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पहाड़ी इलाकों में घट रहा है आलू का क्षेत्र

03/07/20
in उत्तराखंड
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
आलू विश्व की एक महत्तवपूर्ण सब्जियों वाली फसल है। यह एक सस्ती और आर्थिक फसल है, जिस कारण इसे गरीब आदमी का मित्र कहा जाता है। यह फसल दक्षिणी अमरीका की है और इसमें कार्बोहाइड्रेट और विटामिन भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। आलू लगभग सभी राज्यों में उगाए जाते हैं। अगर दुनिया में आलू ना होता तो शायद बहुत से लोग सब्जियां ही ना खाते। जब आलू के दाम आसमान छूते हैं तो पूरे भारत में हंगामा मच जाता है, लेकिन हैरान करने वाली बात ये है कि आज से 500 साल पहले इसी आलू का भारत में कोई अस्तित्व ही नहीं था। इसे कोई जानता ही न था। भारत में पहली बार जहांगीर के जमाने में आलू आया था। हम भारतीयों को आलू का स्वाद चखाने का श्रेय यूरोपीय व्यापारियों को जाता है, जो भारत में आलू लेकर आए और यहां उसका प्रचार.प्रसार किया।
आलू सत्रहवीं सदी की शुरुआत में पुर्तगाली मरीनों द्वारा दक्षिणी एशिया में लाया गया था। इस तरह भारत में आलू सर्व प्रथम पुर्तगालियों द्वारा सन 1615 में इंट्रोड्यूस किया गया। भारत में आलू का सबसे पहला ज्ञात संदर्भ एडवर्ड टेरी के प्रलेखों में है जो समकालीन भारत के उत्तरी क्षेत्र में 1615 से 1619 तक मुगल सम्राट जहाँगीर के दरबार में ब्रिटिश राजदूत सर थॉमस रो के साथ थे। हिस्टोरिकल डिक्शनरी ऑफ इंडियन फूड में प्रलेखित किया गया है कि भारत में आलू पहले केवल यूरोपीय और फिर मुसलमानों द्वारा खाया जाता था, लेकिन डच हालैंड वाले लोगों ने वास्तव में आलू की संस्कृति को भारत में पेश किया और स्थानीय खपत के लिए आलू की खेती करने की विधा सिखा दी। आलू को भारत के कई भागों जैसे गोआ, महाराष्ट्र, वेस्टर्न कोस्टल क्षेत्रों में बटाटा के नाम से भी जाना जाता है।
सत्रहवीं शताब्दी की शुरुआत में भारत के पश्चिमी तट पर सर्व प्रथम पुर्तगालियों ने आलू की खेती की जिसे उन्होंने बटाटा कहा था जोकि पुर्तगाली व स्पेनिश भाषा में आलू का एक विशुद्ध नाम हैण्अंग्रेजों की आलू के प्रति ऐसी दीवानगी थी कि जब भारत में उनका उपनिवेश बना तो पुर्तगाली ही उनके मुख्य आपूर्तिकर्ता थे और भारत में बसे यूरोपीय ही पुर्तगालियों के मुख्य ग्राहक थे। बाद में ब्रिटिश व्यापारियों ने आलू को एक फसल के रूप में, जो कि तब भारत में अालू कहा जाता था इसे बंगाल में पेश किया। भारत में आलू को बढ़ावा देने का श्रेय वारेन हिस्टिंग्स को जाता है जो 1772 से 1785 तक भारत के गवर्नर जनरल रहे। अठ्ठारहवीं शताब्दी तक आलू का पूरी तरह से भारत में प्रचार.प्रसार हो चुका था। आलू की व्यवसायिक खेती उत्तराखंड के ऊंचाई व अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सदियों से होती आ रही है। आलू उत्पादन इन क्षेत्रो के कास्तकारों की रोजी रोटी व आजीविका से जुड़ा हुआ विषय है । उत्तराखंड के हुक्मरानों, नीति निर्धारकों के गलत निर्णयों के कारण आज पहाड़ी क्षेत्रों बिशेष रूप से सीमांत जनपदों के आलू उत्पादक परेशान व निराश हैं।
उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में भारत के उत्तरी पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी खेती की जाने लगी। सन 1830 के आसपास देहरादून की सीढ़ीदार ढलानों वाले खेतों पर आलू के खेत लगाए गए थे। कुमाऊं में सर रैमजे ने अपने कार्यकाल के दौरान 1840-1884 आलू के फसल की खेती आरम्भ करवाई आलू की फसल को उगाने के लिए उन्होंने कुमाऊं में कृषकों को प्रोत्साहित किया व इसकी खेती को करने का प्रसार किया उत्तराखंड राज्य बनने से पूर्व पर्वतीय क्षेत्रों के प्रत्येक जनपद में एक या दो आलू बीज उत्पादन फार्म होते थे।
