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उत्तराखंड के अलग ही रंग है होली का

11/03/25
in उत्तराखंड, देहरादून, संस्कृति
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखण्ड के अनेक पर्व व त्यौहारों ने स्थानीय गीत, नृत्य, गायन और संगीत को जन्म देकर यहां की सांस्कृतिक परम्परा को समृद्ध करने का कार्य किया है. यहां के पर्व त्यौहारों में धर्म, आस्था और संस्कृति का अद्भुत संगम तो दिखायी ही देता है साथ ही साथ इनमें सामूहिक सहभागिता, लोक जीवन की सुखद कामना और प्रकृति के साहचर्य में रहते हुए उसके प्रति संरक्षण की भावना भी परोक्ष तौर पर परिलक्षित होती है.हिमालय की गोद में बसा कुमाऊँ अंचल अपने नैसर्गिक सौंदर्य के अलावा सुदीर्घ और समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा के लिए भी विख्यात है। यहाँ मनाए जाने वाले अनेक लोक उत्सवों की तरह कुमाऊँनी होली का भी एक अलग अंदाज है। यहाँ की होली का अपना रंग है।अपनी विशिष्ट पहचान है। कुमाऊँनी होली तन को ही नहीं रंगती ,मन को भी उमंग से लबालब भर देती है। कुमाऊँ की होली में आंचलिक विशिष्टता है। अनूठा सौंदर्य बोध है। यहाँ की होली में रंग ,राग और रागनियों का अदभुत समागम है। ऋतुराज बसंत को यौवन का सूचक माना जाता है। बसंत ऋतु के आते ही समूची प्रकृति का यौवन एकाएक खिल उठता है। प्रकृति रंग -बिरंगी हो जाती है। विशिष्ट सुगंध और रंग लिए फूल खिलने लगते हैं। देश के अलग -अलग हिस्सों में लोग अपने -अपने अंदाज में बसंतोत्सव के रंग के आगोश में डूब जाते हैं। भारत के कोने -कोने में राग -रंग के उत्सव होली की धूम मच जाती है। होली भारत के प्राचीनतम त्यौहारों में शामिल है। लिहाजा होली पूरे भारत में मनाई जाती है।भारत के अलग -अलग हिस्सों में होली मनाने का अंदाज जुदा है। स्थानीय इतिहास ,मान्यता और परंपराओं के मुताबिक समय और क्षेत्र के अनुसार होली का स्वरूप बदल जाता है। होली की इस विविधता को कुमाऊँ अंचल में बेहतर तरीके से समझा और महसूस किया जा सकता है।भारत के दूसरे क्षेत्रों की बनिस्बत कुमाऊँ की होली का रंग कुछ अनोखा है। यहाँ होली महज एक दिन का पर्व नहीं बल्कि महीनों चलने वाला सांस्कृतिक लोक उत्सव है।पहाड़ के कई इलाकों में पूस के पहले इतवार से रामनवमी तक होली की बैठकें जमती हैं। कुमाऊँ की होली के मायने हुड़दंग नहीं है। बल्कि राग -रागनियों की सामूहिक अभिव्यक्ति है। परालौकिक विश्वास है। स्थानीय परंपराओं,मान्यताओं और मिथकों का समावेश है। सरलता ,उन्मुक्तता और आत्मीयता है।रंगों के जरिये अपनी सांस्कृतिक जड़ों से रिश्ता कायम रखने की कोशिश है। लोक – मानस में निहित आस्था की अभिव्यक्ति है। कुमाऊँ की होली में प्रत्येक कालखण्ड के सामाजिक इतिहास,परंपरा ,धर्म और संस्कृति के गहरे रंग दिखाई देते हैं। कुमाऊँ की होली के गीतों में यथार्थ और कल्पना का अनोखा मिश्रण है। यहाँ के होली गीतों में भक्ति ,रस ,कला ,माधुर्य ,आमोद -प्रमोद और हँसी – ठिठोली का अदभुत समावेश है। देवताओं से जुड़े ज्यादातर होली गीतों की विषय – वस्तु पौराणिक आख्यान से जुडी है। रामायण और महाभारत के अनेक प्रसंग भी होली गीतों की विषय – वस्तु बने हैं। गणेश ,शिव ,पार्वती की प्रार्थना ,राधा -कृष्ण और राम -सीता द्वारा खेले जाने वाले रंग का वर्णन है। परदेस गए पति की प्रतीक्षा करती नवयौवना की भावनाएं हैं। देवर – भाभी के बीच की हँसी -ठिठोली है।कुमाऊँनी होली में ब्रज और उर्दू का गहरा प्रभाव है।