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लोहाघाट में बनी लोहे की कड़ाहियों का जवाब नहीं

10/11/20
in उत्तराखंड, चम्पावत
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
चंपावत जिले में लोहावती नदी के किनारे स्थित है और यह मंदिरों के लिए खासा मशहूर है। इस जगह से जुड़ी कुछ धार्मिक और ऐतिहासिक मान्यताएं हैं एक चीनी व्यापारी ने इस शहर के बारे में कहा था कि धरती पर स्वर्ग कश्मीर में नहीं बल्कि लोहाघाट में बसता है। लोहावती नदी के किनारे बसा लोहाघाट एक ऐतिहासिक शहर है। यहां की सुंदरता से मुग्ध होकर पीण् बैरन ने इसे कश्मीर के बाद धरती के दूसरे स्वर्ग का खिताब दे दिया। लोहाघाट चंपावत जिले का नगर पंचायत है। पर्यटक यहां के कई पुराने मंदिरों का भ्रमण कर सकते हैं, जो कि हिन्दू धर्म के विभिन्न त्योहारों को मनाने के लिए जाने जाते हैं।
होली और जनमाष्टमी के दिन यहां भारी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं। पर्यटक चाहें तो यहां के खादी बाजार से खरीदारी कर सकते हैं और यहां पास में ही स्थित खूबसूरत गलचौरा का भ्रमण भी करते हैं। बाजारों आधुनिक किस्म के चमकते दमकते बर्तन भी लोहाघाट की लोहे की कड़ाही तथा अन्य वस्तुओं को आज तक पछाड़ नहीं सके हैं। आजादी से पहले तक लोहाघाट के मंगलेख गांव में लोहे की खान से कच्चा माल मंगाया जाता था लेकिन अब कानपुर से लोहा मंगाकर बर्तन तैयार किए जाते हैं।नुमाईश बाजार में वर्षों से लोहाघाट के लौह शिल्पी दुकानें सजाते हैं।
उत्तरायणी के बाद भी कई दिना तक उनकी दुकानें लगी रहती हैं। लोहाघाट के निवासी के अनुसार उनके पूर्वज पिछले चार सौ सालों से इस व्यवसाय के साथ जुड़े रहे हैं। हर साल उत्तरायणी पर लोहे के बर्तन तथा अन्य चीजें बनाकर यहां लाते हैं। वहां निर्मित वस्तुओं में सर्वाधिक मांग कड़ाही की है। मेले में आने वाले लोग वजनदार कड़ाहियां खरीदकर ले जाते हैं। इसके अलावा कुल्हाड़ी, बसूला, तवा, पलटे, डाड़ू, चिमटे, दराती, छलनी, सग्गड़ आदि भी बेचे जाते हैं। शिल्पियों के अनुसार वहां मंगलेख गांव में लोहे की खान थी। यहां लोहा निकालकर मिट्टी के साथ पकाया जाता था। स्थानीय लोग ही प्र्रसंस्करण करते थे और इसी लोहे से शिल्पकार बर्तन बनाते थे।
असली लौह तत्वों से युक्त कड़ाहियों को भोजन पकाने के लिए काफी उपयुक्त माना जाता है। लोहे को पकाने वालों ने आजादी के बाद पेशा छोड़ दिया। वक्त के साथ प्रसंस्करण तकनीक लुप्त हो गई। सरकार ने भी संरक्षण के लिए कुछ नहीं किया। सेला लोहाघाट निवासी जगदीश चंद्र ने बताया कि अब कानपुर से लोहा मंगाया जाता है और लोहाघाट में 15 इकाइयों में बर्तनों का निर्माण होता है। उत्तरायणी मेले में लोहाघाट वासियों की लगभग 10 दुकानें लगी हैं। प्रत्येक दुकान में लगभग 50 हजार की बिक्री होती है। आधुनिक चीजों के आकर्षण के बावजूद खास तौर पर लोग पहाड़ी पकवाना के लिए ये कड़ाहियां खरीदकर ले जाते हैं। पहाड़ छोड़कर मैदानों में बस चुके प्रवासियों में इसके प्रति विशेष लगाव है। अमित कुमार लोहाघाट में बने लोेहे बर्तनों को नई पहचान दे रहे हैं। अब वह लोहे के बर्तनों की ढलाई का कार्य मशीनों के माध्यम से कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने शासन प्रशासन के सहयोग से ग्रोथ सेंटर स्थापित किया है।
अब वह अपने पुश्तैनी लोहार के काम को एक नई पहचान देने में जुटे हुए हैं। अमित ने लोहाघाट के लौह उत्पादों को स्थानीय मेलों के बाजार से दिल्ली के प्रगति मैदान, मुंबई के कौतिक तथा ऑनलाइन बाजार ऐमेज़ॉन तक पहुंचा दिया है। जहां आज क्षेत्र के नवयुवक अपने पथ से भ्रमित हो कर अपना समय बर्बाद कर रहे हैं, वहीं अमित कई स्वयं सहायता समूहों एवं बेरोजगारों का मार्गदर्शन कर उन्हें आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने में सहायता कर रहे हैं। अपने लौह उत्पादों को राइकोट कुंवर के आफर से मुख्यमंत्री के हाथों तक पहुंचाने तथा लोहाघाट में ग्रोथ सेंटर निर्माण करने की फाइल को स्वीकृत करवाने के लिए जिस लगन और आत्मविश्वास की जरूरत होती है, वह अमित के चेहरे की खुशी में साफ झलकती है।
