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खेती के लिए जंगली जानवर कितनी बड़ी मुसीबत बन गए हैं

29/12/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
कोदा-झंगोरा खाएंगे, उत्तराखंड बनाएंगे’, उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान बच्चे से लेकर बूढ़ों तक की जुबां पर यह नारा आम था। लेकिन, राज्य गठन के 25 वर्षों बाद प्रदेश में कोदा-झंगोरा मिलना किस कदर मुश्किल हो चला है,उत्तराखंड में किसानों के लिए ना तो खेती सुरक्षित रह गई है और ना ही घर, नतीजतन किसानों का रुझान किसानी से हटकर दूसरे कामों की तरफ बढ़ने लगा है. जाहिर है कि ये हालात किसानों के पलायन की वजह भी बनते रहे हैं. साल 2025 में भी सरकार के दावे और तमाम योजनाएं किसानों के काम नहीं आई. आंकड़े भी इस बात की तस्दीक करते हैं कि प्रदेश में जंगली जानवरों से खेती को होने वाले नुकसान में कोई राहत नहीं मिली. पिछले तीन साल तो इस लिहाज से बेहद चिंताजनक रहे हैं. साल 2025 भी इन परेशानियों को बढ़ाने वाला ही रहा है. खेती के लिए जंगली जानवर कितनी बड़ी मुसीबत बन गए हैं, इस बात को पलायन आयोग की रिपोर्ट से समझा जा सकता है. आयोग ने प्रदेश के तमाम जिलों से पलायन के पिछले विभिन्न कारणों के साथ जंगली जानवरों को भी बड़ी वजह बताया है. इसका कारण यह है कि यह जंगली जानवर न केवल पर्वतीय क्षेत्रों में खौफ की वजह बन गए हैं बल्कि खेती के लिए भी बड़ी मुसीबत बन चुके हैं. शायद यही कारण है कि आयोग भी इस बात को मानता है कि किसानों के पलायन के पीछे जंगली जानवर बड़ी वजह है. जंगली जानवरों द्वारा फसल को नुकसान की रिपोर्ट राज्य के सभी जिलों से मिलती है. देहरादून, हरिद्वार और उधम सिंह नगर जिले में भी ऐसी शिकायतें रिपोर्ट होती हैं, लेकिन, सबसे ज्यादा चिंताजनक हालत पर्वतीय जनपदों के हैं. इनमें पौड़ी, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, चमोली समेत कुमाऊं के पिथौरागढ़, चंपावत, बागेश्वर और अल्मोड़ा जिला शामिल हैआंकड़ों के लिहाज से इन स्थितियों को देखें तो फसल क्षति के सरकारी आंकड़े भी गंभीर हालातों को बयां कर देते हैं. इस साल अब तक उत्तराखंड में 172 हेक्टर खेती को जंगली जानवर नुकसान पहुंचा चुके हैं. पूरे प्रदेश से करीब 600 मामले फसल क्षति के सरकार रिकॉर्ड में दर्ज हो चुके हैं. जाहिर है कि साल 2025 किसानो की खेती के लिए मुसीबत भरा रहा है. फसल क्षति का यह आंकड़ा केवल जंगली जानवरों से नुकसान का है. इसके अलावा किसानों को इस बार मौसमी मार भी काफी ज्यादा झेलनी पड़ी है. सरकारी रिकॉर्ड को बाकी सालों से तुलनात्मक रूप से भी देखे तो साल 2022 में 129.89 हेक्टेयर खेती को जंगली जानवरों ने नुकसान पहुंचायाय साल 2023 में 356.37 हेक्टर क्षेत्र में मौजूद फसल को जंगली जानवरों ने खराब कर दिया. साल 2024 में 486.64 हेक्टर खेती जंगली जानवरों के कारण खराब हो गई. इस तरह आंकड़े भी इस बात को जाहिर करते हैं कि प्रदेश में जंगली जानवरों के कारण लगातार किसानों को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है. तमाम योजनाएं और सरकारी दावे भी किसानों के काम नहीं आ रहे हैं.