विशुद्ध स्थानीय भाषा -बोली में होली के गीत बहुत कम हैं। बावजूद इसके यहाँ की होली के गीतों में आंचलिक और सांस्कृतिक विशिष्टता साफ झलकती है। देश के दूसरे हिस्सों में प्रचलित होलियों से मिलते – जुलते हुए भी कुमाऊँनी होली कई मायनों में अलहदा है। भारत के दूसरे हिस्सों में होली राग – रंग और उल्लास का पर्व है। पर कुमाऊँनी होली में राग – रंग ,उल्लास के साथ गीत ,संगीत और नृत्य पक्ष भी जुड़ा है। होली के पदों की सामूहिक अभिव्यक्ति ,नृत्य और संगीत कुमाऊँ की होली को देश के दूसरे हिस्से की होलियों से अलग करती है। कुमाऊँ में होली के तीन रूप प्रचलित हैं। बैठकी होली ,खड़ी होली और महिलाओं की होली।यहाँ पूस के महीने के पहले इतवार से बैठकी होली शुरू हो जाती है। कुमाऊँनी बैठकी होली में ताल और रागों का गहरा ताल्लुक है। बैठकी होली में पूस के पहले रविवार से बसंत पंचमी तक भक्ति परख होलियां गाई जाती हैं। इन्हें ‘निर्वाण’ की होली कहा जाता है। निर्वाण की होली गायन की शुरुआत आमतौर पर मन्दिरों के प्रांगण से होती है। सबसे पहले गणेश जी की स्तुति होती है -“तुम सिद्धि करो महाराज होली के दिन में। सिद्धि के दाता ,बिघन बिनासन ,हमरी राखो लाज ,होलिन के दिनन में।” इसके बाद शिव ,राम ,कृष्ण और दूसरे देवी -देवताओं की स्तुति की जाती है। होली के गीतों में देवताओं की दार्शनिकता और रहस्यात्मकता का वर्णन अधिक होता है। निर्वाण की होलियों में आध्यात्मिकता और धार्मिक भावों की प्रधानता होती है।कुमाऊँनी बैठकी होली का भी अपना अनूठा अंदाज है। यह शास्त्रीय आधार के रागों को गाने की एक पारंपरिक शैली है। बैठकी होली में हारमोनियम ,तबला ,ढोलकी ,मजीरा और दूसरे वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल होता है। इस होली की खासियत यह है कि इसमें शास्त्रीय गायन की अनुशासनात्मकता होती है। बैठकी होली में कुछ विशिष्ट और रसिक लोग ही हिस्सा लेते हैं। राग – रागनियों पर आधारित होने बावजूद बैठकी होली का अंदाज प्रकारांतर में सामूहिक गायन जैसा ही होता है। बैठकी होली में राग की शुद्धता से ज्यादा भावाभिव्यक्ति और जन -रंजनता को वरीयता दी जाती है। खास बात यह है कि बैठकी होलियों को गाने वाले ज्यादातर लोग शास्त्रीय संगीत के जानकार नहीं होते हैं। शास्त्रीय संगीत की बुनियादी जानकारी नहीं रखने वाले लोग भी राग – रागनियों पर आधारित होली गाते हैं। होली गायन की यह शैली श्रवण परंपरा से पीढ़ी -दर- पीढ़ी चलती आ रही है। बैठकी होलियां राग – रागनियों के आधार पर चार -अलग अलग समयचक्रों में विभाजित है। जैसे रात्रि के प्रथम पहर में कल्याण ,यमन -कल्याण ,श्याम -कल्याण ,केदार ,हमीर ,विहाग और रात्रि के दूसरे पहर में देश ,विहाग ,काफ़ी ,जंगला काफी ,तिलंग,खम्माज ,झिझोटी ,बागेश्री ,शहना बगैरह रागों का गायन किया जाता है। तीसरे पहर राग- सहाना ,बहार जैजैवन्ती ,कान्हड़ा ,परज और रात्रि के चौथे पहर सुबह के वक्त परज ,जोगिया ,सोहनी और भैरवी गाई जाती है। दोहपर में राग – पहाड़ी ,सुहा और दिन के तीसरे पहर में राग पीलू और भीम पलासी गाए जाते हैं। निर्वाण की होलियों की विषय -वस्तु आमतौर पर देवी – देवताओं से ही जुडी होती है :-“भलो – भलो जनम लियो स्याम -राधिका ,भलो जनम लियो मथुरा में…….. । ” या “तुम तो भई तपवान कालिका ,कलयुग में अवतार लियो……..।”या फिर “सीता बन में अकेले कैसे रही। तुम कैसे रही दिन -रात सीता,बन में अकेले कैसे रही……..।” कुमाऊँ के अनेक क्षेत्रों में रामनवमी तक होलियां गाई जाती हैं। काली कुमाऊँ और सोर घाटी में रामनवमी तक निर्वाण की होलियां गाए जाने की परंपरा है।