डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
गुरु पूर्णिमा पूरे भारत में मनाया जाने वाला एक त्योहार है और इस शुभ अवसर पर भारत में उपहार भेजना एक आम रिवाज है। यह त्योहार मुख्य रूप से आध्यात्मिक या शैक्षणिक गुरुओं को समर्पित है, ताकि अपने गुरु के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त की जा सके। यह त्योहार पूरे भारत में मनाया जाता है। शिक्षक कोई भी हो सकता है। शायद आपके माता-पिता ही हों जो जीवन के हर पहलू में आपका मार्गदर्शन करते हैं। इसलिए, गुरु पूर्णिमा वह दिन है जब आप अपने ज्ञान और उसे प्राप्त करने में मदद करने वाले व्यक्ति के प्रति सम्मान और श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। इस वर्ष गुरु पूर्णिमा 29 जुलाई को मनाई जा रही है। इसी दिन जुलाई माह की पूर्णिमा भी पड़ती है, जिसे पश्चिमी देशों में परंपरागत रूप से “बक मून” कहा जाता है। दोनों नाम एक ही पूर्णिमा के हैं, लेकिन उनकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि अलग-अलग है। उत्तर अमेरिका में इस पूर्णिमा को उस समय से जोड़ा जाता है जब नर हिरणों के नए सींग विकसित होने लगते हैं, जबकि भारतीय परंपरा में यही दिन गुरु पूर्णिमा या आषाढ़ पूर्णिमा के रूप में ज्ञान, संस्कृति और गुरु-शिष्य परंपरा के महापर्व के रूप में मनाया जाता है। भारतीय पंचांग चंद्रमा की गति पर आधारित होने के कारण यह पर्व प्रत्येक वर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा को ही आता है।भारतीय संस्कृति में गुरु पूर्णिमा का विशेष संबंध महर्षि वेदव्यास से माना जाता है, जिन्हें वेदों के संकलनकर्ता, महाभारत के रचयिता तथा भारतीय ज्ञान परंपरा के महान आचार्य के रूप में सम्मानित किया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा प्रारंभ हुई। समय के साथ यह पर्व केवल आध्यात्मिक गुरुओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जीवन में मार्गदर्शन देने वाले प्रत्येक शिक्षक, आचार्य और प्रेरक व्यक्तित्व के सम्मान का अवसर बन गया। यह पर्व ज्ञान के प्रति विनम्रता, अनुशासन और गुरु के प्रति श्रद्धा का संदेश देता है।गुरु पूर्णिमा से जुड़े आध्यात्मिक विश्वासों की पुष्टि विज्ञान नहीं करता, लेकिन इस पर्व से जुड़ी अनेक परंपराओं के सकारात्मक प्रभावों को आधुनिक शोध अवश्य स्वीकार करते हैं। मनोविज्ञान और तंत्रिका विज्ञान से जुड़े अनेक अध्ययनों में यह पाया गया है कि कृतज्ञता व्यक्त करने की आदत मानसिक तनाव को कम करती है, भावनात्मक संतुलन को मजबूत बनाती है और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करती है। इसी प्रकार गुरु या मार्गदर्शक का साथ सीखने की क्षमता, आत्मविश्वास और निर्णय लेने की योग्यता को भी बेहतर बनाता है। ध्यान, आत्ममंथन और मौन चिंतन जैसी गतिविधियां मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी मानी जाती हैं, जो गुरु पूर्णिमा के प्रमुख अभ्यासों में शामिल हैं।आध्यात्मिक दृष्टि से पूर्णिमा का चंद्रमा पूर्ण ज्ञान, स्पष्टता और आत्मप्रकाश का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह साधना और आत्मबोध के लिए अत्यंत शुभ समय होता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पूर्णिमा वह अवस्था है जब पृथ्वी से देखने पर चंद्रमा का पूरा प्रकाशित भाग दिखाई देता है, क्योंकि सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक विशेष स्थिति में होते हैं। वर्षों से पूर्णिमा को मानव व्यवहार में बदलाव से जोड़ने वाली अनेक धारणाएं प्रचलित रही हैं, लेकिन वैज्ञानिक अध्ययनों में इसके समर्थन में कोई ठोस और लगातार मिलने वाला प्रमाण नहीं मिला है। इसलिए पूर्णिमा के आध्यात्मिक महत्व और वैज्ञानिक तथ्यों को अलग-अलग दृष्टिकोण से समझना आवश्यक है।