• About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact
Uttarakhand Samachar
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
Uttarakhand Samachar
No Result
View All Result

उत्तराखंड की भोटिया जनजाति का उद्योग थुलमा

07/10/21
in उत्तराखंड
Reading Time: 1min read
859
SHARES
1.1k
VIEWS
Share on FacebookShare on WhatsAppShare on Twitter

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला:

थुलमा भेड़ की ऊन से बनने वाला विशेष प्रकार का कम्बल है। थुलमा पिटलूम (एक प्रकार का खांचा) में बनाया जाता है। चार हिस्सों में ऊन बुनी जाती है। जिन्हें बाद में आपस में जोड़ा जाता है। अभी तक सीमांत में सफेद, काले रंग के ही थुलमे बनते हैं। ऊन की रंगाई नहीं होने के कारण यह दिखने में ज्यादा आकर्षक नहीं होता, लेकिन गुणवत्ता की दृष्टि से यह बेहतरीन है। हीट इंसुलेटर का काम करने वाले एक ही थुलमा शून्य से नीचे तापमान में भी शरीर को खासी गर्मी देता है।

उच्च हिमालयी क्षेत्र में शीतकाल में ठंड से बचाव के लिए इसी का उपयोग होता है। एक थुलमे की कीमत 2200 से 2500 रुपये के बीच होती है। चीन सीमा से लगे धारचूला और मुनस्यारी के हस्तशिल्प थुलमा को जीआइ टैग (भौगोलिक संकेत) मिलना बड़ी उपलब्धि है। दम तोड़ रहे इस उद्यम के अब फिर से रफ्तार पकडऩे की उम्मीद बढ़ गई है। जीआई टैग मिल जाने के बाद अब कारीगरों को इसकी गुणवत्ता के लिए ग्राहकों को सफाई नहीं देनी होगी। ग्लोबल ब्रांड बनने की उम्मीदों के बीच थुलमा चाइनीज कंबलों से मुकाबला कर सकेगा। राज्य की सीमांत तहसील धारचूला और मुनस्यारी के लोग सदियों से हस्तशिल्प के कारोबार से जुड़े हैं।

दन, कालीन, पंखी, चुटके के साथ ही थुलमा भी बनाया जाता है। कभी सीमांत के इस हस्तशिल्प की बाजार में भारी मांग हुआ करती है। यहां के उत्पाद देश भर में पहुंचते थे। 1991 में देश में शुरू  हुए उदारीकरण के बाद सीमांत का हस्तशिल्प पिछडऩे लगा। आधुनिक तकनीक और प्रशिक्षण का अभाव इसका सबसे बड़ा कारण रहा। बावजूद इसके दोनों तहसीलों में अभी भी 200 परिवार हस्तशिल्प के कारोबार से जुड़े हैं। सीमांत के थुलमा उद्यम को अब जीआइ टैग (भौगोलिक संकेत) मिल गया है। अब उम्मीद की जा रही है कि इससे थुलमा की ब्रांडिंग होगी और उद्यम रफ्तार पकड़ेगा। 1962 से पहले थुलमा बनाने के लिए तिब्बत से ऊन आती थी।

सीमांत के व्यापारी तिब्बत से ऊन लाकर स्थानीय लोगों को उपलब्ध कराते थे। 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद तिब्बत से ऊन आना बंद हुआ तो भारत ने सीमांत में पशुपालन विभाग के माध्यम से भेड़ पालन को बढ़ावा दिया। अब क्षेत्र ऊन उत्पादन के मामले में निर्भर हो चुका है। आस्ट्रेलियन भेड़े भी अब सीमांत में पहुंचाई जा चुकी है, जिससे आने वाले दिनों मेें ऊन का उत्पादन और बढ़ेगा। 93 वर्षीय वयोवृद्ध व्यापारी का कहना है कि थुलमा उद्योग को बढ़ाने के लिए उसे आधुनिक तकनीक से जोड़े जाने की जरू रत है। नए यंत्रों के साथ ही स्थानीय लोगों को बेहतर प्रशिक्षण देकर सीमांत में रोजगार के नए अवसर बनाए जा सकते हैं। 

