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बागेश्वर का उत्तरायणी मेला

13/01/21
in उत्तराखंड, बागेश्वर
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड में सरयू और गोमती नदी के संगम पर स्थित एक तीर्थ है। यहाँ बागेश्वर नाथ की प्राचीन मूर्ति है, जिसे स्थानीय जनता बाघनाथ के नाम से जानती है। पौराणिक धरोहरों को समेटे उत्तराखंड में काशी के नाम से मशहूर बागेश्वर में माघ माह में होने वाला ये उत्तरायणी मेला अलग ही पहचान रखता है। सरयू, गोमती और विलुप्त सरस्वती के संगम तट पर बसे शिवनगरी बागेश्वर में हर साल मकर संक्रांति के दिन से आठ दिन का ये मेला लगता है। 1921 में अंग्रेजों के कुली बेगार कुप्रथा का अंत भी उत्तरायणी के दिन बागेश्वर में ही हुआ था।

उत्तरायणी मेले का इतिहास कुछ ये बताता है कि कुली बेगार का अंत उत्तरायणी मेले के दौरान 14 जनवरी 1921 में कुमाऊं केसरी बद्री दत्त पाण्डे की अगुवाई में हुआ था। इसका प्रभाव सम्पूर्ण उत्तराखंड में था। कुमाऊं मण्डल में इस कुप्रथा की कमान बद्री दत्त पाण्डे जी के हाथ में थी। वहीं गढ़वाल मण्डल में इसकी कमान अनुसूया प्रसाद बहुगुणा के हाथों में थी। 13 जनवरी 1921 को मकर संक्रांति के दिन दोबारा वृहत् सभा हुई और 14 जनवरी को कुली बेगार के रजिस्टरों को सरयू में प्रवाहित कर कुली बेगार का अंत किया गया। 28 जून 1929 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने बागेश्वर की यात्रा की और ऐतिहासिक नुमाइशखेत में सभा कर इस अहिंसक आंदोलन की सफलता पर लोगों के प्रति कृतज्ञता जताई थी।

उत्तराखंड की संस्कृति और यहां के रीति रिवाजों को लोगों के दिलों में कायम रखने के लिए इस तरह के मेले आयोजित होना इसलिए भी ज़रुरी है, क्योंकि लोगों के बीच खत्म हो रही परंपराओं को इसके ज़रिए ज़िंदा रखा जा सकता है। सरयू, गोमती और विलुप्त सरस्वती के संगम तट पर बसे शिवनगरी बागेश्वर में हर साल मकर संक्रांति के दिन से आठ दिन का ये मेला लगता है। 1921 में अंग्रेजों के कुली बेगार कुप्रथा का अंत भी उत्तरायणी के दिन बागेश्वर में ही हुआ था। उत्तरायणी मेला जिले के गरिमामय इतिहास का अभिन्न अंग रहा है। समय के साथ मेले में कई बदलाव आए, लेकिन मेले ने अपना पुरातन स्वरूप किसी न किसी रूप में जीवित रखा है। अतीत में जाएं तो मेला समृद्ध व्यापारिक, ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत की तस्वीर पेश करता है। पुराने समय में मेला वस्तु विनिमय का गवाह रहा है। आजादी के आंदोलन में कुली बेगार प्रथा को समाप्त करने के लिए वर्ष 1921 में हुए आंदोलन के साथ मेले का महत्व आसपास के इलाकों में भी बढ़ने लगा था। इसके साथ ही मेले का स्वरूप भी बदलने लगा। मेले में बाहरी और सीमांत के व्यापारियों की आवाजाही बढ़ने लगी थी। बुजुर्ग बताते हैं कि मेले में दूरदराज के गांवों से लोग साल भर का गुड़, तेल और अन्य जरूरी सामान लेने आते थे, जिसके बदले में वह स्थानीय उत्पाद व्यापारियों को देते थे। इस तरह से मेले में वस्तु विनिमय आदान.प्रदान को बढ़ावा मिला। इसके अलावा सांस्कृतिक विरासत के आदान.प्रदान का भी मेला मुख्य माध्यम था। मेले के दौरान पूरे जिले के लोग बाजार में एकत्र होते थे, वर्तमान समय में कोरोना संक्रमण के चलते जो भी धार्मिक गतिविधियां संचालित की जानी हैं। वे स्वास्थ्य मंत्रालय भारत सरकार के दिशा निर्देशों के अनुसार ही किये जाने हैं, कोविड.19 के कारण इस बार का उत्तरायणी मेला विगत वर्षो की भांति उस भव्य स्वरूप में आयोजित नहीं होगा। इसमें केवल धार्मिक अनुष्ठान के साथ गंगा स्नान व जनेऊ संस्कार ही चिन्हित स्थानों पर ही किये जा सकेंगे तथा इस बार मेले में कोई भी सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं व्यापारिक गतिविधियां तथा विकास प्रदर्शनी स्टॉल आदि नहीं लगायें जायेगे। धार्मिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूूर्ण मेले की गरिमा को देखते हुए गत वर्ष राज्य मेले का दर्जा देने की घोषणा की थी। मेले का व्यापारिक महत्व भी कम नहीं है। यहां उत्तराखंडए यूपीए दिल्ली और हरियाणा से विभिन्न उत्पादों को लेकर व्यापारी हर साल आते हैं।

