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उत्तराखंड के किसानों की उगाई जड़ी-बूटियों को मिल रहा बाजार

23/02/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड जैव विविधता वाला प्रदेश है. यहां विभिन्न पौधों की 1700 से ज्यादा प्रजातियां पाई जाती हैं. विशेषज्ञों के अनुसार इनमें 700 से ज्यादा पौधों की प्रजातियां औषधि के काम आती हैं. रामायण और राम चरित मानस के अनुसार राम-रावण युद्ध के दौरान जब लक्ष्मण जी को शक्ति लगी थी तो हनुमान जी संजीवनी बूटी भी उत्तराखंड में स्थित हिमालय पर्वत से ही लाए थे. इतना कुछ होने के बावजूद उत्तराखंड के मूल निवासियों को जड़ी बूटी का बाजार नहीं मिल पाया. अब श्रीनगर में संस्थान चला रही डॉ प्रीति सिंह किसानों द्वारा उगाई जड़ी बूटियों को बाजार दिलाने का दावा कर रही हैं. डॉक्टर प्रीति सिंह गढ़वाल विवि की शोध छात्रा रह चुकी हैं. उनकी पढ़ाई लिखाई वाराणसी से ही हुई है. पढ़ने लिखने में तेज प्रीति अब पहाड़ों में रहकर ऑर्गेनिक जड़ी बूटियों को बाजार उपलब्ध करवा रही हैं. सुभाग हिमालयन रिसोर्स की संचालक डॉ. प्रीती सिंह ने बताया कि हिमालय में पाई जाने वाली जड़ी-बूटियां बहुत ही उपयोगी हैं. केवल भारत में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी उनकी काफी मांग है. उन्होंने बताया कि किसान जड़ी-बूटियों की खेती तो करते हैं, लेकिन उनकी पैकेजिंग और बाजार न मिलने के कारण उन्हें अच्छे दाम नहीं मिल पाते. वे इन जड़ी-बूटियों और उत्पादों की अच्छी पैकेजिंग कर देश और विदेश में सप्लाई कर रही हैं. उन्होंने बताया कि अभी उनका उत्पादित सामान अमेरिका, फ्रांस, रूस सहित अन्य देशों के लिए सप्लाई किया जाता है. डॉ. प्रीति बताती हैं कि उनके पास कुटकी, अश्वगंधा, कूट, जटामांसी और हिसालू जैसी जड़ी-बूटियां उपलब्ध हैं. इसके अलावा फूलों में बुरांश, रोज़ पेटल, रोज़मेरी और पहाड़ी उत्पादों में जखिया, मडुआ, और झंगोरा को भी वे पहाड़ी किसानों से लेकर उन्हें बाजार उपलब्ध कराती हैं. वे चमोली और रुद्रप्रयाग के दूरस्थ क्षेत्रों में जड़ी-बूटी की खेती करने वाले किसानों को बाजार मुहैया करवा रही हैं. उनके उत्पाद कर्नाटक, तमिलनाडु और गुजरात की कंपनियां भी खरीदती हैं. उत्तराखंड में यदि किसान अपराजिता की खेती करें, तो उसकी बाजार में काफी मांग है. इसके फूल से ब्लू टी बनाई जाती है. वर्तमान में इसकी खेती उत्तर प्रदेश के कानपुर में की जाती है और वहीं से इसकी सप्लाई होती है. लेकिन वहां इसकी खेती में काफी मात्रा में कीटनाशकों का प्रयोग किया जाता है. बाजार में ऑर्गेनिक ब्लू टी की मांग बहुत अधिक है. इसलिए यदि पहाड़ों में किसान अपराजिता की खेती करें, तो उन्हें अच्छा मुनाफा हो सकता है. उन्होंने बताया कि वे कोशिश कर रही हैं कि अपराजिता की खेती के लिए किसानों को पौध दें और उससे वे रोजगार कर सकें. उन्होंने बताया कि अपराजिता की खेती किसानों के लिए वरदान साबित हो सकती है. उत्तराखंड राज्य के उच्च हिमालयी क्षेत्र में कुटकी, अतीस, सालमपंजा, जटामासी, गंदरायण, वज्रदंती, कूट, चिरायता, वन तुलसी सहित कई बहुमूल्य जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं। तमाम बीमारियों के उपचार में काम आने वाली इन जड़ी-बूटियों का पहले सीधा दोहन किया जाता था। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोग माइग्रेशन के समय इन जड़ी-बूटियों को घाटी में लाते थे। अधिक दोहन होने के कारण जड़ी-बूटियों के संकट में पड़ने के बाद सालमपंजा, जटामासी सहित कुछ अन्य जड़ी-बूटियों के दोहन व बिक्री को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया। इनका दोहन केवल नाप भूमि में खेती करने के बाद ही किया जा सकता है। जड़ी-बूटियों का उपयोग पारंपरिक आयुर्वेदिक और यूनानी दवाओं में देश विदेश में औषधि निर्माताओं द्वारा किया जाता है। इन औषधीय पौधों की खेती और संग्रहण स्थानीय समुदायों, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों की आय का अहम स्रोत बन सकता है। इस तरह अब भी करीब 80% जड़ी बूटियों की आपूर्ति फार्मा कंपनियों को नेपाल के अवैध बाजार से हो रहा है. जबकि, मात्र 20% आपूर्ति ही किसानों से ली जा रही है. उदाहरण के तौर पर कुटकी जिस के दाम किसानों को करीब 1200 रुपए किलो मिलने चाहिए थे. नेपाल से आने वाले तस्कर उसे करीब ₹500 से ₹600 में ही उपलब्ध करा रहे हैं. जबकि, किसान अपने खेतों में करीब ₹800 पर नाली की लागत से इसकी खेती कर रहा है.उधर फार्मा कंपनियां इस रो मटेरियल को दवाई के रूप में तैयार कर उपभोक्ताओं से कई गुना रकम वसूलती है. इसी तरह कुठ का दुनियाभर में बड़ा बाजार है. सऊदी अरब उसका बड़ा हब है और वहां पर इसकी काफी डिमांड भी है, लेकिन अवैध कारोबार के कारण बाजार में इसे करीब 250 रुपए किलो उपलब्ध करा दिया जाता है. जिसका नुकसान किसानों को हो रहा है. उधर, सरकार की तरफ से इसके लिए कोई दाम तय नहीं की है और एमएसपी निर्धारित न होने से भी किसानों को दिक्कतें आ रही है.लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।

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