• About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact
Uttarakhand Samachar
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
Uttarakhand Samachar
No Result
View All Result

कहीं खोती जा रही है अल्मोड़ा के बाल, माल और पठाल की पहचान

17/09/20
in अल्मोड़ा, उत्तराखंड
Reading Time: 1min read
232
SHARES
290
VIEWS
Share on FacebookShare on WhatsAppShare on Twitter

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड की संस्कृति एवं परंपराओं ही नहीं, यहां के खान.पान में भी विविधता का समावेश है। उत्तराखंड का गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्र सुंदर वादियों के साथ अपने पकवानों के लिए भी जाना जाता है। ऐतिहासिक नगरी अल्मोड़ा की चर्चित बाल मिठाई लोगों के जुबां में मिठास बनाए हुए है। पहले उत्तराखंड में सबसे अच्छी बाल मिठाई अल्मोड़ा में ही मिलती थी, हालांकि अब ऐसा नहीं है। उत्तराखंड के हर हिल स्टेशन में अब आपको बाल मिठाई मिल जाएगी। वहीं अल्मोड़ा की बाल मिठाई, सिंगौड़ी और चॉकलेट की देश ही नहीं, बल्कि सात समुंदर पार भी खासी मशहूर है। जिसको बनाने का इतिहास काफी पुराना है। अल्मोड़ा की बाल मिठाई, सिंगौड़ी और चॉकलेट देश ही नहीं, बल्कि विदेश में भी खासी मशहूर है। लोग सौगात के रूप में यही तीन मिठाइयां लेकर यहां से जाते हैं। यहां बाल मिठाई बनाने का इतिहास लगभग सौ साल पुराना है। इसके स्वाद और निर्माण के परंपरागत तरीके को निखारने का श्रेय मिठाई विक्रेता स्वण् नंद लाल साह को जाता है, जिसे आज भी खीम सिंह मोहन सिंह रौतेला और जोगालाल साह के प्रतिष्ठान संवार रहे हैं।
बाल मिठाई को आसपास के क्षेत्र में उत्पादित होने वाले दूध से निर्मित खोए से तैयार किया जाता है। इसे बनाने के लिए खोए और चीनी को एक निश्चित तापमान पर पकाया जाता है। लगभग पांच घंटे तक इसे ठंडा करने के बाद इसमें रीनी और पोस्ते के दाने चिपकाए जाते हैं। जिसे बाद में छोटे.छोटे टुकड़ों में काटा जाता है। ऐसा ही बेजोड़ स्वाद सिंगौड़ी का भी है। सिंगौड़ी मालू के पत्ते में लपेटी जाती है और इसे कोन का आकार दिया जाता है। यहां के परंपरागत व्यजनों का लुत्फ भी सैलानी आसानी से उठा सकते हैं। सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा की बड़ी पहचान यहां की बाल मिठाई भी है।
अल्मोड़ा आने वाले पर्यटक यहां से पहचान के रूप में बाल.मिठाई, सिंगौड़ी और चॉकलेट जरूर अपने लिए और अपनों के लिए ले जाते थे लेकिन कोरोना संक्रमण से सब.कुछ बदल कर रख दिया। सदियों से चर्चित बाल मिठाई के कारोबारियों को भी दो जून की रोटी मुहैया नहीं हो पा रही है और नतीजा यह है कि वह बाल मिठाई, सिंगौड़ी, चॉकलेट के स्थान पर आलू, लौकी, खीरा और शिमला मिर्च बेच रहे हैं। इतना ही नही लोग बनारसी साड़ी की जगह पहाड़ी मंडुवा, कश्मीरी साड़ी की जगह पहाड़ी कद्दू और जयपुरी साड़ी की जगह पहाड़ के केले बिक रहे हैं। मिठाई बिक्रेता बृजेश कहते हैं कि उन्होंने तीन महीने तक इंतजार किया कि उनका काम शुरु होगा लेकिन कोई भी ग्राहक बाजार में न होने से बनी हुई मिठाई बर्बाद ही हो रही थी।
पिछले 4 महीनों से पर्यटकों की आवाजाही शून्य है और शादी विवाह भी नहीं हो रहे। घर चलाने के लिए चैहान को भी नया काम शुरु करना पड़ा। प्रसिद्ध साड़ी विक्रेता की दुकान में कश्मीरी साड़ी की जगह पहाड़ी मंडुवा, बनारसी साड़ी की जगह पहाड़ी कद्दू और जयपुरी साड़ी की जगह पहाड़ी केलों ने ले ली। तीन महीने तक इंतजार के बाद व्यापारियों ने अपने पारम्परिक व्यापार को बदलना ही उचित समझा। बाल मिठाई भल ही अब प्रदेश भर में और दिल्ली जैसे महानगरों में भी मिलने लगी है लेकिन इसकी पहचान अल्मोड़ा से ही है। अल्मोड़ा गए और बाल मिठाई नहीं लाए तो आपके दोस्त आपसे बात नहीं करते थे। जब उत्तराखंड एक पृथक राज्य बना था तो लोगों को उम्मीद थी कि यहां की भौगोलिक स्थिति को देखकर यहां के लिये कानूनों में भी कुछ परिवर्तन किये जायेंगे। आज के दिन एक भी कानून हमारे राज्य में ऐसा नहीं है, जिसे हमारी भौगोलिक परिस्थिति के अनुसार बदला गया