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सिनेमाघरों में धूम मचा रही फिल्म ‘धरती म्यर कुमाऊं की’

03/12/24
in उत्तराखंड, देहरादून, मनोरंजन, संस्कृति
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सिनेमाघरों में धूम मचा रही फिल्म ‘धरती म्यर कुमाऊं की’
डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
अपने खूबसूरत प्राकृतिक नजारों से सैलानियों को लुभाते पहाड़ों की पीड़ा भी पहाड़ जैसी है। नये जमाने की सुविधाओं से दूर और निरंतर प्राकृतिक आपदाओं की मार झेलते पहाड़ों में अब लोगों को अपनी जड़ों से उखड़ने को विवश कर दिया है।पलायन का पहाड़ से बहुत पुराना रिश्ता रहा है। पुराने समय से ही यहां के लोग रोजगार की तलाश में मैदानी शहरों की ओर रूख करते रहे हैं लेकिन उस समय अपने गांव व माटी से उनका रिश्ता जुड़ा रहता था। नौकरी पूरी करने के बाद वे अपने घर वापिस लौट आया करते थे। पिछले कुछ दशकों से शिक्षा के प्रचार-प्रसार और संचार के साधनों की पहुंच ने नई पीढ़ी को आधुनिक जीवन शैली की ओर आकर्षित किया है जिसके चलते पहाड़ के आबाद गंाव वीरान हो गए हैं। पहाड़ के अधिकतर युवा जिन शहरों में नौकरी करते हैं, वहीं के होकर रह गये। बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा व चिकित्सा तथा रोजगार की सुविधाओं के अभाव में पहाड़ से पलायन लगातार बढ़ता गया। भौतिकवाद और बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं ने पलायन की गति को और अधिक तेजी प्रदान की है।पहाड़ में तकरीबन 90 फीसदी युवा इंटर पास हैं, इससे आगे की पढ़ाई व व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए उनके पास संसाधनों का अभाव है। कमजोर आर्थिक कारणों के चलते कुछ युवा सेना में भर्ती हो जाते हैं और बाकी रोजगार की खातिर निराशा की स्थिति में महानगरों व शहरों की ओर निकल पड़ते हैं। पहाड़ और अपने गांव में रहकर बकरी चराना या खेतों में हल लगाना इन्हें रास नहीं आता है। इन युवाओं को होटलों, दुकानों व माॅल में छोटीमोटी नौकरी करते हुए देखा जा सकता है। स्मार्ट टीवी, स्मार्ट फोन और ब्रांडेड कपड़ों के इस युग में पहाड़ का युवा भी कहीं खो गया है। एक बार गांव से निकलने के बाद दोबारा लौटने का उनका मन ही नहीं करता। सरकारों की उदासीनता के चलते कहीं न कहीं उनकों भी लगता है कि पहाड़ में रहकर भविष्य के सपने नहीं बुने जा सकते हैं। पहाड़ की पीड़ा और समस्याओं पर बनी फिल्म ‘धरती म्यर कुमाऊं की’ इन दोनों उत्तराखंड के सिनेमाघरों में धूम मचा रही है. फिल्म के डायरेक्टर हल्द्वानी पहुंचे, जहां हल्दूचौड़ स्थित मल्टीप्लेक्स सिनेमा घर में मीडिया से बात करते हुए कहा कि उनकी ये फिल्म पहाड़ की समस्याओं पर आधारित है. फिल्म रोजगार व स्वास्थ्य समस्याओं को उजागर करती है फिल्म ‘धरती म्यर कुमाऊं की’ में पहाड़ की स्वास्थ्य सेवाओं खासकर महिलाओं को प्रसव के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क की व्यवस्था ना होने के कारण लाने लेजाने में आने वाली समस्या को उजागर किया गया है. वहीं दर्शक भी इस फिल्म को काफी पसंद कर रहे हैं और फिल्म की कहानी से काफी शिक्षाप्रद जानकारी दी गई है. पूरी फिल्म कुमाऊंनी भाषा में बनाई गई है. देवभूमि फिल्मस प्रोडक्शन के बैनर तले फिल्म को बनाया गया है. कुमाऊंनी फिल्म ‘धरती म्यर कुमाऊं की’ की पटकथा काफी अच्छी है. फिल्म ‘धरती म्यर कुमाऊं की’ में पहाड़ की स्वास्थ्य सेवाओं खासकर महिलाओं को प्रसव के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क की व्यवस्था ना होने के कारण लाने लेजाने में आने वाली समस्या को उजागर किया गया है. वहीं दर्शक भी इस फिल्म को काफी पसंद कर रहे हैं और फिल्म की कहानी से काफी शिक्षाप्रद जानकारी दी गई है. पूरी फिल्म कुमाऊंनी भाषा में बनाई गई है. देवभूमि फिल्मस प्रोडक्शन के बैनर तले फिल्म को बनाया गया है. कुमाऊंनी फिल्म ‘धरती म्यर कुमाऊं की’ की पटकथा काफी अच्छी है. रोजी रोटी’ गीत में ‘पहाड़ में पलायन का सवाल’ या ‘पहाड़ से पलायन का सवाल’  ही केन्द्रीय विषयवस्तु है और ये उन  निर्णायक सवालों में से एक है जो पहाड़ के सामाजिक जनजीवन को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं। पलायन पहाड़ के रहवासियों के लिए एक निजी भावनात्मक और मानवीय सवाल तो है ही, साथ ही पलायन ही (रिवर्स पलायन और प्रवासियों /‘बाहरी’ लोगों का आगमन भी) यहां की जनांकिकीय सामाजिकता राजनीति और संस्कृति को भी गहरे प्रभावित करता है। ये उन चंद सवालों में से एक है जिन पर सबसे अधिक चर्चा बहस बातचीत विमर्श बौद्धिक सांस्कृतिक सक्रियतायें अक्सर अलग-अलग प्लेटफार्म्स पर दिखाई दे जाती हैं। आप अगर पहाड़ आधारित यूट्यूब चैनल या वेब पोर्टल ही देख लें पलायन के सवाल से संबंधित तो काफी सारी सामग्री आपको मिल जाएगी। मुख्य धारा के मीडिया संस्थानों में भी पहाड़ के कई गांव के पूरी तरह खाली हो जाने की रिपोर्ट्स मिल जाएंगी।सरकारों से लेकर असल सरोकार रखने वाले प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं तक, NGO’s से लेकर राजनीतिक संगठनों तक सरकारी महकमों से लेकर धार्मिक संगठनों तक, पलायन वह मुद्दा है जिससे पहाड़ का कोई भी सार्वजनिक मंच अछूता नहीं रहा है। पलायन पर आपको गंभीर शोध पत्र भी मिल जाएंगे तो अक्सर होने वाली ऐसी गहरी उथली बहसों से भी सामना होगा। जिनमें  सरकारों और सिस्टम को दोष देने के साथ-साथ स्थानीयता के संकीर्णता की सीमा तक पहुंचे असंतुलित आग्रह और पहाड़ में आने वाले ‘बाहरी’ लोगों के प्रति पर्याप्त कटुता दिखाई देगी। और स्वभाविक ही है कि साहित्य की दुनिया में भी पलायन का विमर्श उचित जगह घेरता है।लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं।लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।

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