महाप्रबंधक जिला उद्योग केंद्र ने बताया कि जीआइ टैग मिलने से अब थुलमा की ब्रांडिंग हो सकेगी। गुणवत्ता को लेकर खरीदारों में अब किसी तरह का संशय नहीं रहेगा। इससे थुलमा के दुनिया के ठंडे देशों में निर्यात के अवसर बढ़ेंगे। सीमांत मुनस्यारी-धारचूला का ऊन कारोबार पांच दशक पहले तक प्रमुख व्यापार में शामिल था। मुनस्यारी, धारचूला के लोग पहले तिब्बत की ज्ञानिमा और तकलाकोट मंडी से व्यापार करते थे।

वहीं से तिब्बती भेड़ों का ऊन खरीदकर घोड़े-खच्चरों, भेड़-बकरियों में लादकर लाते थे। इसके बाद ऊन के कपड़े तैयार किए जाते थे। तिब्बत से लाया जाने वाले काले और सफेद ऊन को मिलाकर ग्रे कलर (स्थानीय भाषा में भन्नेन रंग) बनाया जाता था। कताई, सफाई, रंगाई करके कोट, पंखी, दन-कालीन, आसन, मफलर, टोपी बनाकर बाजार में बेचे जाते थे। कारोबार को उबारने के लिए तकनीक के साथ ही प्रशिक्षण, सरकारी अनुदान एवं बाजार उपलब्ध कराने की भी दरकार है।1907 में जोहार-  दारमा तथा ब्याँस के मार्गों से केवल दो लाख रुपए की ऊन का आयात किया गया।

 नीती घाटी से होने वाले ऊन के आयात   कमी आई और माणा के मार्ग से होने वाला आयात बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक तक काफी कम हो गया। ऊन के कारोबार को सर्वाधिक हानि भारत  वर्तमान में भी मशीन से निर्मित अपेक्षाकृत काफी सस्ते उत्पादों से प्रतियोगिता के कारण ऊन तथा अन्य तंतुओं से संबन्धित हस्तशिल्प के अस्तित्व पर  संकट है। फिर भी स्थानीय स्तर पर आवश्यकता की वस्तुओं का निर्माण आज भी होता है।

 परंपरागत रूप से चली आ रही ऊन के उत्पादों से संबन्धित तकनीक में केवल इतना ही अन्तर आया है कि कताई से पहले ऊन को धोने की प्रक्रिया के बाद उसे  अलग करने के लिए जहाँ पहले कंघेनुमा ब्रुश का प्रयोग होता था] वहींवर्तमान में कार्डिंग प्लांट का प्रयोग होने लगा है।\

 उद्योग विभागजनजाति विभाग खादी बोर्ड आदि के द्वारा स्थानीय निवासियोंको कच्चा ऊन दिया जाना भी बन्द कर दिया गया है। उसके स्थान पर अब ऋण दिये जाने लगे हैं। पर्वतीय अंचल में उत्पन्न होने वाली बिच्छू घास के रेशों को भी वस्त्र निर्माण के लिए प्रयुक्त किए जाने का प्रयास हो रहा है, परंतु अभी यह बड़े पैमाने पर सामने नहीं आया है।

