डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
नौ नवंबर, 2000 को उत्तराखंड देश के मानचित्र पर 27वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। 13 जिलों के छोटे से उत्तराखंड में 71 प्रतिशत से अधिक भूभाग पर वन क्षेत्र है। राज्य के नौ जिले पूरी तरह पर्वतीय भूगोल के हैं, जबकि दो जिले पूर्ण मैदानी और दो मिश्रित भूगोल वाले। कुल मिलाकर लगभग 80 प्रतिशत पर्वतीय भूभाग वाला राज्य है ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण में विधानसभा के दो-दिवसीय सत्र के आलोक में अब सियासी बहस सत्र की अवधि और विपक्ष की भूमिका पर केंद्रित हो गई है।उत्तराखंड की संसदीय कार्यप्रणाली में एक चिंताजनक प्रवृत्ति की ओर फिर से ध्यान आकर्षित करता है। विधानसभा सत्र, विशेष रूप से हाल के वर्षों में, लगातार छोटे होते जा रहे हैं, अक्सर केवल दो से चार दिनों तक ही चलते हैं। इससे विधायकों के पास सार्वजनिक मुद्दों पर चर्चा करने, सरकारी नीतियों की जांच करने और कार्यपालिका को जवाबदेह ठहराने के लिए उपलब्ध समय काफी कम हो गया है। इतने छोटे सत्रों के कारण, सत्र के दौरान पूछे जाने वाले प्रश्न कई विभागों और मंत्रालयों को कवर नहीं कर पाते हैं। वास्तव में, मुख्यमंत्री के सीधे नियंत्रण वाले विभागों के बारे में प्रश्न पूछे जाने का समय काफी समय से समाप्त हो चुका है, क्योंकि सोमवार को सदन की लंबी बैठकें शायद ही कभी होती हैं और यह दिन मुख्यमंत्री के अधीन विभागों के लिए निर्धारित है।विपक्ष ने सरकार पर बार-बार आरोप लगाया है कि वह असहज सवालों और सार्थक बहस से बचने के लिए जानबूझकर सत्रों की अवधि सीमित करती है। विधायी कार्यवाही के लिए पर्याप्त समय न देने की सरकार की अनिच्छा पर सवाल उठाना जायज़ है। हालांकि, कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों और समाचार विश्लेषकों ने यह भी बताया है कि विपक्ष इस स्थिति के लिए अपनी ज़िम्मेदारी से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकता।आलोचना यह है कि विपक्षी दलों ने भी लंबे और अधिक सार्थक सत्र सुनिश्चित करने में लगातार गंभीरता या रुचि नहीं दिखाई है। तैयारी बैठकों, विशेष रूप से व्यापार सलाहकार समिति की बैठकों में उनकी भागीदारी अक्सर अनियमित रही है। इस बार भी, सत्र के एजेंडे को अंतिम रूप देने के लिए अध्यक्ष द्वारा बुलाई गई हालिया बैठकों से कांग्रेस प्रतिनिधि दूर रहे। इसके अलावा, कई मौकों पर व्यवधान, सदन से बाहर चले जाना और विरोध प्रदर्शन ने सदन का बहुमूल्य समय बर्बाद किया है, जबकि इसके बाद कोई सार्थक बहस नहीं हुई।उत्तराखंड में विधानसभा सत्र 2017 में 18 दिनों से घटकर 2022 में मात्र आठ दिन रह गए हैं। इसके बावजूद स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। गौरतलब है कि विधानसभा की कार्यप्रणाली में प्रतिवर्ष 60 सत्रों का प्रावधान है, हालांकि राज्य विधानसभा के गठन के बाद से यह लक्ष्य कभी पूरा नहीं हुआ है। अगस्त 2025 का मानसून सत्र इसका एक और उदाहरण है, जब बार-बार व्यवधान के कारण इसकी कार्यवाही दो दिनों से भी कम समय में समाप्त हो गई और प्रश्नकाल एवं शून्यकाल भी नहीं हो सका।इसलिए, बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सरकार सवालों से बच रही है या विपक्ष को सवाल उठाने के अवसर से वंचित किया जा रहा है। सवाल यह है कि क्या दोनों पक्षों के निर्वाचित प्रतिनिधि वास्तव में विधानसभा को लोकतांत्रिक जवाबदेही के लिए एक प्रभावी मंच बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।उत्तराखंड, जहां बेरोजगारी, पलायन, अपर्याप्त स्वास्थ्य सेवा, खराब संपर्क और बार-बार आने वाली प्राकृतिक आपदाओं जैसी समस्याएं लगातार बनी हुई हैं, वहां विधानसभा सत्रों के लगातार कम होते जाने के बावजूद विधायी ध्यान की कहीं अधिक आवश्यकता है। केवल सैकड़ों प्रश्न प्रस्तुत करना या सदन के बाहर विरोध प्रदर्शन करना सार्थक विधायी भागीदारी का विकल्प नहीं हो सकता। अंततः, जब सरकार की जवाबदेही और विपक्ष की जांच-पड़ताल दोनों संसदीय औपचारिकताओं तक सीमित हो जाती हैं, तो राज्य की जनता का ही नुकसान होता है।इस बीच, मौजूदा सत्र और कल से शुरू होने वाले सत्र से संबंधित सुरक्षा व्यवस्थाओं के संबंध में, चमोली पुलिस ने विधानसभा क्षेत्र और गैरसैंण क्षेत्र को पांच सुपर जोन और 13 सेक्टरों में विभाजित किया है और लगभग 1,500 पुलिसकर्मियों को तैनात किया है। इन व्यवस्थाओं में नागरिक और सशस्त्र पुलिस, प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी, आतंकवाद विरोधी दस्ता, खोजी दस्ता और बम निरोधक दल शामिल हैं। प्रदर्शनकारियों को विधानसभा परिसर तक पहुंचने से रोकने के लिए संवेदनशील मार्गों पर लोहे के गेट, बैरिकेड और कंटीले तार लगाए गए हैं। गैरसैंण के भराड़ीसैंण में आयोजित मौजूदा सरकार का अंतिम सत्र कई मायनों में याद रखा जाएगा। जिस सौम्य तरीके से इस सत्र का आगाज हुआ इसका समापन बेहद निराशाजनक रहा।जनता को जनहित के जिन मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद थी उन पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के आपसी टकराव के कारण चर्चा नहीं हो पाई। नतीजतन पहले दिन अनवरत रिकार्ड सात घंटे तक चलने वाला सत्र दूसरे दिन केवल एक घंटे और चार मिनट में ही सिमट कर रह गया। गैरसैंण में विधानसभा सत्र के सफल संचालन के लिए प्रतिदिन अनुमानित डेढ़ से दो करोड़ रुपये का खर्च आता है। इसमें बिजली, पानी से लेकर खाने-पीने और परिवहन का खर्च शामिल हैं। इसके अलावा सत्र के दौरान सुरक्षा व्यवस्था व कार्यवाही के सुचारू संचालन को बड़ी संख्या में सरकारी अमला भी लगाया जाता है।ऐसे में इनके सत्र के दौरान आने जाने और रहने खाने की व्यवस्था के साथ ही इनको अलग से भोजन भत्ता व रहने का खर्च संबंधित विभाग उठाते हैं। बड़ी संख्या में कार्मिकों की वाहनों से आवाजाही समेत पूरे लाव-लश्कर को मिलाकर यह व्यय दो करोड़ से काफी अधिक हो जाता है। जाहिर है कि इतना खर्च होने के बाद जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की चुनौती भी सरकार के समक्ष रहती है। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.














