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यूरोप के लोगों को भा रही उत्तराखण्ड की राजमा

11/11/20
in उत्तराखंड, चमोली
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
राजमा किडनी बीन्स उष्ण कटिबंधी अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका के भागों में यह एक महत्वपूर्ण दलहनी फसल है। इसे उष्ण कटिबंधी भारत तथा एशिया के अन्य देशों में भी उगाया जाता है। भारत में इसे उत्तराखण्ड के पर्वतीय भागों, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक के कुछ भाग तथा तमिलनाडु व आन्ध्रप्रदेश में उगाया जाता है। इसके सूखे दानों को दाल के रूप में तथा तल कर खाया जाता है। हरी फलियों को सब्जी के रूप में खाया जाता है। इसमें प्रोटीन की मात्रा 21 प्रतिशत होता है। राजमा का कुल नाम लैगुमिनोसी तथा उपकुल पेपिलियोनेसी है। इसके पौधे सहारे से चढ़ने वाले बेल तथा झाड़ीनुमा होते है। जिसमें अच्छी तरह विकसित मूसला जड़ होती है। पुष्पक्रम एक कक्षीय.असीमाक्ष होता है, जिसमें अनेक पुष्प होते है।
बीज का आकार अधिकतर आयताकार या गुर्दे के आकार का होता है। अंकुरण ऊपरिभूमिक होता है। उत्तराखण्ड के बहुमूल्य उत्पादों की श्रृंखला में विश्वभर में परिचय का मोहताज तो नहीं है मगर उत्तराखण्ड की विशेषता के साथ शायद इसके परिचय की आवश्यकता है। पूरे विश्व में सिर्फ अंटार्टिका को छोडकर लगभग सभी जगह राज़मा का उत्पादन किया जाता है तथा ब्राजील तथा भारत विश्व में राजमा के सबसे बडे उत्पादक देश है। राज़मा का वैज्ञानिक नाम फैजियोलस बल्गेरिस है, जिसका वानस्पतिक अध्ययन फेबेसी कुल में किया जाता है। राज़मा को इसके अलावा किडनी बीन, रेड बीन तथा कॉमन बीन नाम से भी जाना जाता है। सम्पूर्ण विश्व में राज़मा के उत्पादन का इतिहास बहुत पुराना तथा विस्तृत है। समुद्र तल से 3000 मीटर तक की ऊॅचाई पर उगायी जाने वाली राज़मा का विभिन्न भौगोलिक परिस्थिति के साथ.साथ विशेषताऐं भी बदल जाती है।
उत्तराखण्ड में राज़मा की लगभग 20 से भी अधिक किस्में उगायी जाती हैं जो कि राज्य के अलग.अलग स्थानों में होने के कारण भिन्न हैं। उत्तराखण्ड के हर्षिल, पुरोला, चम्बा, धारचूला, पिथौरागढ, द्वाराहाट, तपोवन, रामगढ, चकराता, लोहाघाट, बैरीनाग, दूनागिरी, मुनस्यारी, मोरी, जोशीमठ, चमोली तथा रूद्रप्रयाग आदि स्थानों पर राजमा का मुख्य रूप से उत्पादन किया जाता है। प्रदेश में राज़मा स्थानीय लागों के आर्थिकी का एक बेहतर विकल्प है, जिसकी स्थानीय बाजार में 200 से 250 रूपये प्रति किलो तक की कीमत आसानी से मिल जाती है।
राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय खाद्यानों में उत्तराखण्ड की पहाड़ी राजमा की बेहद मांग है, जिनमें हर्षिल, पुरोला, चकराता तथा मुनस्यारी आदि की राजमा प्रमुख रूप हैं। राजमा प्रोटीन का दूसरा तथा कैलोरी का तीसरा सबसे बेहतर स्त्रोत है। राज़मा में समान्यतः 346 किलो कैलोरी, 22.9ः प्रोटीन, 1.3ः वसा, 60.6ः कार्बोहाइड्रेट्स, 260 मिग्रा0 कैल्शियम, 410 मिग्रा0 फॉस्फोरस, 43.2 मिग्रा0 सोडियम, 1160 मिग्रा0 पोटेशियम, 183 मिग्रा0 मैग्नीशियम, 6.6 मिग्रा0 आयरन, 0.61 मिग्रा0 कॉपर, 166 मिग्रा0 सल्फर, 1.4 मिग्रा आयोडीन तथा 1.8 मिग्रा0 मैग्नीशियम प्रति 100 ग्राम तक पाये जाते है।विश्वभर में राज़मा की मांग तथा भारत द्वारा करायी जाने वाली आपूर्ति को देखते हुए उत्तराखण्ड में भी राजमा के उत्पादन पर विशेष ध्यान देने तथा प्रदेश में उगायी जाने वाली राज़मा की विशेषताओं को मद्देनजर रखते हुए विश्व पटल पर अपनी पृथक पहचान दिलाने की दिशा में काम किये जाने की आवश्यकता है। जिससे कि प्रदेश तथा स्थानीयों की आर्थिकी को अधिक सुदृढ एवं समृद्ध बनाया जा सके। उत्तराखंड राजमा की सौ से अधिक किस्मों का घर हैए जो सीमांत किसानों द्वारा नकदी फसल के रूप में राज्य भर में बड़े पैमाने पर उगाया जाता है।