  उत्तराखण्ड के इस हस्तशिल्प की मूल्यवान विरासत को संरक्षित करने तथा शिल्पियों द्वारा अपनायी जाने वाली तकनीक का वर्तमान तकनीक के साथ तादात्म्य स्थापित करते हुए संवर्धित किये जाने की आवश्यकता है। उत्तराखंड का प्राचीन हस्तशिल्प कालीन उद्योग तकनीकी युग में धीरे-धीरे सिमट रहा है। जबकि  किसी जमाने में पिथौरागढ़, बागेश्वर, चमोली जैसे दूरदराज के पर्वतीय जिले कभी इसी उद्योग से फल फूल रहे थे। लेकिन अब युवा पीढ़ी की इस पारंपरिक हस्तशिल्प से दूरी बना कर पलायन मजबूर बन गई है।आजीविका के तौर पर युवा पीढ़ी इस पुस्तैनी कारोबार को अपनाना नहीं चाहती है। रोजगार के अन्य विकल्प तलाशने के लिए पलायन कर रहे हैं।

पलायन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार भी पिथौरागढ़ से युवाओं ने रोजगार के लिए पलायन किया है। यदि सरकार इस परंपरागत उद्योग को आधुनिक स्वरूप दे तो युवाओं के लिए रोजगार का बड़ा साधन बन सकता है। कभी पूरे देश में अलग पहचान रखने वाले धारचूला-मुनस्यारी के दन कालीन का कारोबार अब सिमटने लगा है। चीन और कोरिया सहित मशीनों में निर्मित आकर्षक डिजाइन के कपड़ों के बाजार में आने से परंपरागत हस्तशिल्प को नुकसान उठाना पड़ा है। बाजार में मांग घटने से युवा पीढ़ी हस्तशिल्प से किनारा करने लगी है। धारचूला और मुनस्यारी में कभी पांच हजार से अधिक परिवार ऊनी हस्तशिल्प पर निर्भर थे।

बाकी जनजातियों के मुकाबले भोटिया समाज की हालत काफी बेहतर है। पहले तिब्बत के साथ व्यापार से हुई आमदनी से ये जीवनयापन करते थे । भोटिया जनजाति के लोग यहां से ऊनी कपड़े और नमक आदि ले जाकर तिब्बत में बेचते थे। इस व्यापार में भाषा भी कभी आड़े नहीं आती थी। भोटिया जनजाति के लोग मनमाफिक कीमत ना मिलने तक अपने हाथों से सामान को ढक लिया करते थे । जब मनमाफिक कीमत मिल जाती थी तभी वो सामान दिया करते थे लेकिन 1962 में चीन के साथ युद्ध के बाद पारंपरिक रूप से चला आ रहा ये व्यापारिक रिश्ता खत्म हो गया ।

ऐसे में ये अपना सामान आसपास की आबादी को बेचने के लिए मजबूर हो गए हालांकि इन्होंने अभी तक अपना पारंपरिक व्यवसाय नहीं छोड़ा है । इऩके गावों में हर घर में रांच होती है । जिस पर ये वॉल हैंगिंग, कालीन जैसी तमाम चीजें बनाते हैं । ऊनी कपड़े बनाने में भी ये माहिर हैं लेकिन अपना सामान बेचने में इन्हें कई तरह के समझौते करने पड़ते हैं । कोई ठोस व्यापारिक नीति नहीं होने और सरकारी मदद नहीं होने की वजह से धीरे धीरे इस व्यापार पर असर पड़ने लगा है ।

राज्य के लिए यह गौरव का विषय है कि यहां के उत्पादों को वैश्विक पहचान मिल रही है। वोकल फार लोकल और स्थानीय उत्पाद के प्रचार-प्रसार में जीआइ टैग महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उत्तराखंड में और भी ऐसे उत्पाद हैं जो भौगोलिक क्षेत्र विशेष के आधार पर अपनी वैश्विक पहचान बना रहे थुलमा शामिल हैं। 

