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हिमालय की चोटी पर विराजित मां पूर्णागिरि

20/10/20
in उत्तराखंड, चम्पावत
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
पूर्णागिरि मंदिर उत्तराखण्ड राज्य के चम्पावत नगर में काली नदी के दांये किनारे पर स्थित है । चीन, नेपाल और तिब्बत की सीमाओं से घिरे सामरिक दृष्टि से अति महत्त्वपूर्ण चम्पावत ज़िले के प्रवेश द्वार टनकपुर से 19 किलोमीटर दूर स्थित यह शक्तिपीठ माँ भगवती की 108 सिद्धपीठों में से एक है। उत्तराखण्ड जनपद चम्पावत के टनकपुर के पर्वतीय अंचल में स्थित अन्नपूर्णा चोटी के शिखर में लगभग 3000 फीट की उंचाई पर यह शक्तिपीठ स्थापित है।
महाभारत काल में प्राचीन ब्रह्मकुंड के निकट पांडवों द्वारा देवी भगवती की आराधना तथा बह्मदेव मंडी में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा द्वारा आयोजित विशाल यज्ञ में एकत्रित अपार सोने से यहां सोने का पर्वत बन गया। सन् 1632 में कुमाऊं के राजा ज्ञान चंद के दरबार में गुजरात से पहुंचे श्रीचन्द्र तिवारी को इस देवी स्थल की महिमा स्वप्न में देखने पर उन्होंने यहा मूर्ति स्थापित कर इसे संस्थागत रूप दिया।
लॉकडाउन में छूट मिलने के बाद आज मां पूर्णागिरि के कपाट खुले और विधि विधान से पूजा पाठ शुरू हुआ। केंद्र सरकार द्वारा देश भर में आज से मंदिरों के कपाट खोलने के आदेश के बाद चम्पावत जिले के माँ पूर्णागिरि धाम में भी मंदिर को आमजनता के दर्शनार्थ खोल दिया गया है। हालांकि कोविड.19 के मद्देनजर नियमों का पालन हो रहा है। खासतौर पर सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखा जा रहा है।मां पूर्णागिरि धाम में शारदीय नवरात्र से उत्तराखंड के बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं को भी दर्शन के लिए आने की अनुमति दी गई है, लेकिन प्रशासन ने तय किया है कि उत्तराखंड में प्रवेश से पहले श्रद्धालुओं को ऑनलाइन पोर्टल पर पंजीकरण कराना होगा। इस बीच, अनलॉक घोषित होने के बाद सरकार ने ई पास पोर्टल बंद कर इसकी जगह उत्तराखंड आने वाले यात्रियों के पंजीकरण के लिए देहरादून स्मार्ट सिटी वेबसाइट शुरू की है। मंगलवार को यह वेबसाइट भी ठप थी, जिस कारण यूपी के विभिन्न क्षेत्रों से आए श्रद्धालुओं को जिले की सीमा जगबुड़ा पुल से लौटने को मजबूर होना पड़ा।
एसडीएम हिमांशु कफल्टिया ने बताया कि बाहरी राज्यों से उत्तराखंड आने वालों के लिए सरकार ने पंजीकरण के लिए देहरादून स्मार्ट सिटी लिण् नाम से ऑनलाइन वेबसाइट शुरू की है। यात्री इस वेबसाइट पर पंजीकरण कराने के बाद उत्तराखंड में प्रवेश कर सकते हैं। रोज पहुंच रहे पांच सौ से अधिक श्रद्धालु शारदीय नवरात्र के पहले से ही मां पूर्णागिरि धाम में श्रद्धालुओं की आवाजाही का क्रम शुरू हो गया है। इन दिनों रोज पांच सौ से ज्यादा श्रद्धालु देवी मां के दर्शन को पहुंच रहे हैं। मंदिर समिति अध्यक्ष पंण् भुवन चंद्र पांडेय का कहना है कि देवी मां के दर्शन को आने वाले श्रद्धालुओं को कोरोना संक्रमण से बचाव के प्रति जागरूक किया जा रहा है। इसके लिए समिति ने भैरव मंदिर से मुख्य मंदिर तक स्वयंसेवक तैनात किए हैं।