तेजी से बदलती जीवनशैली, डिजिटल सूचना की अधिकता और सामाजिक चुनौतियों के बीच सही मार्गदर्शन का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। गुरु पूर्णिमा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उन व्यक्तियों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का अवसर है, जिन्होंने हमारे जीवन, शिक्षा, विचार और व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह पर्व हमें यह भी याद दिलाता है कि ज्ञान केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि अनुभव, संस्कार और सही मार्गदर्शन से भी प्राप्त होता है। आधुनिक जीवन में जब मानसिक तनाव और दिशा भ्रम बढ़ रहे हैं, तब गुरु पूर्णिमा आत्मचिंतन, कृतज्ञता और सकारात्मक जीवन मूल्यों को पुनः अपनाने की प्रेरणा देती है। गुरु पूर्णिमा एक पवित्र हिंदू त्योहार है जो गुरुओं (आध्यात्मिक शिक्षकों या मार्गदर्शकों) को सम्मान और धन्यवाद देने के लिए मनाया जाता है। ‘गुरु’ शब्द का अर्थ है “अंधकार को दूर करने वाला”। इस दिन, भक्त उन सभी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं जिन्होंने उन्हें आध्यात्मिक और सांसारिक दोनों प्रकार के ज्ञान से मार्गदर्शन दिया है। यह उन सभी के प्रति गहरा सम्मान व्यक्त करने का दिन है जो हमें सही मार्ग दिखाते हैं, जिनमें विद्यालय के शिक्षक, आध्यात्मिक गुरु और माता-पिता भी शामिल हैं। गुरु और शिष्य (शिक्षक और छात्र) के बंधन को प्रार्थनाओं, अनुष्ठानों और भक्ति के साथ याद किया जाता है और मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा व्रत कथा महर्षि वेद व्यास पर केंद्रित है, जिन्हें भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है और जिनका जन्म आषाढ़ महीने की पूर्णिमा के दिन हुआ था। उनका दिव्य मिशन आध्यात्मिक ज्ञान को व्यवस्थित करना और सत्य एवं धर्म के मार्ग पर विश्व का मार्गदर्शन करना था। वेद व्यास ने समझने में सहायता के लिए वेदों को चार भागों में विभाजित किया – ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद। उन्होंने महाभारत, 18 पुराण, ब्रह्म सूत्र और सनातन धर्म के अन्य प्रमुख ग्रंथों की रचना की। यह कथा गुरु के प्रति आदर के महत्व पर बल देती है, जो हमें ज्ञान और मोक्ष की ओर ले जाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन भगवान शिव और भगवान कृष्ण भी अपने गुरुओं का आदर करते हैं। भक्त उपवास रखते हैं और श्रद्धापूर्वक कथा सुनते हैं, जो हमें अपने आध्यात्मिक गुरुओं के प्रति विनम्र और कृतज्ञ रहने की याद दिलाती है। गुरुपूर्णिमा” भारतीय संस्कृति का वह पावन पर्व है, जो गुरु के प्रति श्रद्धा, समर्पण और कृतज्ञता का दिव्य उत्सव है। गुरु केवल ज्ञान देने वाले शिक्षक नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाले, अज्ञानता का अंधकार दूर कर आत्मबोध का प्रकाश जगाने वाले सद्गुरु होते हैं। गुरुपूर्णिमा अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाले गुरुओं के प्रति कृतज्ञता और सम्मान प्रकट करने का अत्यंत पवित्र दिन है।यह त्योहार महान ऋषि भगवान वेदव्यास के जन्मदिन के रूप में भी मनाया जाता है। सनातन संस्कृति में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान सर्वोच्च स्थान दिया गया है, क्योंकि वे शिष्य के निर्माण, पालन और अज्ञान के विनाश के जिम्मेदार होते हैं। सद्गुरु शिष्य के व्यक्तित्व का निर्माण कर उसे सत्य, धर्म और आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर करते हैं। गुरु शिष्य को केवल शिक्षा नहीं देते, बल्कि उसके भीतर छिपी दिव्यता को जाग्रत कर जीवन का वास्तविक उद्देश्य समझाते हैं। गुरु से प्राप्त संस्कार ही व्यक्ति को आत्मविश्वास, धैर्य, संयम और लोकमंगल की भावना से परिपूर्ण करते हैं। गुरु के उपदेशों को केवल सुनना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उन्हें जीवन में उतारना ही सच्ची गुरु-भक्ति है। गुरु का आशीर्वाद मनुष्य को आत्मोन्नति, आध्यात्मिक उन्नयन और मानवता की सेवा के पथ पर अग्रसर करता है। यही गुरु-परंपरा की अमर विरासत है, यही भारतीय संस्कृति का शाश्वत संदेश भी है। हैलेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