Share344SendTweet215
Previous Post

डोईवाला : संयुक्त किसान मोर्चा ने काले झंडे दिखाकर विरोध प्रदर्शन किया

Next Post

डोईवाला : सौडा सरोली में “संवाद से समाधान तक” बैठक आयोजित 

Related Posts

उत्तराखंड

मुख्यमंत्री ने हर घर तिरंगा यात्रा कार्यक्रम में किया प्रतिभाग

August 9, 2026
9
उत्तराखंड

डिब्बे में फंस गया विशाल मॉनिटर लिजर्ड का सिर, शिक्षिका और युवक ने बचाई जान

August 9, 2026
10
उत्तराखंड

समय के साथ उधड़ने लगी हथकरघे से बुनी विरासत

August 9, 2026
6
उत्तराखंड

डोईवाला: साईं सृजन पटल ने मनाया द्वितीय स्थापना दिवस

August 9, 2026
16
उत्तराखंड

डोईवाला: जेसीबी की मदद से सोंग नदी पर फिर तैयार किया अस्थायी बांध

August 9, 2026
26
उत्तराखंड

देहरादून एयरपोर्ट की जिप्सम फॉल्स सीलिंग का एक हिस्सा क्षतिग्रस्त

August 9, 2026
9

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Popular Stories

  • चार जिलों के जिलाधिकारी बदले गए

    67718 shares
    Share 27087 Tweet 16930
  • डोईवाला : पुलिस,पीएसी व आईआरबी के जवानों का आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण सम्पन्न

    45787 shares
    Share 18315 Tweet 11447
  • ऑपरेशन कामधेनु को सफल बनाये हेतु जनपद के अन्य विभागों से मांगा गया सहयोग

    38074 shares
    Share 15230 Tweet 9519
  •  ढहते घर, गिरती दीवारें, दिलों में खौफ… जोशीमठ ही नहीं

    37453 shares
    Share 14981 Tweet 9363
  • विकासखंड देवाल क्षेत्र की होनहार छात्रा ज्योति बिष्ट ने किया उत्तराखंड का नाम रोशन

    37374 shares
    Share 14950 Tweet 9344

Stay Connected

संपादक- शंकर सिंह भाटिया

पता- ग्राम एवं पोस्ट आफिस- नागल ज्वालापुर, डोईवाला, जनपद-देहरादून, पिन-248140

फ़ोन- 9837887384

ईमेल- shankar.bhatia25@gmail.com

 

Uttarakhand Samachar

उत्तराखंड समाचार डाॅट काम वेबसाइड 2015 से खासकर हिमालय क्षेत्र के समाचारों, सरोकारों को समर्पित एक समाचार पोर्टल है। इस पोर्टल के माध्यम से हम मध्य हिमालय क्षेत्र के गांवों, गाड़, गधेरों, शहरों, कस्बों और पर्यावरण की खबरों पर फोकस करते हैं। हमारी कोशिश है कि आपको इस वंचित क्षेत्र की छिपी हुई सूचनाएं पहुंचा सकें।
संपादक

Browse by Category

  • Bitcoin News
  • Education
  • अल्मोड़ा
  • अवर्गीकृत
  • उत्तरकाशी
  • उत्तराखंड
  • उधमसिंह नगर
  • ऋषिकेश
  • कालसी
  • केदारनाथ
  • कोटद्वार
  • क्राइम
  • खेल
  • चकराता
  • चमोली
  • चम्पावत
  • जॉब
  • जोशीमठ
  • जौनसार
  • टिहरी
  • डोईवाला
  • दुनिया
  • देहरादून
  • नैनीताल
  • पर्यटन
  • पिथौरागढ़
  • पौड़ी गढ़वाल
  • बद्रीनाथ
  • बागेश्वर
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • राजनीति
  • रुद्रप्रयाग
  • रुद्रप्रयाग
  • विकासनगर
  • वीडियो
  • संपादकीय
  • संस्कृति
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • साहिया
  • हरिद्वार
  • हेल्थ

Recent News

मुख्यमंत्री ने हर घर तिरंगा यात्रा कार्यक्रम में किया प्रतिभाग

August 9, 2026

डिब्बे में फंस गया विशाल मॉनिटर लिजर्ड का सिर, शिक्षिका और युवक ने बचाई जान

August 9, 2026
  • About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.