कृषि कहते हैं कि सरकार किसानों के लिए तमाम योजनाएं बना रही हैं. भारत सरकार भी राज्य को किसानों से जुड़ी योजनाओं में मदद कर रही है. राज्य में वन्य-जानवरों से फसल नुकसान की समस्या को देखते हुए, 2025 में एक प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया है. इसमें घेरबाड़ योजना को राष्ट्रीय कृषि विकास योजनाओं में शामिल करने का प्रयास है. इसके लिए ₹200 करोड़ के बजट की मांग की गई है. राज्यों को प्रभावित जिलों की पहचान करनी है. किसानों को 72 घंटे में क्षति की सूचना देनी होगी. फिर भी खास तौर पर पर्वतीय जनपदों में विभिन्न सरकारी योजनाओं का किसानों तक भरपूर लाभ नहीं पहुंच रहा. ऐसा इसलिए क्योंकि किसानों को जितना नुकसान हो रहा है उसके हिसाब से बीमा की रकम उन्हें नहीं मिल पाती है.वैसे तो जंगली सूअर, बंदर या लंगूर फसलों को नुकसान पहुंचाने के रूप में ही चर्चाओं में रहते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि यह वन्य जीव इंसानों को शारीरिक रूप से भी खासी क्षति पहुंचा रहे हैं. किसानों को आर्थिक क्षति के लिए भी प्रदेश में मुख्य रूप से यही वन्य जीव जिम्मेदार माने गए हैं. उधर खेतों या रिहायशी क्षेत्रों के पास पहुंचकर लोगों को भी घायल कर रहे हैं. आंकड़े के रूप में इस स्थिति को देख तो प्रदेश में साल 2025 के दौरान जंगली सूअर 18 लोगों को घायल कर चुके हैं. इसी साल लंगूर और बंदर 102 लोगों पर हमला कर उन्हें अस्पताल पहुंचा चुके हैं. वहीं राज्य स्थापना के बाद से अब तक की स्थिति को देखें तो जंगली सूअर 30 लोगों की जान ले चुके हैं. अबतक 663 लोगों पर हमला कर उन्हें घायल भी कर चुके हैं. बंदर और लंगूर ने अबतक 211 लोगों को घायल किया है.इस तरह फसलों को नुकसान पहुंचाने के साथ यह वन्यजीव किसानों और दूसरे लोगों को भी शारीरिक रूप से नुकसान पहुंचा रहे हैं. इस मामले में वन मंत्री कहते हैं कि वन विभाग लोगों को राहत देने के लिए इस साल कई निर्णय ले चुका है. इसमें एक तरफ बंदर को वन्य जीव की श्रेणी से बाहर किया गया है. वहीं, जंगली सूअर को मारने की अनुमति में भी शिथिलता दी गई है. अब वन दारोगा स्तर से भी जंगली सूअर को मारने की अनुमति दी जा रही है. एक तरफ पर्वतीय जनपदों में कई जंगली जानकर मुसीबत बने हैं तो मैदानी क्षेत्र खासकर हरिद्वार में हाथी का आतंक है. यहां हाथी खेतों को तबाह कर रहा है. कई बार आपसी संघर्ष भी देखने को मिलता है. जिसमें कई बार हाथी भी इसका शिकार हो जाते हैं. पिछले दिनों हरिद्वार में एक के बाद एक कई हाथियों की मौत में कुछ मामले ऐसे ही रिकॉर्ड किए गए. दरअसल, हाथियों की मौजूदगी को देखते हुए खेतों में सुरक्षा के लिहाज से करंट वाले तार लगाए जाते हैं. जिसमें हाथी अपनी जान गंवा देते हैं. राज्य में अब तक करीब 52 हाथी बिजली का करंट लगने से मारे गए हैं. अकेले 2025 में ही करीब 3 से ज्यादा हाथियों की करंट लगने से मौत की जानकारी सामने आई है. कुल मिलाकर साल 2025 के आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि अगर खेती को बचाने के लिए बड़े और ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो उत्तराखंड में कृषि का भविष्य और भी संकट में पड़ सकता है. किसानों को प्रोत्साहन, सुरक्षा और सुविधाएं देने के साथ-साथ कृषि भूमि को बचाना आज सबसे बड़ी जरूरत बन चुकी है.लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं।लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।

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