टेहरी जनपद में धनौल्टी, काणाताल उत्तरकाशी में द्वारी, रैथल पौड़ी में भरसार, खपरोली रुद्रप्रयाग में चिरवटिया, घिमतोली चमोली जिले में परसारी, कोटी, रामणी पिथौरागढ़ में मुनस्यारी, धारचुला अल्मोड़ा में दूनागिरी, जागेश्वर नैनीताल जनपद में गागर, रामगढ़ आदि। इन विभागीय आलू फार्मों में हिमाचल प्रदेश के कुफरी या अन्य क्षेत्रों से आलू का फाउंडेशन बीज मंगा कर आलू का प्रमाणित बीज तैयार किया जाता था जिसे मांग के अनुसार स्थानीय कास्तकारों को आलू बुवाई के समय वितरित किया जाता था।आलू के प्रमाणित बीज की मांग बहुत अधिक रहती है। इन आलू फार्मौ में कुछ कास्तकार दैनिक श्रमिक के रूप मात्र इसलिए कार्य करते थे कि उन्हें आलू बीज की छर्री याने ग्रेडिंग के बाद जो छोटा आलू का बीज बच जाता है उन्हें मिल सके क्योंकि दैनिक श्रमिकों को ही आलू की छर्रियां उचित मूल्य पर दी जाती थी ऐसा मेरा आलू फार्म गागर जनपद नैनीताल का अनुभव रहा है। हमारे देश में मात्र 30 प्रतिशत ही आलू का प्रमाणित बीज उपलब्ध हो पाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में उत्पादित आलू बीज की मांग अधिक रहती है पहाडी क्षेत्रों में उत्पादित प्रमाणित आलू बीज बोने से कास्तकारों को 16-20 गुना से भी अधिक उपज मिलती है वहीं बाजार से क्रय किए गए सामान्य व अपनी पुरानी फसल से रखे आलू बीज से उपज काफी कम याने मात्र 3-4 गुना ही आलू की उपज मिल पाती हैं।
अस्सी के दशक में बीज प्रमाणीकरण संस्था का कार्यालय चमोली जनपद के कर्णप्रयाग में खोला गया था जिससे पर्वतीय क्षेत्रों के कास्तकार आसानी से प्रमाणीकरण कर प्रमाणित आलू बीज का उत्पादन कर सकें इस कार्य के लिए जोशीमठ मुनस्यारी व उत्तरकाशी में उद्यान विभाग के अतिरिक्त कर्मचारियों को आलू के प्रमाणित बीज उत्पादन हेतु नियुक्त भी किया गया था।उत्तराखंड राज्य बनने पर उमीद जगी थी कि पर्वतीय क्षेत्रों के कास्तकारों की आर्थिक स्थिति में सुधार आएगा किन्तु अलग राज्य बनते ही उत्तराखंड के हुक्मरानों नीति निर्धारकों द्वारा उद्यान विभाग के आलू बीज उत्पादन फार्मों को बन्द कर दिया गया तथा इन फार्मों को स्वयम सेवी संस्थाओं तथा पन्त नगर कृषि विश्व विद्यालय को हस्थानान्तरण कर दिया गया। इन आलू फार्मौ के बन्द होने से स्थानीय कास्तकारों को आलू का प्रमाणित बीज मिलना बंद हो गया।
उद्यान विभाग द्वारा आलू बीज की कोई अतिरिक्त व्यवस्था आलू उत्पादकों के लिए नहीं की गई।कास्तकारों ने स्वयंम के आलू बीज से या बाजार में उपलब्ध सामान्य किस्म के आलू की बुवाई की जिससे उनको आलू की बहुत कम उपज मिली। आलू उत्पादकों को आलू की खेती कम उपज के कारण अलाभ कारी लगने लगी जिस कारण आलू की खेती कम होती गई। उद्यान विभाग द्वारा फरवरी मार्च माह में काशीपुर व अन्य मैदानी क्षेत्रों में उगाया गया नया बीज का आलू बिना किये कई पर्वतीय क्षेत्रों में भेजने से भी आलू उपज पर प्रतिकूल असर पड़ा आज इन क्षेत्रों के कृषकों के सामने आजीविका का संकट पैदा हो गया है।हजारो हैक्टेयर आलू फार्मों के बन्द होने के बाद भी उद्यान विभाग के 2015-2016 के आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड में 25889.76 हैक्टेयर क्षेत्र फल में आलू की खेती की जाती है जिससे 358244.23 मेंट्रिक टन आलू का उत्पादन होना दर्शाया गया है जो कि विश्वसनीय नहीं लगता।