बसंत पंचमी से होली का रंग कुछ गाढ़ा हो जाता है। इसके बाद होली के गीतों में सौंदर्य के साथ विरह ,वेदना ,भावुकता और आकुलता भी झलकने लगती है। होली के ज्यादातर गीत सामाजिक यथार्थ को व्यक्त करते हैं । “आयो री फागुन मास ,पिया बिन हूँ मैं अकेली।” परदेस गए प्रियतम की राह देखते थक चुकी प्रेयसी का सब्र जबाब देने लगता है :- “चल ठाडि जो हेरो बाट मेरो पिया निरमोइयो कदि आवे”? (मैं खड़ी -खड़ी देखा करती हूँ राह ,जाने कब आवें मेरे निर्मोही प्रियतम)। जिनके प्रियतम घर में हैं ,उनको कहा जाता है -“जाओ बलम जहाँ रैन बिताई। ना मोसे बोलो ,ना घुंघरूं खोलो , ना छुवो नरम कलाई। शिवरात्रि से खड़ी होली शुरू हो जाती है। खड़ी होली का ग्रामीण इलाकों में ज्यादा प्रचलन है। इसमें आम लोगों की भागीदारी होती है। यह ढोलक ,नगाड़े और मंजीरे की लय पर सामूहिक रूप से गाए जाने वाली होली है।खड़ी होली का स्वरूप नृत्यात्मक होता है। इसी वजह से इसे खड़ी होली कहा जाता है। गोल घेरे में खास पद संचालन करते हुए सामूहिक होली गायन को खड़ी होली कहते हैं। शिवरात्रि को खड़ी होली का शुभारंभ शिव जी की होली से होता है। “जटन विराजत गंग,भोले नाथ दिगम्बर। शिव के जटन से निकसी गंगा ,जा सागर में समाई।”या फिर “तू भज ले भवानी शंकर को। भाल तिलक सिर गंग विराजे ,बास कियो गिरी हिमकर को।” बाद के दिनों में दूसरे देवी – देवताओं की स्तुति में होलियां गाई जाती हैं। “दसरथ को लछिमन बाल -जती ,बार बरस सीता संग रहिए ,पाप न लागो एक रती। ”सुर ,ताल ,लय ,नृत्य और भाषा – बोली के लिहाज से कुमाऊँ की खड़ी होली देश के अन्य हिस्सों में प्रचलित होलियों से कतई जुदा है। सामूहिक गायन शैली के चलते खड़ी होली में सुर ,ताल ,लय और नृत्य सभी में एक विशेष प्रकार की सादगी होती है। अधिकांश खड़ी होलियों में संगीत के स्तर पर अंतरा नहीं होता। खड़ी होली “हाँ” लय से प्रारंभ होती है और धीरे – धीरे तेज होती चली जाती है। इसमें नृत्य भी हाथों की भावपूर्ण भंगिमा ,सहज पद संचालन और शरीर की लचक तथा झौंक तक सीमित होता है। रंग पड़ने के साथ ही चीर बंध जाती है। “को ए उ बांधनि चीर रघुनन्दन राजा?को ए उ खेलनि फ़ाग रघुनन्दन राजा?” कुमाऊँ की होली में राग -रंग के साथ इस अंचल के धार्मिक ,सामाजिक ,सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन के विविध पक्ष जीवंत रूप से जुड़े हैं। हिमालय और पर्यावरण यहाँ के धार्मिक,सामाजिक और सांस्कृतिक का अभिन्न अंग है।दूसरे लोक उत्सवों की ही तरह कुमाऊँ होली भी युगीन चेतना और सामाजिक सरोकारों से अभिन्न रूप से जुडी है।कुमाऊँनी होली के गीत समकालीन धार्मिक एवं सामाजिक परिस्थितियों का भी बखूबी चित्रण करते हैं। इन गीतों में विशिष्ट भौगोलिक और प्राकृतिक विशेषताएं भी दिखाई देती हैं। छलड़ी के दिन स्वांग खेले जाते हैं। होलियारों की टोलियां होली गाते हुए पूरे गाँव का भ्रमण करती है। ज्यादातर टोलियां गाँव के मंदिरों में जा मिलती हैं। देवताओं को रंग अर्पित कर विदाई की होलियां गाई जाती हैं। “रंग की गागर सर पै धरे ,आज कन्हैया रंग भरे…….।” रंग के साथ आशीष का दौर भी चलता है। “गावैं ,खेलैं ,देवैं आसीस ,हो हो हो लख रे। बरस दीवाली बरसै फ़ाग ,हो हो हो लख रे। जो नर जीवैं ,गावैं फ़ाग ,हो हो हो लख रे। ” इस मधुर – मोहिल गीत – संगीत ,नृत्य वाली कुमाऊँ की इस निराली होली में यहाँ की मिटटी की सौंधी सुगंध है।होली के जरिए कुमाऊँ के समृद्ध लोक जीवन की झलक देखी जा सकती है। “हो मुबारक मंजरी फूलों भरी ,देखो ऐसी होली खेलें जनाबे आली
लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं।लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।

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