हो। सरकारी नीतियों का प्रभाव कैसे हमारे जीवन पर पड़ता है, अल्मोड़ा की बाल मिठाई के माध्यम से। यह कोई अतिशयोक्ति न होगी अगर अल्मोड़ा और बाल मिठाई को एक दूसरे के पर्यायवाची कहा जाय। अल्मोड़ा कहते ही बाल मिठाई दिमाग में आती है और बाल मिठाई कहते ही अल्मोड़ा। बाल मिठाई न केवल अल्मोड़ा आने वाले पर्यटकों के लिये बल्कि यहां से गुजरने वाले हर यात्री के लिये इस शहर की सौगात है। पिछले एक दशक की बात की जाय तो अल्मोड़ा में बनने वाली बाल मिठाई के स्वाद में लगातार बदलाव आया है। अल्मोड़ा में गिनती की ही दुकानें हैं जहां पुराने स्वाद वाली बाल मिठाई आज भी बनती है। इसका एक मुख्य कारण है कि इसके लिये उपयोग में लाया जाने वाला खोयां।
वर्तमान में अल्मोड़ा की बाल मिठाई के लिये जिस खोया का प्रयोग किया जाता है वह दो प्रकार का है। एक मैदानों से ख़रीदा हुआ दूसरा पहाड़ों में बनने वाला। अल्मोड़ा में बनने वाली बाल मिठाई में मुख्यतः पहाड़ों में बने खोये का ही प्रयोग किया जाता था। लेकिन बीते कुछ सालों में मैदानों से आने वाले बालदाने के साथ खोया भी मगाया जाने लगा है। पहाड़ों में पहले से ही खोया बनता था लेकिन समय के साथ जब खोया की मांग बड़ी तो उसका उत्पादन स्थानीय मांग के अनुरूप नहीं हो पाया। मांग पूरी न कर पाने के पीछे प्रमुख कारण सरकार की वन संबंधी नीतियां रही हैं। उत्तराखंड का समाज हमेशा से अपने दैनिक जीवन की आपूर्ति के लिये वनों पर निर्भर रहा है। वनों से उत्तराखंड के समाज का पारिवारिक रिश्ता रहा है, लेकिन नये वन कानून के लागू होने के बाद उत्तराखंड के समाज की वनों पर निर्भरता पूरी तरह समाप्त हो गयी हैण्खोया बनाने के लिये स्थानीय लोग ईधन के लिये जंगलों पर निर्भर थे। मिठाइयों के लिये खोया बनाने वाले कई सारे परिवार जागेश्वर, शीतलाखेत, लाट, चौँसली, लमगड़ा आदि कस्बों के गावों में रहते हैं। इन गावों में लकड़ी के चूल्हे में बनने वाला खोया तत्कालीन बाजार की मांग के लिहाज से काफी था। क्योंकि गांव में गाय अपनी होती थी ईधन जंगलों से मिल जाता था और बहुत कम लागत में खोया तैयार हो जाता था। बाद में वन कानून आया तो जंगल से ईधन के लिये लकड़ियां चुनना गैर.कानूनी हो गया। ईधन के नये उपायों ने खोया के उत्पादन में मुनाफा कम कर दिया तो लोगों ने भी खोया का उत्पादन या तो कम कर दिया या फिर बंद कर दिया। माना तो यहां तक जाता है कि एक समय में बाल दाना भी अल्मोड़ा के आस.पास के गावों में ही उत्पादित किया जाता था लेकिन अब यह पूरी तरह से मैदानी भागों से आयात किया जाता है। इसका मुख्य कारण भी ईधन की लकड़ी की कमी ही माना जाता है। हो सकता है कि आने वाले समय में खोया भी पूरी तरह से मैदानी भागों से आयात किया जाये।
उत्तराखंड सरकार को समझना चाहिये कि वह सार्वभौमिक नीतियों के साथ उत्तराखंड का विकास कभी नहीं कर सकती। उत्तराखंड सरकार को चाहिये कि वह अपनी भौगोलिक स्थिति के आधार पर बने समाज को ध्यान में रखकर नीतियों का निर्माण करे। मसलन बाल मिठाई के उक्त मामले में ही सरकार विशेष कानून बनाकर क्षेत्र के लोगों को जंगलों में कम से कम इतने अधिकार तो दे कि वे ईधन के लिये इक्कट्ठा की गयी सूखी लकड़ी चुनने में अधिकार दे। शुद्ध पहाड़ी खोये से बनी बाल मिठाई की एक विशेषता जो बाल मिठाई पहाड़ी खोये की बनी होती है वह छः से सात दिन तक स्वाद में एक सी बनी रहती है बाल मिठाई फ्रिज में भी नहीं रखी जाती है। जो कि 400 रुपये से लेकर 600 रुपये तक के पैक में उपलब्ध है। इन्हें मेरठ, लखनऊ, चंडीगढ़, लुधियाना, दिल्ली, मुंबई आदि महानगरों में भी भेजा जाता है। यह भी महीनों तक खराब नहीं होते। ताउम्र इनका जायका नहीं भूलने वाले है। कुमाऊं का सांस्कृतिक शहर अल्मोड़ा तीनों चीजों के लिए जाना जाता है। ये हैं बाल बाल मिठाई, माल माल रोड और पटाल पटाल पत्थर। यानी उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र की सबसे प्रसिद्ध मिठाई बाल मिठाई ही है। पहाड़ के लोगों को जड़ों की ओर लौटना ही होगा। यहां की परंपराएं, मान्यताओं का संरक्षण नहीं होगा तो इसका समाज पर नकारात्मक असर पडऩा तय है।