पिथौरागढ़ में मुनस्यारी, धारचुला व मदकोट क्षेत्र में बौना, गांधीनगर, क्वीरी, सरमोली, गोल्फा, निर्तोली, गिरगांव आदि लगभग 40 से भी अधिक गांवों के कास्तकार सहकारिता के माध्यम से आलू प्रमाणित बीज का अच्छा उत्पादन कर रहे हैं ।अन्य जनपदों में भी इसी तरह के प्रयास होने चाहिए। उत्तरकाशी जनपद के भटवाड़ी व चमोली जिले के जोशीमठ विकास खंडों में आलू प्रमाणित बीज उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं।रिलायंस फाउंडेशन उत्तरकाशी द्वारा जनपद के भटवाड़ी विकास खण्ड के अन्तर्गत जखोल, द्वारी, रैथल, नतीण, पाला, गोरसाली, वारसू, पाई आदि गांवों का चयन बर्ष 2014.2015 में आजीविका से जुड़े कार्यों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया गया।
इस क्षेत्र के कास्तकार पूर्व से ही आलू उत्पादन करते आ रहे हैं किन्तु क्षेत्र के आलू बीज उत्पादन फार्म द्वारी के बन्द हो जाने के कारण क्षेत्र के कास्तकारों को प्रमाणित आलू बीज मिलना बंद हो गया। आलू का प्रमाणित बीज न मिल पाने के कारण कास्तकार स्वयमं के उत्पादित आलू बीज से आलू की खेती कर रहे थे, जिससे उनको आलू की बहुत कम उपज मिल रही थी धीरे धीरे आलू की अलाभकारी खेती होने के कारण कास्तकार आलू की खेती छोड़ ने लगे। क्षेत्र में कार्यरत रिलायंस फाउंडेशन द्वारा चयनित गांव के कास्तकारों का हिमाचल प्रदेश के लाहोल स्फित आलू उत्पादक संघ के कास्तकारों से संपर्क करवाया गया साथ ही उनके माध्यम से ही प्रमाणित आलू बीज स्वयंम कास्तकारों द्वारा क्रय किया गया। जिससे पहले की अपेक्षा आलू की उपज कई गुना अधिक हुयी अब वहां के कास्तकार हिमाचल प्रदेश के कास्तकारों से सम्पर्क कर आलू बीज की व्यवस्था स्वयंम से कर रहे हैं इस कार्य के लिए कास्तकारौ ने रिलायंस फाउंडेशन की सहायता से प्रत्येक ग्राम सभा में ग्राम विकास कोष बनाये है जिसमें ग्राम वासियों द्वारा प्रत्येक माह धन जमा किया जाता है इस कोष का संचालन ग्राम वासी स्वयमं करते हैं ग्राम विकास कोष से ही कास्तकार आलू बीज क्रय करते है।वर्तमान में 12 गांव के कास्तकार समूह में आलू का अच्छा उत्पादन कर रहे हैं।उद्यान विभाग द्वारा बजट के अनुसार आलू का प्रमाणित बीज मुनस्यारी धारचुला व अन्य स्थानों से मंगा कर आधी कीमत पर आलू उत्पादकों को वितरित किया जाता है किन्तु मांग के अनुसार यह काफी कम होता है साथ ही दूर से लाने के कारण कभी कभी समय पर भी उपलब्ध नहीं हो पाता है।
यदि इन क्षेत्रों के कास्तकारों को योजनाओं में समय पर प्रमाणित आलू का बीज उपलब्ध कराया जाय तो इन कास्तकारौ की आर्थिक स्थिति अच्छी हो सकती है।पर्वतीय क्षेत्र के इन आलू उत्पादकों के लिए सरकार को बिशेष प्रयास करने होंगे यदि यही स्थिति बनी रहती है तो इन क्षेत्रों से भी पलायन बढेगा ।राज्य बनने पर आश जगी थी कि विकास योजनायें राज्य की विषम भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार कृषकों के हित में बनेंगी किन्तु दुर्भाग्य से राज्य को सक्ष्म व अनुभवी नेतृत्व न मिल पाने के कारण जिसका प्रशासकों ने पूरा लाभ उठाया योजनाएं वैसे ही चल रही है जैसे उतर प्रदेश के समय में चल रही थी।राज्य के भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार योजनाओं में सुधार नहीं हुआ। विभाग योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए कार्ययोजना तैयार करता है कार्ययोजना में उन्हीं मदों में अधिक धनराशि रखी जाती है जिसमें आसानी से संगठित ध्संस्थागत भ्रष्टाचार किया जा सके या कहैं डाका डाला जा सके।