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कहीं खोती जा रही है अल्मोड़ा के बाल, माल और पठाल की पहचान

17/09/20
in अल्मोड़ा, उत्तराखंड
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड की संस्कृति एवं परंपराओं ही नहीं, यहां के खान.पान में भी विविधता का समावेश है। उत्तराखंड का गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्र सुंदर वादियों के साथ अपने पकवानों के लिए भी जाना जाता है। ऐतिहासिक नगरी अल्मोड़ा की चर्चित बाल मिठाई लोगों के जुबां में मिठास बनाए हुए है। पहले उत्तराखंड में सबसे अच्छी बाल मिठाई अल्मोड़ा में ही मिलती थी, हालांकि अब ऐसा नहीं है। उत्तराखंड के हर हिल स्टेशन में अब आपको बाल मिठाई मिल जाएगी। वहीं अल्मोड़ा की बाल मिठाई, सिंगौड़ी और चॉकलेट की देश ही नहीं, बल्कि सात समुंदर पार भी खासी मशहूर है। जिसको बनाने का इतिहास काफी पुराना है। अल्मोड़ा की बाल मिठाई, सिंगौड़ी और चॉकलेट देश ही नहीं, बल्कि विदेश में भी खासी मशहूर है। लोग सौगात के रूप में यही तीन मिठाइयां लेकर यहां से जाते हैं। यहां बाल मिठाई बनाने का इतिहास लगभग सौ साल पुराना है। इसके स्वाद और निर्माण के परंपरागत तरीके को निखारने का श्रेय मिठाई विक्रेता स्वण् नंद लाल साह को जाता है, जिसे आज भी खीम सिंह मोहन सिंह रौतेला और जोगालाल साह के प्रतिष्ठान संवार रहे हैं।
बाल मिठाई को आसपास के क्षेत्र में उत्पादित होने वाले दूध से निर्मित खोए से तैयार किया जाता है। इसे बनाने के लिए खोए और चीनी को एक निश्चित तापमान पर पकाया जाता है। लगभग पांच घंटे तक इसे ठंडा करने के बाद इसमें रीनी और पोस्ते के दाने चिपकाए जाते हैं। जिसे बाद में छोटे.छोटे टुकड़ों में काटा जाता है। ऐसा ही बेजोड़ स्वाद सिंगौड़ी का भी है। सिंगौड़ी मालू के पत्ते में लपेटी जाती है और इसे कोन का आकार दिया जाता है। यहां के परंपरागत व्यजनों का लुत्फ भी सैलानी आसानी से उठा सकते हैं। सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा की बड़ी पहचान यहां की बाल मिठाई भी है।
अल्मोड़ा आने वाले पर्यटक यहां से पहचान के रूप में बाल.मिठाई, सिंगौड़ी और चॉकलेट जरूर अपने लिए और अपनों के लिए ले जाते थे लेकिन कोरोना संक्रमण से सब.कुछ बदल कर रख दिया। सदियों से चर्चित बाल मिठाई के कारोबारियों को भी दो जून की रोटी मुहैया नहीं हो पा रही है और नतीजा यह है कि वह बाल मिठाई, सिंगौड़ी, चॉकलेट के स्थान पर आलू, लौकी, खीरा और शिमला मिर्च बेच रहे हैं। इतना ही नही लोग बनारसी साड़ी की जगह पहाड़ी मंडुवा, कश्मीरी साड़ी की जगह पहाड़ी कद्दू और जयपुरी साड़ी की जगह पहाड़ के केले बिक रहे हैं। मिठाई बिक्रेता बृजेश कहते हैं कि उन्होंने तीन महीने तक इंतजार किया कि उनका काम शुरु होगा लेकिन कोई भी ग्राहक बाजार में न होने से बनी हुई मिठाई बर्बाद ही हो रही थी।
पिछले 4 महीनों से पर्यटकों की आवाजाही शून्य है और शादी विवाह भी नहीं हो रहे। घर चलाने के लिए चैहान को भी नया काम शुरु करना पड़ा। प्रसिद्ध साड़ी विक्रेता की दुकान में कश्मीरी साड़ी की जगह पहाड़ी मंडुवा, बनारसी साड़ी की जगह पहाड़ी कद्दू और जयपुरी साड़ी की जगह पहाड़ी केलों ने ले ली। तीन महीने तक इंतजार के बाद व्यापारियों ने अपने पारम्परिक व्यापार को बदलना ही उचित समझा। बाल मिठाई भल ही अब प्रदेश भर में और दिल्ली जैसे महानगरों में भी मिलने लगी है लेकिन इसकी पहचान अल्मोड़ा से ही है। अल्मोड़ा गए और बाल मिठाई नहीं लाए तो आपके दोस्त आपसे बात नहीं करते थे। जब उत्तराखंड एक पृथक राज्य बना था तो लोगों को उम्मीद थी कि यहां की भौगोलिक स्थिति को देखकर यहां के लिये कानूनों में भी कुछ परिवर्तन किये जायेंगे। आज के दिन एक भी कानून हमारे राज्य में ऐसा नहीं है, जिसे हमारी भौगोलिक परिस्थिति के अनुसार बदला गया हो। सरकारी नीतियों का प्रभाव कैसे हमारे जीवन पर पड़ता है, अल्मोड़ा की बाल मिठाई के माध्यम से। यह कोई अतिशयोक्ति न होगी अगर अल्मोड़ा और बाल मिठाई को एक दूसरे के पर्यायवाची कहा जाय। अल्मोड़ा कहते ही बाल मिठाई दिमाग में आती है और बाल मिठाई कहते ही अल्मोड़ा। बाल मिठाई न केवल अल्मोड़ा आने वाले पर्यटकों के लिये बल्कि यहां से गुजरने वाले हर यात्री के लिये इस शहर की सौगात है। पिछले एक दशक की बात की जाय तो अल्मोड़ा में बनने वाली बाल मिठाई के स्वाद में लगातार बदलाव आया है। अल्मोड़ा में गिनती की ही दुकानें हैं जहां पुराने स्वाद वाली बाल मिठाई आज भी बनती है। इसका एक मुख्य कारण है कि इसके लिये उपयोग में लाया जाने वाला खोयां।