किसी भी रासायनिक या कीटनाशक से मुक्त, मुनस्यारी राजमा का नाम मुनस्यारी से लिया गया है. जोहार घाटी के प्रवेश द्वार पर स्थित 7,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। विटामिन और अन्य खनिजों से भरपूर, मुनस्यारी राजमा प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट का एक अच्छा स्रोत है। अपने अद्वितीय और सूक्ष्म स्वाद, उच्च फाइबर सामग्री और रंग के कारण, यह राजमा सभी उम्र में पसंदीदा है। राजमा स्वाद तक ही सीमित नहीं है क्योंकि यह कई बीमारियों का इलाज करने में भी मदद कर सकता है राजमा में कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं जो हड्डियों को मजबूत करने में काफी मदद करते हैं।
राजमा खाने के तरीके को सही से अपने दैनिक जीवन में शामिल किया जाए तो यह हड्डियों के लिए बहुत लाभकारी सिद्ध होगा। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से काफी हद तक बचाने में भी राजमा का सेवन सहयोगी माना जा सकता है क्योंकि इससे शरीर के अंदर बायोएक्टिव यौगिक की पूर्ति होती है जो कैंसर से बचाने में मदद करता है। अगर राजमा के साथ एंटीऑक्सीडेंट युक्त अन्य कोई खाद्य पदार्थ लिया जाए तो यह शरीर में होने वाली ऑक्सीडेशन की प्रक्रिया को कम कर देता है जिससे कैंसर जैसे बीमारी को धीरे.धीरे कम करने में काफी मदद मिलती है। अगर ब्लड प्रेशर संतुलित न हो तो इससे शरीर के तंत्र बेहद प्रभावित होते हैं। सबसे ज्यादा इसका प्रभाव हृदय पर पड़ता है क्योंकि इससे हृदय की कार्यप्रणाली पर असर पड़ता है। ब्लड प्रेशर को संतुलित रखने के लिए कम फैट वाले आहार का सेवन करना चाहिए। इसके लिए आप अपनी डाइट में राजमा को शामिल कर सकते हैं क्योंकि इसमें फाइबर की मात्रा अधिक होती है जो फैट को कम करता है।
अपने स्वाद के लिए पूरे उत्तर भारत में मशहूर मुनस्यारी का राजमा यूरोप के सैलानियों को भी खूब पसंद आ रही है। तहसील मुख्यालय में पहुंचने लगी राजमा को विदेशी सैलानी हाथों हाथ ले रहे हैं। डब्लू जार ने तीन किलो राजमा खरीदी। सात हजार फिट से अधिक ऊंचाई वाले गांव क्वीरीजिमयांए साईपोलूए ल्वांए बोनाए तोमिक आदि गांवों में पैदा होने वाली राजमा अपने स्वाद के चलते विशेष पहचान रखती है। मैदानी क्षेत्रों में पैदा होने वाली राजमा से आकार में कुछ बड़ी सीमांत की राजमा पूरी तरह जैविक तरीके से उत्पादित की जाती है। इसके उत्पादन में किसी तरह की रासायनिक खाद का उपयोग नहीं होता है। हिमालयी क्षेत्र में उत्पादित यह राजमा पौष्टिक गुणों से भरपूर है। इन्हीं गुणों के चलते पूरे उत्तर भारत में इसकी मांग है, हालांकि मांग की तुलना में उत्पादन सीमित है। इसके चलते मुनस्यारी और पिथौरागढ़ के बाजारों तक ही यह पहुंच पाती है। मुनस्यारी के लोग अपने उत्तर भारत के विभिन्न इलाकों मे रहने वाले अपने नाते रिश्तेदारों और परिचितों को राजमा उपलब्ध कराते हैं।
