
डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
गंगा-यमुना जैसी सदानीरा नदियों के उद्गम वाले उत्तराखंड में भी पेयजल संकट कम नहीं है।यद्यपि, जल संरक्षण के दृष्टिगत सरकार निरंतर प्रयास कर रही है और स्प्रिंग एंड रिवर रिज्युविनेशन अथारिटी (सारा) के माध्यम से प्राकृतिक स्रोतों और नदियों के पुनर्जीवन की दिशा में काम हो रहा है।अब गांवों व उनके आसपास स्थित जलसोतों, नौले-धारों के जीर्णोद्धार में पंचायतों की भागीदारी सुनिश्चत की जा रही है।इसी कड़ी में शासन ने राज्य की सभी 7,817 ग्राम पंचायतों के साथ ही 11,217 वन पंचायतों के क्षेत्रांतर्गत आने वाले जलस्रोतों की सूची मांगी इसके बाद प्रभावी कार्ययोजना तैयार कर पंचायतें जल स्रोतों के जीर्णोंद्धार में जुटेंगी।मध्य हिमालयी राज्य उत्तराखंड में पानी के संकट का उल्लेख पूर्व में नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में भी किया था। इसमें बताया गया था कि उत्तराखंड में लगभग 300 प्राकृतिक जलस्रोत व नदियां ऐसी हैं, जो या तो सूख चुकी हैं या फिर सूखने के कगार पर हैं। पहाड़ों में गर्मी बढ़ते ही कई जिलों के कई गांवों में पेयजल संकट गहराने लग गया है. इसके साथ ही प्राकृतिक जलस्रोतों के सूखने और जलस्तर घटने से ग्रामीणों को पानी के लिए भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. आज भी जिले के कई गांवों में लोग रोजाना कई किलोमीटर दूर जाकर पानी ढोने को मजबूर हैं.ग्रामीणों का कहना है कि, गर्मी बढ़ते ही परंपरागत नौले, धारे और प्राकृतिक स्रोत सूखने लगते हैं. जिससे पानी की किल्लत और अधिक बढ़ जाती है. कई स्थानों पर महिलाओं और बच्चों को घंटों मशक्कत कर पानी ढोना पड़ रहा है. हालांकि, जल निगम और जल संस्थान की ओर से टैंकरों के जरिए प्रभावित गांवों में पानी पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन बढ़ती आबादी और घटते जलस्रोतों के कारण समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है. ग्रामीणों ने प्रशासन से स्थायी समाधान निकालने और पेयजल योजनाओं को मजबूत करने की मांग की है. पहाड़ों की धरती में कभी हर गांव के पास गधेरा, नौला और धारा जीवन का आधार हुआ करते थे। अब पहाड़ पर पानी ही सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। यह संकट अचानक ही पैदा नहीं हुआ बल्कि वर्षों की अनदेखी का नतीजा है।हालत यह है कि राज्य की 1737 बस्तियां ऐसी हैं, जहां हर व्यक्ति को रोजाना न्यूनतम मानक का 55 लीटर स्वच्छ पानी भी नसीब नहीं हो पा रहा है। उत्तराखंड में पेयजल आपूर्ति को लेकर पूर्व में जारी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट बताती है कि पहाड़ों पर पेयजल को लेकर पिछले कई सालों में लगातार कमजोर योजना व निगरानी की कमी से पेयजल संकट बढ़ा है। पारंपरिक जल स्रोतों का सूखना इस संकट की सबसे बड़ी वजह है। जिन स्रोतों पर पीढ़ियों से गांव निर्भर थे, वे अब या तो बरसात के बाद थोड़े समय के लिए सक्रिय रहते हैं या पूरी तरह खत्म हो चुके हैं। ग्रामीणों के अनुसार पानी के लिए टैंकर या दूरस्थ जलस्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है। संकट केवल पानी का नहीं है, उसकी गुणवत्ता भी चिंता का विषय है। अल्मोड़ा और बागेश्वर के कुछ गांवों में दूषित पानी चुनौती बना हुआ हैपर्यटन ने पहाड़ी गांवों की परेशानी और बढ़ा दी है। चकराता, औली, चोपता और कौसानी जैसे इलाकों में पर्यटकों की बढ़ती संख्या से पानी की मांग कई गुना बढ़ जाती है, जबकि स्थानीय आबादी के लिए पहले से ही पानी सीमित रहता है। राज्य के मैदानी जिलों से लेकर पर्वतीय क्षेत्रों तक पेयजल की समस्या लगातार गहराती जा रही है. हालात ऐसे हैं कि कई इलाकों में लोगों को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी पानी जुटाने में भारी मशक्कत करनी पड़ रही है. गर्मी का मौसम शुरू होते ही यह संकट और भयावह रूप ले लेता है. प्राकृतिक जल स्रोत सूखने लगते हैं, नदियों और धारों में पानी घट जाता है और लोगों की निर्भरता पूरी तरह भूजल पर बढ़ जाती है. लगातार बढ़ते भूजल दोहन, अनियोजित शहरीकरण, बारिश के बदलते पैटर्न और जल संरक्षण की कमी ने राज्य को ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया है, जहां आने वाले समय में हालात और गंभीर हो सकते हैं. प्रदेश में जल संकट की स्थिति कितनी व्यापक हो चुकी है, इसका अंदाजा सरकारी आंकड़ों से लगाया जा सकता है ताजा आंकड़ों के मुताबिक, पूरे राज्य में करीब 1060 ऐसे रिहायशी क्षेत्र चिन्हित किए गए हैं, जहां पेयजल की गंभीर समस्या बनी हुई है. इनमें 691 ग्रामीण क्षेत्र और 369 शहरी कॉलोनियां शामिल हैं. गढ़वाल मंडल में 543 और कुमाऊं मंडल में 517 क्षेत्र जल संकट से प्रभावित बताए गए हैं. जिलावार स्थिति देखें तो सबसे अधिक खराब हालात नैनीताल जिले के हैं. यहां 256 स्थान ऐसे हैं, जहां लोगों को पर्याप्त पेयजल उपलब्ध नहीं हो पा रहा. इसके बाद देहरादून जिले में 191 इलाके जल संकट से प्रभावित हैं. पौड़ी जिले में 144, पिथौरागढ़ में 97, टिहरी में 75, अल्मोड़ा में 72, रुद्रप्रयाग में 64, चंपावत में 36, चमोली में 31, बागेश्वर में 30, उत्तरकाशी में 29 और उधम सिंह नगर में 26 क्षेत्रों में पानी की गंभीर समस्या दर्ज की गई है. गर्मी के मौसम में जब पानी की मांग कई गुना बढ़ जाती है, तब जल संस्थान विभाग पर पेयजल आपूर्ति का दबाव भी तेजी से बढ़ता है. राज्य सरकार और जल संस्थान की ओर से टैंकरों के जरिए पानी पहुंचाने की व्यवस्था की जाती है, लेकिन यह व्यवस्था पर्याप्त नहीं मानी जा रही. उत्तराखंड जल संस्थान के पास कुल 86 पानी के टैंकर हैं, जबकि जरूरत इससे कहीं ज्यादा है. ऐसे में कई स्थानों पर निजी टैंकरों की मदद भी लेनी पड़ती है. दरअसल, उत्तराखंड में पानी का संकट केवल सतही जल स्रोतों तक सीमित नहीं है, बल्कि भूजल स्तर में लगातार गिरावट भी एक बड़ी चिंता बन चुकी है. पिछले कई वर्षों से राज्य में भूजल का अंधाधुंध दोहन जारी है. शहरों और कस्बों में तेजी से बढ़ती आबादी, होटल-रिजॉर्ट, व्यावसायिक प्रतिष्ठान और निर्माण कार्यों के लिए लगातार नए बोरवेल और ट्यूबवेल खोदे जा रहे हैं. देश में करीब 70 प्रतिशत पेयजल जरूरतें भूजल से पूरी होती हैं. कई राज्यों में भूजल का स्तर तेजी से गिर रहा है और कई इलाके अति दोहन श्रेणी में पहुंच चुके हैं. उत्तराखंड भी अब इसी खतरे की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है. यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड के कई क्षेत्रों में पानी का संकट विकराल रूप ले सकता है. इसके लिए केवल सरकारी योजनाएं ही पर्याप्त नहीं होंगी, बल्कि जनभागीदारी भी बेहद जरूरी है. लोगों को पानी के संरक्षण के प्रति जागरूक करना होगा. वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बनाना होगा. अवैध बोरवेल पर सख्त कार्रवाई करनी होगी और पारंपरिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करना होगा. इसके साथ ही शहरों के विकास की योजनाओं में जल उपलब्धता को सबसे महत्वपूर्ण आधार बनाना होगा. यदि विकास और निर्माण कार्यों को बिना जल प्रबंधन के जारी रखा गया तो भविष्य में संकट और गंभीर हो सकता है.उत्तराखंड जैसे संवेदनशील हिमालयी राज्य के लिए पानी केवल संसाधन नहीं बल्कि जीवन का आधार है. ऐसे में जल संरक्षण को केवल सरकारी योजना नहीं बल्कि सामाजिक आंदोलन बनाने की जरूरत है. क्योंकि यदि आज पानी नहीं बचाया गया आने वाली पीढ़ियों के सामने सबसे बड़ा संकट पानी का ही होगा.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