अमित कुमार ने बताया कि वह मशीनों से सिर्फ बर्तनों की कटिंग और मोल्डिंग का कार्य कर रहे हैं। बर्तनों की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए उसे पीटने का कार्य परंपरागत तरीके से ही कर रहे हैं। अमित ने बताया कि पहले ढलाई का कार्य लोहे को घन से पीट कर की जाती थीए जिसमें काफी श्रम व समय लगता था। अब मशीन से ढलाई करने में वक्त भी बचता है और शारीरिक श्रम भी। उन्होंने बताया कि अब वह लोहे के फ्राइंगपैन भी बना रहे हैं। इतना ही इंडेक्शन के प्रयोग के लिए भी लोहे की कढ़ाई आदि बर्तन बना रहे हैं। अमित कुमार ने बताया कि देश के विभिन्न शहरों में उन्होंने स्टॉल लगाए। लोगों को लोहे के बर्तनों के उपयोग का फायदा बताया। आज उनके पास इतनी डिमांड है कि वह उसे पूरा नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने बताया कि पहले जहां एक दिन में तीन-चार कढ़ाइयां तैयार हो पाती थींए अब मशीन की मदद से एक दिन में 60-70 कढ़ाइयां तैयार हो जाती हैं। आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में अनुकरणीय कार्य किया है। उनसे सीख लेकर अन्य क्षेत्रों के युवा भी अपने पारंपरिक कार्यों को आधुनिकता से जोड़ते हुए आत्मनिर्भर बन सकते हैं। लोहाघाट का लोहा अब धीरे.धीरे लोगों को भाने लगा है, उत्तराखण्ड राज्य के खुबसूरत जिला चम्पावत के विकासखण्ड लोहाघाट व उसके आस.पास का क्षेत्र प्राचीन समय से लौह नगरी के रूप में जाना जाता है।
मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत की महत्वकांशी ग्रोथ सेंटर योजना के अन्तर्गत लोहाघाट में ग्रोथ सेंटर का कार्य पूरा हो गया है। जिसके बाद अब यहां पर लोहे से बना हुआ सामान आसानी के साथ आम लोगों तक पहुंच रहा है। यह जानकारी देते हुए एपीडी विमी जोशी ने बताया कि ग्रोथ सेंटर में विभिन्न प्रकार की विद्युत चलित मशीने स्थापित की गयी है। जिसमें आधुनिक तरीके से विभिन्न प्रकार के उत्पाद कढ़ाई, फ्राईपेन, तवा आदि गुणवत्ता के साथ बनाये जा रहे है। उन्होंने बताया कि विद्युत चलित मशिनों से समय के साथ.साथ श्रम में भी कमी आ रही है। पहले एक उत्पाद बनाने में लगभग 02 से 03 घण्टे का समय लगता था जो अब घटकर 10 से 15 मिनट हो गये है। साथ ही उन्होंने बताया कि ग्रोथ सेंटर में उत्पादित उत्पादों के परम्परागत स्वरूप से छेड़छाड़ किये बिना उनकी फिनिशिंग में स्पष्ट अंतर दृष्टिगोचर हो रहा है। एक वक्त था जब लोहे की कढ़ाई हर रसोई की शान थी। इनमें बना हर प्रकार का भोजन स्वाद और गुणों में अव्वल माना जाता है। आज लोग एलुमिनियम और नॉन स्टिक बर्तनों का अधिक प्रयोग करने लगे हैं जो स्वास्थ्य के लिए घातक माने जाते हैं।
चम्पावत के लोहाघाट में पारम्परिक रूप से बनी कढ़ाई बहुत प्रसिद्ध हैं। इन्हें अच्छी गुणवत्ता के लोहे से बनाया जाता है। आधुनिक युग में जहां सब कुछ आधुनिक हो गया। लेकिन आज भी पुरानी परंपराओं और प्राचीन वस्तुओं का अपना ही अलग महत्व है। मेले में आज भी सिल बट्टा बनाने वाले कारीगर रोजी रोटी कमाने के लिए पत्थर को तराश कर उन्हें नया रुप देने में लगे हैं। इस उम्मीद के साथ कि उधोग पहाड़ तक जरूर चढ़े। पहाड़ का पानी और जवानी अब सिर्फ जुमला बन कर ना रहे हकीकत में इसमे अब अमल हो यही उम्मीद की सरकार से है। आज उत्तराखंड राज्य को बने 21 बरस पूरे हो गए। जब 9 नवम्बर, 2000 को भारत के मानचित्र पर 27वें राज्य के रूप में उत्तराखंड का उदय हुआ था तो हर किसी के दिलोदिमाग में था कि अब हमारा और हमारे प्रदेश का एक सुंदर भविष्य होगा। पर उस समय यह कल्पना किसी ने भी नहीं की होगी कि उनका यह सपना सिर्फ सपना ही रहेगाए हकीकत में कभी नहीं तब्दील होगा। आम और खास हर किसी ने यही सोचा था कि अब अलग प्रदेश बनने के बाद यहाँ के लोगों का समुचित विकास हो सकेगा। लोहे को पकाने वालों ने आजादी के बाद पेशा छोड़ दिया। वक्त के साथ प्रसंस्करण तकनीक लुप्त हो गई। सरकार ने भी संरक्षण के लिए किसी ने ये नहीं सोचा था कि राज्य का विकास राजनीति की उठापटक की भेंट चढ़ जाएगा।

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