राजमा भी पहाड़ में अलग.अलग रंग व स्वाद वाली होती जो जल्दी ही गल भी जाती। मुनस्यारी की राजमा चितकबरी होती तो धारचूला की लाल रंगवाली जो पकाने में खूब लाली छोड़ती, कुमाऊं गढ़वाल के हर पहाड़ी इलाके की सीमी अलग.अलग होती स्वाद मेंण् उत्तरकाशी जौनसार में चट्ट सुफेद मखनी राजमा उगती जो लोग हाथों.हाथ लेते पर जरा मुश्किल से ही बाजार में मिल पाती। ऐसे ही राजमा की दगडुआ पर कई कई रंगों वाली और चितकबरी छोटी बड़ी नौ रतनिया भी सुवाद में अलग ही होती। बहुत मसालों का ढेर मिलाये बिना ये खूब ताकत भी देतीं और भात के साथ सपोड़ने में खूब खायी जातीं। यमुना .टोंस उपत्यका की सीमी भी खूब प्रसिद्ध हुई। इस इलाके में सुबह नकूल या नाश्ता किया जाता जिसमें रात के बचे खाने का भी प्रयोग होता। उबले गहत को पीस कर उनसे भरी रोटीए कच्चे आलुओं को कूट कर उनकी थेचवाणी और कोदों की रोटी बहुत ही स्वाद बनतीण् उत्तराखंड की संस्कृति और परंपराएं आपको अच्छी लगती हैंघ् यहां का खान.पान और खासकर दालें भी आपको पसंद होंगी। यहां के खान.पान में विविधता का समावेश है। पौष्टिक तत्वों से भरपूर उत्तराखंडी खान.पान में विशेष तौर पर मोटी दालों को विशेष स्थान मिला हुआ है। कारोबारियों के अनुसार बाजार में राजमा की 80 फीसदी आपूर्ति चीन पर निर्भर है। इसके अलावा तुर्की से राजमा की आपूर्ति होती है लेकिन इस साल वहां फसल अच्छी नहीं होने से आयात कम हो पाया है।
चीन में कोरोना वायरस का मामला सामने नहीं आया था, फुटकर बाजार में चीन का राजमा 100 रुपये प्रति किलो बिक रहा था। अब इसके दाम बढ़कर 130.140 रुपये तक पहुंच गए हैं। इसी तरह थोक बाजार में 90 रुपये प्रतिकिलो के दाम बढ़कर 115 से 120 रुपये तक हो गए हैं।फुटकर बाजार में भद्रवाह और डोडा का राजमा 150.160 रुपये प्रतिकिलो मिल रहा है। बाजार में ग्राहकों को चीन का राजमा पुराने स्टॉक से ही मिल पा रहा है। कोरोना वायरस के चलते चीन से पिछले एक माह में राजमा की नई आपूर्ति नहीं हुई है। थोक कारोबारियों का कहना है कि अगर अगले कुछ महीने तक कोरोना वायरस का खौफ इसी तरह बरकरार रहता है तो स्थानीय बाजार में राजमा के दाम आसमान छूने लगेंगे। ग्राहकों की मांग पर स्टाक में उपलब्ध चीन का राजमा उपलब्ध करवाया जा रहा है। बाजार में स्थानीय राजमा की 20 फीसदी तक ही उपलब्धता होती हैए जबकि एक बड़ा हिस्सा चीन से आयात होता है। थोक बाजार में प्रमुख दालों के दामों में 25 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई है। लेकिन फुटकर बाजार में 10 फीसदी के करीब गिरावट आने से रेट पर इतना ज्यादा असर दिखाई नहीं दे रहा। दरअसल पिछले कुछ समय से दालों के रेट में बढ़ोतरी होती जा रही थी। अब दालों की नई फसल आने वाली है। वहीं, थोक बाजार में रेट गिरने से किसान चिंतित हैं। उत्तराखंड 9 नवंबर को अपनी उत्तराखंड राज्य के 21वें वर्षगांठ स्थापना दिवस के मनाने है लेकिन राज्य आंदोलनकारियों का सपना आज भी अधूरा है। राज्य आंदोलनकारियों का मानना है कि जिस मकसद को लेकर उत्तराखंड का गठन किया गया था, वो आज भी पूरा नहीं हो पाया है। पहाड़ों से युवा लगातार पलायन कर रहे हैं। कहीं न कहीं इस पलायन के लिए पहाड़ के नेता जिम्मेदार हैं, क्योंकि राजनेता ही पलायन कर मैदान पहुंच रहे हैं। प्रदेश सरकार राज्य के 20वें स्थापना दिवस के मौके पर कार्यक्रम का आयोजन कर रही है। ये कार्यक्रम मुख्य रूप से सैनिकोंए महिलाओं, युवाओं पर केंद्रित हैं पर किसान के लिए गंभीर नहीं है। कुल मिलाकर अभी यह कहना जल्दबाजी होगा कि उत्तराखंड के लिए उसके निर्माण के 21वें साल में 2 लाख से अधिक प्रवासी नई इबारत लिख सकते हैं।

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