मेला सांस्कृतिक दृष्टि से भी काफी महत्व रखता है। लोग इस त्योहार को घुघतिया त्यार भी कहते हैं। संगम पर 14 जनवरी 1921 को भारत माता के सपूतों ने कुली बेगार जैसे अंग्रेजी हुकूमत के काले कानूनों के रजिस्टरों को पवित्र सरयू की अविरल धारा में बहा दिए थे। इस निर्णय से ब्रिटिश सरकार हिल गई थी। सरयू बगड़ में लिए गए इस निर्णय से कुर्मांचल में आजादी की ज्वाला तेज हो गई थी।उत्तराखंड में मेलों और धार्मिक त्योहारों की संस्कृति का बड़ा अनूठा संगम रहा है। ये मेले उत्तराखंड की संस्कृति के परिचायक हैं। इनके बिना रंगीलो कुमाऊं और छबीलो गढ़वाल की परिकल्पना भी नहीं की जा सकती है। चैत्र मास के साथ ही उत्तराखंड में इन मेलों की शुरुआत हो जाती है। यह मेले धार्मिक, संस्कृति और व्यापारिक महत्व वाले हैं। इन मेलों में शिरकत करने के लिए सिर्फ प्रदेशभर ही नहीं बल्कि देश और विदेश से भी लोग प्रतिभाग करने पहुंचते हैं। लेकिन संस्कृति के प्रसार के साथ इन मेलों का सबसे बड़ा योगदान लोगों का मिलन कराना भी है।

किसी जमाने में यह मेले ही मनोरंजन का साधन हुआ करते थे। जब आधुनिक समय की तरह सोशल मीडिया, फिल्म और मनोरंजन नहीं था। उस दौरान लोग इन्हीं मेलों के जरिए अपना मनोरंजन किया करते थे। मेलों की तैयारी कई महीनों से शुरू हो जाती थी। दूर.दूर से व्यापारी इन मेलों में अपनी दुकानें लगाने पहुंचते थे। जिससे यह साबित होता है कि व्यापार की दृष्टि से भी यह मेले शुरुआत से ही बहुत महत्वपूर्ण रहे हैं। दरअसल, त्योहार एवं उत्सव देवभूमि के संस्कारों रचे.बसे हैं। यह बहुत सफल व्यवसायिक मेला भी है। यहां व्यापार करने के लिए लोग नेपाल सहित कई राज्यों से पहुंचते हैं। इस मेले में कुत्ते पालने के शौकीन भी दूर.दूर से पहुंचते हैं और हज़ारों रुपये के कुत्तों का व्यापार भी होता है। यहां अलग.अलग वैरायटी के कुत्ते बेचने के लिए व्यापारी पहुंचते हैं जिनकी कीमत हज़ारों में होती हैण् कई व्यापारी तो ऐसे हैं जो दर्जनों वर्षों से यहां व्यापार करने आते हैं। पहाड़ की पहाड़ जैसी जीवन शैली में वर्षभर किसी न किसी बहाने आने वाले ये पर्व.त्योहार अपने साथ उल्लास एवं उमंगों का खजाना लेकर भी आते हैं। जब पहाड़ में आवागमन के लिए सड़कें नहीं थींए काम.काज से फुर्सत नहीं मिलती थीए तब यही पर्व.त्योहार जीवन में उल्लास का संचार करते थे।

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