Share93SendTweet58
Previous Post

दो आईएएस और तीन पीसीएस अधिकारियों के तबादले

Next Post

अब तकनीकी विश्वविद्यालय माधो सिंह भंडारी के नाम पर होगा

Related Posts

उत्तराखंड

सदियों पुरानी परंपरा का जीवंत उत्सव है जगन्नाथ रथ यात्रा

July 25, 2026
9
उत्तराखंड

एक बड़ा शिकारी बना महान वन्य जीव संरक्षक

July 25, 2026
7
उत्तराखंड

टिहरी राजशाही के ताबूत में आखिरी कील साबित हुई श्रीदेव सुमन की शहादत

July 25, 2026
5
अल्मोड़ा

शहीद श्रीदेव सुमन का जीवन संघर्ष की प्रेरणा देता रहेगा* *निरंकुश सत्ता के सामने कभी नहीं झुके अमर शहीद

July 25, 2026
7
उत्तराखंड

डोईवाला: एसएफआई ने तहसील मुख्यालय तक निकाला मार्च

July 25, 2026
17
उत्तराखंड

स्व. मांगेराम अग्रवाल का समाज और राष्ट्र के प्रति योगदान अविस्मरणीय: कोश्यारी

July 25, 2026
33

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Popular Stories

  • चार जिलों के जिलाधिकारी बदले गए

    67714 shares
    Share 27086 Tweet 16929
  • डोईवाला : पुलिस,पीएसी व आईआरबी के जवानों का आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण सम्पन्न

    45786 shares
    Share 18314 Tweet 11447
  • ऑपरेशन कामधेनु को सफल बनाये हेतु जनपद के अन्य विभागों से मांगा गया सहयोग

    38070 shares
    Share 15228 Tweet 9518
  •  ढहते घर, गिरती दीवारें, दिलों में खौफ… जोशीमठ ही नहीं

    37453 shares
    Share 14981 Tweet 9363
  • विकासखंड देवाल क्षेत्र की होनहार छात्रा ज्योति बिष्ट ने किया उत्तराखंड का नाम रोशन

    37370 shares
    Share 14948 Tweet 9343

Stay Connected

संपादक- शंकर सिंह भाटिया

पता- ग्राम एवं पोस्ट आफिस- नागल ज्वालापुर, डोईवाला, जनपद-देहरादून, पिन-248140

फ़ोन- 9837887384

ईमेल- shankar.bhatia25@gmail.com

 

Uttarakhand Samachar

उत्तराखंड समाचार डाॅट काम वेबसाइड 2015 से खासकर हिमालय क्षेत्र के समाचारों, सरोकारों को समर्पित एक समाचार पोर्टल है। इस पोर्टल के माध्यम से हम मध्य हिमालय क्षेत्र के गांवों, गाड़, गधेरों, शहरों, कस्बों और पर्यावरण की खबरों पर फोकस करते हैं। हमारी कोशिश है कि आपको इस वंचित क्षेत्र की छिपी हुई सूचनाएं पहुंचा सकें।
संपादक

Browse by Category

  • Bitcoin News
  • Education
  • अल्मोड़ा
  • अवर्गीकृत
  • उत्तरकाशी
  • उत्तराखंड
  • उधमसिंह नगर
  • ऋषिकेश
  • कालसी
  • केदारनाथ
  • कोटद्वार
  • क्राइम
  • खेल
  • चकराता
  • चमोली
  • चम्पावत
  • जॉब
  • जोशीमठ
  • जौनसार
  • टिहरी
  • डोईवाला
  • दुनिया
  • देहरादून
  • नैनीताल
  • पर्यटन
  • पिथौरागढ़
  • पौड़ी गढ़वाल
  • बद्रीनाथ
  • बागेश्वर
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • राजनीति
  • रुद्रप्रयाग
  • रुद्रप्रयाग
  • विकासनगर
  • वीडियो
  • संपादकीय
  • संस्कृति
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • साहिया
  • हरिद्वार
  • हेल्थ

Recent News

सदियों पुरानी परंपरा का जीवंत उत्सव है जगन्नाथ रथ यात्रा

July 25, 2026

एक बड़ा शिकारी बना महान वन्य जीव संरक्षक

July 25, 2026
  • About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.