डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
समुद्रतल से 3,310 मीटर की ऊंचाई पर उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित डोडीताल खूबसूरत पहाड़ों से घिरा एक मनमोहक ताल है। इसे अपने शांत एवं सौम्य वातावरण के कारण उत्तर भारत के सबसे खूबसूरत एवं ऊंचाई वाले तालों में शामिल किया जाता है। इस पर्यटन स्थल की विशेषता यह है कि यहां ट्रैकिंग के रोमांच संग ग्रामीण जीवनशैली और पहाड़ी व्यंजनों का आनंद भी लिया जा सकता है।डोडीताल का बेस कैंप अगोड़ा गांव अब सड़क से जुड़ चुका है, जिससे इस पर्यटक स्थल की दूरी 21 किमी से घटकर 16 किमी रह गई है। अगर आप भी ऐसी ही किसी जगह की तलाश में हैं तो चले आइए डोडीताल के रोमांचक ट्रैक पर और बनाइए अपने सफर को यादगार। नैसर्गिक सुंदरता को समेटे डोडीताल पर्यटकों के इंतजार में है। गणेश की पूजा और चतुर्थी से जुड़े प्रसंगों का उल्लेख केदारखंड के अध्याय 11 में भी बताया जाता है. डोडीताल की इस मान्यता का संदर्भ स्वामी तपोवन की पुस्तक ‘हिमगिरि विहार’ में भी स्थानीय लोग बताते हैं. कैलासू क्षेत्र के ग्रामीण पीढ़ियों से इस धार्मिक परंपरा को आगे बढ़ाते आए हैं.घने जंगलों के बीच करीब तीन हजार मीटर से अधिक की ऊंचाई पर शांत झील और हिमालयी चोटियों से घिरा डोडीताल. यही वह पवित्र धाम है, जिसे स्थानीय लोग भगवान गणेश की जन्मभूमि मानते हैं. यहां गणेश किसी नाम भर के देवता नहीं, बल्कि ‘डोडीराजा’ के रूप में पूजे जाते हैं. गणेश चतुर्थी पर डोडीताल और आसपास का पूरा कैलासू क्षेत्र आस्था के रंग में रंग जाता है. मान्यता है कि इसी स्थान पर मां पार्वती ने गणेश को जन्म दिया था और मां अन्नपूर्णा के रूप में आज भी उनकी पूजा होती है.गणेश चतुर्थी के मौके पर सोमवार को उत्तरकाशी के केलशू घाटी के दस गांवों ने गणेश महोत्सव का शुभारंभ किया. कंडार देवता मंदिर से भगवान गणेश की शोभायात्रा निकाली गई. ढोल-दमाऊं और रणसिंघा की गूंज के बीच शोभायात्रा विश्वनाथ मंदिर, मुख्य बाजार, बस अड्डे और भटवाड़ी रोड होते हुए नगर के विभिन्न हिस्सों से गुजरी. अगोड़ा, ढासड़ा, दंदालका, भंकोली, गजोली, नौगांव, सेकू और नाल्ड समेत आसपास के गांवों से पहुंचे ग्रामीणों ने रासो-तांदी लोकनृत्य प्रस्तुत कर पारंपरिक संस्कृति की झलक दिखाई. स्कंद पुराण के केदारखंड के मुताबिक, मां पार्वती स्नान के लिए गईं तो उन्होंने अपने शरीर के उबटन से एक बालक बनाया और उसमें प्राण डाल दिए. यही बालक गणेश कहलाए. माता ने उन्हें द्वार पर पहरा देते हुए किसी को भी अंदर नहीं आने देने की आज्ञा दी. इसी दौरान भगवान शिव वहां पहुंचे. गणेश ने माता की आज्ञा के कारण शिव को भी अंदर जाने से रोक दिया. विवाद बढ़ा और भगवान शिव ने गणेश का सिर काट दिया. माता पार्वती के क्रोधित होने पर भगवान शिव ने गणेश को पुनर्जीवन दिया और उनके धड़ पर हाथी का सिर लगाया. इसी के बाद गणेश गजानन कहलाए. स्थानीय लोग इसी कथा को डोडीताल से जोड़ते हैं.डोडीताल को गणेश जन्मभूमि मानने की परंपरा को स्थानीय लोग स्कंद पुराण के केदारखंड में वर्णित प्रसंगों से जोड़ते हैं. केदारखंड के अध्याय 10 में गणेश के प्रकृति से उत्पन्न होने का उल्लेख मिलता है. स्थानीय मान्यता में डोडीताल को ‘डुंडीसर’ से भी जोड़ा जाता है. गणेश की पूजा और चतुर्थी से जुड़े प्रसंगों का उल्लेख केदारखंड के अध्याय 11 में भी बताया जाता है. ट्रैकिंग से जुड़े अगोड़ा निवासी बताते हैं कि डोडीताल एक से डेढ़ किमी क्षेत्र में फैली षट्कोणीय झील है। इसकी गहराई कितनी है, आज तक कोई इसका अनुमान नहीं लगा पाया। पूर्व में कई विज्ञानियों और वन विभाग के अधिकारियों ने झील की गहराई को नापने का प्रयास किया, लेकिन असफल रहे। डोडीताल में ट्राउट मछली बड़ी तादाद में है। यहां ट्राउट एंग्लिंग स्पाट भी है। उत्तराखंड की ऊंची-ऊंची बर्फीली चोटियां, घने जंगल और शांत वातावरण अपने आप में ही किसी स्वर्ग से कम नहीं लगते। इन्हीं वादियों में डोडी ताल मंदिर एक पवित्र स्थल के रूप में जाना जाता है। यह मंदिर भगवान गणेश और माता अन्नपूर्णा को समर्पित है। यह स्थान जितना खूबसूरत है, उतना ही रहस्यमयी और धार्मिक आस्था से जुड़ा हुआ है। यहां हर साल दूर-दूर से श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं। यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि प्रकृति, पौराणिक कथाओं और रहस्यों का संगम माना जाता है।डोडी ताल मंदिर से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं। उन्हीं कथाओं के आधार पर इस स्थान को भगवान गणेश का जन्मस्थान माना जाता है। मंदिर से सटी हुई झील इस मंदिर की खूबसूरती को और बढ़ाती है। इस झील से जुड़े कई रहस्य भी प्रसिद्ध हैं। डोडी ताल मंदिर को लेकर लोगों में कई धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। सबसे बड़ी मान्यता यही है कि यह स्थान भगवान गणेश की जन्मस्थली है। मान्यताओं के अनुसार, यहां पूजा करने से विघ्न दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि जो भी भक्त सच्चे मन से यहां आकर प्रार्थना करता है, उसकी मनोकामना पूरी होती है।डोडी ताल मंदिर और ताल दोनों ही रहस्य से भरे हुए हैं। सबसे बड़ा रहस्य इसकी गहराई को लेकर है। कहा जाता है कि कई बार वैज्ञानिक और गोताखोरों ने इसकी गहराई मापने की कोशिश की लेकिन वे असफल रहे। माना जाता है कि ताल की गहराई अनंत है और इसमें दिव्य शक्तियां वास करती हैं।इसके अलावा, कई यात्रियों का कहना है कि रात के समय यहां अजीब सी ऊर्जा का अनुभव होता है। कोई इसे दिव्य मानता है, तो कोई इसे रहस्यमयी शक्ति मानता है। यही कारण है कि डोडी ताल मंदिर आस्था और रहस्य का संगम माना जाता है।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











