डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
पहाड़ में पैदा होने वाली मूली भी मैदानी मूली की ही तरह खाद्य जड़ों वाली सब्जी है, जो कि क्रूसीफैरी परिवार की सदस्य है. मूली इतनी आसानी से पैदा होने और फैलने वाली फसल है कि यह न तो अधिक देखभाल मांगती है और न ही बहुत अधिक खाद आदि. पहाड़ी मूली तकरीबन 2 किलो से 3 किलो वजन की होती हैदरअसल, यह एक जल्दी उगने वाली और सदाबहार फसल है. इस की जड़ें विभिन्न रंगों जैसे सफेद से लाल और हलके भूरे रंग की होती हैं.पहाड़ी क्षेत्र में कुमाऊं मंडल, गढ़वाल, हिमाचल प्रदेश आदि मुख्य मूली उत्पादक राज्य हैं. पहाड़ की मूली के लिए अगस्त महीने का समय खेत तैयार कर के उत्पादन के लिए सही है.पिछले कुछ सालों से पहाड़ में मूली की खूब पैदावार हो रही है. मूली की मांग हर शहर, हर गांवकसबे में सालभर बनी रहती है. वर्तमान में दूसरी फसलों की तरह मूली के दाम भी बहुत महंगे होते हैं.मूली की खेती से अच्छा मुनाफा कमाने के लिए हाईब्रिड मूली की खेती करनी चाहिए, क्योंकि हाईब्रिड मूली का बीज बोने से उन की जड़ें दूध की तरह सफेद, लंबी और चमकदार होती हैं, इसलिए आप को बीज भंडार की दुकानों पर तमाम तरह की उन्नत किस्में मिल जाएंगी.अगर हम मूली की उन्नत किस्मों की बात करें, तो पंजाब अगेती, पंजाब सफेद, पूसा देशी, पूसा चेतकी, जौनपुरी, बांबे रैड, पूसा रेशमी, अर्का, कल्याणपुर आदि के बीज मिल जाएंगे. मूली अगर घर पर ही गमले या मोटे डब्बे में लगाने जा रहे हैं, तो अखबार की गली हुई खाद और पत्तों को मिट्टी में मिला कर एक दिन बाद बीज बोने चाहिए. गमले या टीन और गत्ते के बक्से में मूली बहुत अच्छी होती है. उत्तराखंड के पहाड़ों में मिलने वाली मूली सिर्फ एक आम सब्जी नहीं, बल्कि यहां के पारंपरिक खान-पान का खास हिस्सा है. मैदानी मूली से अलग स्वाद, खुशबू और बनावट वाली इस मूली का इस्तेमाल सलाद से लेकर सब्जी, अचार और इसके पत्तों से बनने वाले कई पहाड़ी पकवानों में किया जाता है. खास बात यह है कि पहाड़ी इलाकों में इसकी उपलब्धता भी सीमित समय के लिए रहती है, जिससे स्थानीय बाजार में इसकी अलग पहचान बनी हुई है. नैनीताल के आसपास के कुछ गांवों की मूली अपने स्वाद और आकार के लिए खास मानी जाती हैपहाड़ी मूली की खास बात यह है कि इसके सिर्फ जड़ वाले हिस्से का इस्तेमाल नहीं होता. इसके हरे पत्ते और कोमल तने भी खाने में उपयोग किए जाते हैं. पहाड़ों में मूली के पत्तों की सब्जी बनाई जाती है और इन्हें दाल समेत कई स्थानीय पकवानों में भी मिलाया जाता है. यानी एक ही सब्जी के अलग-अलग हिस्सों का इस्तेमाल कर पारंपरिक पहाड़ी भोजन को स्वादिष्ट बनाया जाता है. नैनीताल के बीडी पांडे जिला अस्पताल के फिजीशियन के अनुसार, मूली में पानी, फाइबर के साथ विटामिन सी, पोटेशियम, मैंगनीज और आयरन जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं. फाइबर पाचन तंत्र को बेहतर रखने में मदद करता है. मूली और इसके पत्तों को संतुलित आहार का हिस्सा बनाया जा सकता है. हालांकि, पीलिया या लिवर संबंधी बीमारी में इसे इलाज को विकल्प नहीं मानना चाहिए हालांकि आप इसे अपने आहार में शामिल कर सकते हैं. स्थानीय सब्जी विक्रेता दीपेश के अनुसार पहाड़ी मूली सीमित समय के लिए उपलब्ध होती है. पहाड़ों में इसकी उपलब्धता मुख्य रूप से जुलाई से अक्टूबर के बीच रहती है. वहीं मैदानी इलाकों में मूली आमतौर पर सर्दियों में अधिक मिलती है. पहाड़ी मूली का स्वाद और इसके गुण स्थानीय और पहाड़ों में आने वाले लोगों को आकर्षित करता है.बाजार में पहाड़ी मूली करीब 50 से 60 रुपये में उपकुल जाएगी. इसकी कीमत मौसम, आकार और स्थानीय बाजार के अनुसार अलग-अलग हो सकती है. नैनीताल आने वाले कई पर्यटक पहाड़ी सब्जियों और स्थानीय उत्पादों को अपने साथ ले जाना पसंद करते हैं. ऐसे में पहाड़ी मूली पर्यटकों के लिए पहाड़ के पारंपरिक स्वाद को बरकरार रखे हुए है. भारत में किसान पारंपरिक फसलों के स्थान पर सब्जियों की खेती का विकल्प तलाशने लगे हैं. कम समय में अच्छा उत्पादन देने के कारण अब किसान अलग-अलग सब्जियों की खेती करते हैं, जो पारंपरिक फसलों से बेहद का समय में कई बार उत्पादन दे देती है. अभी देश में खरीफ फसलों के खेती जारी है जिसके बाद रबी फसलों की बुवाई का काम किया जाएगा. पिछले कुछ सालों से पहाड़ में मूली की खूब पैदावार हो रही है. मूली की मांग हर शहर, हर गांवकसबे में सालभर बनी रहती है. वर्तमान में दूसरी फसलों की तरह मूली के दाम भी बहुत महंगे होते हैं.।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