सीमा पर हो पंजीकरण की सुविधा टनकपुर। मां पूर्णागिरि मंदिर समिति उपाध्यक्ष ने मां पूर्णागिरि धाम के दर्शन को आने वाले श्रद्धालुओं के लिए राज्य अथवा जिले की सीमा पर ऑनलाइन पंजीकरण केंद्र खोले जाने की मांग है। उनका कहना है कि उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालुओं को सीमा पर पंजीकरण की सुविधा मिलने से सहूलियत होगी। उत्तर भारत के प्रमुख धार्मिक स्थल मां पूर्णागिरि धाम का दर्शन करने के बाद श्रद्धालु टनकपुर से सटे नेपाल के झिलमिल झील के प्राकृतिक सौंदर्य का लुत्फ उठाने जरूर पहुंचते हैं।
मान्यता है कि यह झील दिन भर में सात बार रंग बदलती है। टनकपुर से सटी नेपाल की ब्रहमदेव मंडी से करीब आठ किमी दूूर स्थित 6800 वर्ग मीटर में फैली सिद्देश्वर झिलमिल ताल झील का गहरा धार्मिक महत्व है। मंदिर के पुजारियों का मानना है कि मां पूर्णागिरि इसी पावन झील में स्नान किया करती थी। झील के किनारे मां झिलमिल का मंदिर बना है, जहां पूजा.अर्चना करने से हर मन्नत पूरी होती है। कुछ लोग इस झील को पांडवों की उत्पत्ति भी मानते हैं। कहा जाता है कि पांडवों ने यहां विश्राम के दौरान प्यास बुझाने को इस झील की उत्पत्ति की थी। एेसा माना जाता है कि झील के ऊपर की पहाड़ी में भीम ने बड़े से पत्थर में घुटना मारकर पानी निकाला था। यह पत्थर आज भी वहां मौजूद है। झील में पत्थर चट्टा प्रजाति की मछलियां खासी तादात में हैं। इनको मारने पर पूरी तरह से प्रतिबंध है, यह भी मान्यता है कि झील में मौजूद मछलियों का आकार एक समान रहता है। झील में स्नान करना पूर्णरूप से प्रतिबंधित है। यहां के कारोबारियों में कई हिंदुस्तानी भी हैं। उत्तराखंड के सीमावर्ती इलाकों से नेपाल का रोटी और बेटी का नाता है। महेंद्र नगर में राशन भारत से दोगुने दामों पर मिलता है। जिसके चलते यहां के ग्रामीण इलाकों के लोग राशन खरीदने बनबसा आते हैं और साइकिल आदि के जरिए राशन व जरूरत के अन्य सामान ले जाते हैं। भारत नेपाल सीमा पर दोनों देशों के नागरिकों को आवागमन और सामान लाने और ले जाने की खुली छूट हैद्य लेकिन किसी अन्य देश के नागरिक को इसकी इजाजत नहीं है।
एक तरफ जहां ग्वालियर के सिंधिया राजघराने के परिवार के ताल्लुक नेपाल के शाही परिवार से हैं, वहीं दूसरी ओर भारत और नेपाल के सीमावर्ती गांव के परिवारों के बीच भी रिश्तेदारी है। भारत की कई बेटियां नेपाल में बहू बनकर गई हैं और नेपाल की कई बेटिया की डोली भारत में आई है। रिश्तेदारी का यह सफर बरसों पुराना है। यही वजह है कि सीमावर्ती इलाकों के लोगों के लिए दोनों देशों में कोई फर्क नहीं। इस तरह, धार्मिक भाव से की गई यात्राएं सांस्कृतिक आदान.प्रदान का माध्यम बन जाती हैं। स्वयं से आत्म.साक्षात्कार की यात्रा, खुद से ही खुद के मिलने की यात्रा परोक्ष रूप से दूसरे कितने ही अपरिचितों से मिलवा जाती हैं। साथ चलते सहयात्री, एक साथ शीश नवाते श्रद्धालु, पगडंडी पर किसी के फिसलते तन को संभालते दूसरे यात्री कैसे एक ही यात्रा में अलग.अलग होते हुए भी एक होते हैं। इस मायने में तीर्थयात्राएं हमें बड़ा बनाती हैं, अपनी लघुता को भुलाने के लिए प्रेरित करती हैं। शायद तभी लंबी, कष्टकारी यात्राओं से लौटने पर हम वैसे ही नहीं रह जाते, जैसे गए थे।
कोरोना के कारण इसके प्रदेश में इसको लेकर न होने के कारण इसका दीदार नहीं हो पा रहा हैण् देश भर में विख्यात मां पूर्णागिरि माता के मंदिर में भक्त आगामी 17 अक्टूबर से शारदीय नवरात्र में माता के दर्शन कर पाएंगे लेकिन कोविड.19 के चलते सीमित संख्या में ही श्रद्धालुओं को दर्शन करने दिया है।

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