वर्तमान में अल्मोड़ा की बाल मिठाई के लिये जिस खोया का प्रयोग किया जाता है वह दो प्रकार का है। एक मैदानों से ख़रीदा हुआ दूसरा पहाड़ों में बनने वाला। अल्मोड़ा में बनने वाली बाल मिठाई में मुख्यतः पहाड़ों में बने खोये का ही प्रयोग किया जाता था। लेकिन बीते कुछ सालों में मैदानों से आने वाले बालदाने के साथ खोया भी मगाया जाने लगा है। पहाड़ों में पहले से ही खोया बनता था लेकिन समय के साथ जब खोया की मांग बड़ी तो उसका उत्पादन स्थानीय मांग के अनुरूप नहीं हो पाया। मांग पूरी न कर पाने के पीछे प्रमुख कारण सरकार की वन संबंधी नीतियां रही हैं। उत्तराखंड का समाज हमेशा से अपने दैनिक जीवन की आपूर्ति के लिये वनों पर निर्भर रहा है। वनों से उत्तराखंड के समाज का पारिवारिक रिश्ता रहा है, लेकिन नये वन कानून के लागू होने के बाद उत्तराखंड के समाज की वनों पर निर्भरता पूरी तरह समाप्त हो गयी हैण्खोया बनाने के लिये स्थानीय लोग ईधन के लिये जंगलों पर निर्भर थे। मिठाइयों के लिये खोया बनाने वाले कई सारे परिवार जागेश्वर, शीतलाखेत, लाट, चौँसली, लमगड़ा आदि कस्बों के गावों में रहते हैं। इन गावों में लकड़ी के चूल्हे में बनने वाला खोया तत्कालीन बाजार की मांग के लिहाज से काफी था। क्योंकि गांव में गाय अपनी होती थी ईधन जंगलों से मिल जाता था और बहुत कम लागत में खोया तैयार हो जाता था। बाद में वन कानून आया तो जंगल से ईधन के लिये लकड़ियां चुनना गैर.कानूनी हो गया। ईधन के नये उपायों ने खोया के उत्पादन में मुनाफा कम कर दिया तो लोगों ने भी खोया का उत्पादन या तो कम कर दिया या फिर बंद कर दिया। माना तो यहां तक जाता है कि एक समय में बाल दाना भी अल्मोड़ा के आस.पास के गावों में ही उत्पादित किया जाता था लेकिन अब यह पूरी तरह से मैदानी भागों से आयात किया जाता है। इसका मुख्य कारण भी ईधन की लकड़ी की कमी ही माना जाता है। हो सकता है कि आने वाले समय में खोया भी पूरी तरह से मैदानी भागों से आयात किया जाये।
उत्तराखंड सरकार को समझना चाहिये कि वह सार्वभौमिक नीतियों के साथ उत्तराखंड का विकास कभी नहीं कर सकती। उत्तराखंड सरकार को चाहिये कि वह अपनी भौगोलिक स्थिति के आधार पर बने समाज को ध्यान में रखकर नीतियों का निर्माण करे। मसलन बाल मिठाई के उक्त मामले में ही सरकार विशेष कानून बनाकर क्षेत्र के लोगों को जंगलों में कम से कम इतने अधिकार तो दे कि वे ईधन के लिये इक्कट्ठा की गयी सूखी लकड़ी चुनने में अधिकार दे। शुद्ध पहाड़ी खोये से बनी बाल मिठाई की एक विशेषता जो बाल मिठाई पहाड़ी खोये की बनी होती है वह छः से सात दिन तक स्वाद में एक सी बनी रहती है बाल मिठाई फ्रिज में भी नहीं रखी जाती है। जो कि 400 रुपये से लेकर 600 रुपये तक के पैक में उपलब्ध है। इन्हें मेरठ, लखनऊ, चंडीगढ़, लुधियाना, दिल्ली, मुंबई आदि महानगरों में भी भेजा जाता है। यह भी महीनों तक खराब नहीं होते। ताउम्र इनका जायका नहीं भूलने वाले है। कुमाऊं का सांस्कृतिक शहर अल्मोड़ा तीनों चीजों के लिए जाना जाता है। ये हैं बाल बाल मिठाई, माल माल रोड और पटाल पटाल पत्थर। यानी उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र की सबसे प्रसिद्ध मिठाई बाल मिठाई ही है। पहाड़ के लोगों को जड़ों की ओर लौटना ही होगा। यहां की परंपराएं, मान्यताओं का संरक्षण नहीं होगा तो इसका समाज पर नकारात्मक असर पडऩा तय है।

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