यदि विभाग कोध्शासन को सीधे कोई सुझावध्शिकायत भेजी जाती है तो कोई जवाब नहीं मिलता। माननीय प्रधानमंत्री जी ध्माननीय मुख्यमंत्री जी के समाधान पोर्टल पर सूझाव शिकायत अपलोड करने पर शिकायत शासन से संबंधित विभाग के निदेशक को जाती है वहां से जिला स्तरीय अधिकारियों को वहां से फील्ड स्टाफ को अन्त में जबाव मिलता है कि किसी भी कृषक द्वारा कार्यालय में कोई लिखित शिकायत दर्ज नहीं है सभी योजनाएं पारदर्शी ठंग से चल रही है।उच्च स्तर पर योजनाओं का मूल्यांकन सिर्फ इस आधार पर होता है कि विभाग को कितना बजट आवंटित हुआ और अब तक कितना खर्च हुआ राज्य में कोई ऐसा सक्षम और ईमानदार सिस्टम नहीं दिखाई देता जो धरातल पर योजनाओं का ईमानदारी से मूल्यांकन कर योजनाओं में सुधार ला सके।योजनाओं में जबतक कृषकों के हित में सुधार नहीं किया जाता व क्रियावयन में पारदर्शिता नहीं लाई जाती कृषकों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी सोचना वेमानी है। योजनाओं पर प्रति बर्ष हजारों करोड़ खर्च करने वाला उद्यान विभाग राज्य बनने के 19 बर्षौ बाद भी पहाड़ी क्षेत्रों के कृषकौं को समय पर आलू बीज नहीं उपलब्ध करा पा रहा है। हुक्म रानौं नीति निर्धारकों को चाहिए कि योजनाओं में आलू बीज उत्पादन की कार्य योजना बनाकर मुनस्यारी धारचुला की तरह ही चमोली जनपद के जोशीमठ एवं उत्तरकाशी जनपद के भटवाड़ी विकास खंडों में आलू उत्पादक संघ बना कर कास्तकारों से आलू का प्रमाणित बीज उत्पादन कार्यक्रम शुरू करने का प्रयास करना चाहिए साथ ही पूर्व की भांति हर जनपद में आलू बीज उत्पादन फार्म विकसित किए जायं जिससे ऊंचाई व अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में फिर से स्थानीय प्रमाणित आलू बीज समय पर मिल सके जिससे इन क्षेत्रों की आलू की घटती जोत रुक सके तथा आलू उत्पादक फिर से आलू की लाभकारी खेती कर सकें तथा राज्य हिमाचल प्रदेश की तरह आलू बीज उत्पादक राज्य बन सके।
विभाग की नर्सरियों में से अधिकांश में बीज उत्पादन नहीं अथवा बेहद कम हो रहा है। नई उद्यानिकी नीति बनाई जा रही है, जिसमें विभागीय नर्सरी में कार्मिकों की जवाबदेही तय होगी। बंजर पड़ीं नर्सरियों की उपजाऊ भूमि प्रदेश में उद्यान विभाग की 93 नर्सरियां हैं, जबकि कुमाऊं में इनकी संख्या 49 हैं।
कुमाऊं में करीब 30 नर्सरियों में ही उत्पादन हो रहा हैए वह भी बेहद कम। अन्य नर्सरियां बंजर पड़ी हैं। इन नर्सरियों की हजारों एकड़ उपजाऊ भूमि की सुध लेने वाला कोई नहीं है। निदेशक उद्यान आरसी श्रीवास्तव ने माना कि मैन पावर व बजट की कमी भी इसकी प्रमुख वजह है। उन्होंने कहा कि जल्द नर्सरियों की दशा सुधारी जाएगी। 275 क्विंटल आलू बीज का आवंटन जिला उद्यान अधिकारी के अनुसारए मदकोट से 275 क्विंटल आलू बीज की खेप पहुंच चुकी है। जिले में 30 उद्यान सचल दलों के माध्यम से आलू बीज वितरण 32 रुपये प्रतिकिलो की दर से उपलब्ध कराया जाएगा। उन्होंने कहा कि जैसे.जैसे काश्तकारों की डिमांड बढ़ेगी और बीज मंगाए जाएंगे। उद्यान विभाग के स्तर पर कोई ठोस प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। दिल्ली मंडी में नैनीताल के स्वादिष्ट आलू की मांग सबसे ज्यादा रहती है। ऐसे में कम उत्पादन हुआ तो इस बार सप्लाई काफी कम रहेगी। हजारों एकड़ उपजाऊ भूमि की सुध लेने वाला कोई नहीं है। उत्पादकों के लिए के कारण अलाभ कारी लगने लगी हैं।

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