज्ञान-यज्ञ की मांग तेज होने लगी। देश एवं विदेशों में सनातन धर्म के प्रति लोगों की आस्था और भी अटूट होती रही।ऐसे ही धर्म-गुरु एवं साधुओं ने विश्वभर में सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार किया है और अब यह हमारा दायित्व है कि इस लिबरल दुनिया में सनातन धर्म के उपदेशों को कहीं खोने न दें।
*लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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