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आधुनिकता की चपेट में अल्मोड़ा का तांबा उद्योग, कहीं इतिहास न बन जाए

27/10/21
in उत्तराखंड
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला:

जब मनुष्य ने पत्थरों के उपकरणों के स्थान पर तांबे से उपकरण और हथियार आदि बनाने शुरू किए। अस्सी के दशक, उसके बाद कुमाऊं के कई इलाकों में ताम्र संचय युगीन संस्कृति वाले तांबे की बनी मानव आकृतियां, अन्य उपकरण मिले। अंग्रेजों के शासन से पहले चंद, गोरखा शासन के दौरान कुमाऊं के तमाम इलाकों में तांबे का अच्छा खासा कारोबार था। कुछ इलाकों में तांबे की खानें भी थी, लेकिन अब यह उद्योग समाप्त हो गया है।

देश में ताम्र युगीन उपकरण 1822 से प्रकाश में आते रहे हैं, लेकिन सबसे पहले इस ओर 1905, 1907 में आगरा के अवध प्रांत में तैनात जिला मजिस्ट्रेट विसेंट स्मिथ ने ध्यान दिया। उस दौर में मिले ताम्र उपकरणों को सूचीबद्ध करते हुए उन्होंने सबसे ताम्रयुग की कल्पना की थी। विशेषज्ञों ने शुरू में यह अनुमान लगाया कि ताम्रयुगीन संस्कृति तत्कालीन अविभाजित उप्र में सिर्फ सहारनपुर, बिजनौर, मुरादाबाद, बदायूं आदि इलाकों तक ही सीमित थी।

पुराविद कौशल सक्सेना के  मुताबिक 1986 में ताम्र संस्कृति का पहला उपकरण हल्द्वानी में प्राप्त हुआ।यह मानव आकृति के रूप में बना था। इसके बाद पिथौरागढ़ जिले के बनकोट, नैनीपातल में भी कुछ ताम्र संचय संस्कृति के उपकरण मिले। अब तक कुल 14 ताम्र मानव आकृतियां मिल चुकी हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक कुमाऊं में मिले यह उपकरण 15वीं सदी ईसा पूर्व के माने जाते हैं।

इस आधार पर यह ताम्र मानव आकृतियां, उपकरण करीब साढ़े तीन हजार साल पुराने माने जाते हैं।इनमें कुछ उपकरण पीटकर बनाए हुए और कुछ सांचे के बने हैं। उल्लेखनीय है कि कुमाऊं की खरई पट्टी (अब जिला बागेश्वर), सल्ला कफड़खान, राईआगर, बोरा आगर, अस्कोट, रामगढ़ आदि इलाकों में तांबे की खानें थी। चंद और गोरखा शासनकाल तक तांबे की खानों से तांबे का दोहन होता रहा, लेकिन अंग्रेजों ने अपने शासनकाल में तांबे की खानों पर रोक लगा दी।

प्राचीन काल से ही यहां रहने वाले ताम्र कारीगर तांबे के बर्तन आदि बनाने में काफी पारंगत रहे हैं। तांबे की खानें बंद होने के बावजूद अल्मोड़ा में हाल के बरसों तक तांबे के बर्तन बनाने का कारोबार अच्छा खासा चलता थाचंद शासनकाल में सिक्कों की ढलाई से लेकर मौजूदा पारंपरिक तांबे के बर्तनों तक का अल्मोड़ा का सफर बेहद समृद्ध रहा। चंद वंश की राजधानी में हुनरमंद तामता बिरादरी की टकसाल ने तमाम उतार चढ़ाव देखे।

वक्त के साथ ताम्र शिल्पियों की हस्तकला पर मशीनीयुग की काली छाया क्या पड़ी, बुलंदियों पर रही ताम्रनगरी धीरे-धीरे उपेक्षा से बेजार होती चली गई। अब पर्वतीय राज्य के जिन सात उत्पादों को जीआइ टैग मिला है, उनमें यहां के तांबे से बने उत्पाद भी शामिल हैं। वैसे तो घरेलू बर्तन मसलन फौला, तौला के साथ धार्मिक आयोजनों में प्रयुक्त होने वाले पंचधारा, मंगल परात, गगार, कलश ने अल्मोड़ा को देश-विदेश तक पहचान दिलाई है।

ताम्र नगरी का इतिहास करीब 500 वर्ष पुराना है। धरती के गर्भ में ताम्र धातु की पहचान व गुणवत्ता परखने में माहिर तामता परिवार तब चंद राजाओं के दरबार में खास अहमियत रखता था। चम्पावत से अल्मोड़ा में राजधानी बनाने के बाद यहां तामता (टम्टा) परिवारों की टकसाल बनी। पाटिया (चम्पावत) से ये राज हस्तशिल्पी अल्मोड़ा में बसाए गए। तब ताम्रशिल्प को कुमाऊं के सबसे बड़े उद्योग का दर्जा मिला।

टकसाल में गृहस्थी के साथ पूजा व धार्मिक आयोजनों में प्रयुक्त होने वाले बर्तनों के साथ सिक्कों की ढलाई व मुहर भी बनाई जाती थी। पुरखों से विरासत में मिली ताम्रशिल्प को संजोए हस्तशिल्पी नवीन टम्टा कहते हैं, पूर्वज पहले झिरौली (बागेश्वर) की पहाड़ी से तांबा निकालते थे। चंद राजवंश के बाद ब्रितानी हुकूमत ने खान बंद करा दी। ब्रिटेन से तांबा मंगाया जाने लगा। इसके बाद सिक्कों की ढलाई बंद हो गई। आजादी के बाद ताम्रनगरी फिर बुलंदियों की ओर बढ़ी।

यहां के बने पराद (परात), गागर व कलश की भारी मांग रहती थी। मांगलिक व धार्मिक कार्यक्रमों के लिए फौले, गगरी, पंच एवं अघ्र्यपात्र, जलकुंडी ही नहीं शिव मंदिरों के लिए ताम्र निर्मित शक्ति की मांग अभी बरकरार है। पारंपरिक ठनक कारखानों की बजाय आधुनिक फैक्ट्रियों में मशीनों से ताम्र उत्पाद बनने लगे। इससे ताम्र नगरी की टकसाल संकट में पड़ गई।

हालांकि हरिद्वार महाकुंभ में तत्कालीन आइजी कुमाऊं संजय गुंज्याल की पहल पर यहां से अतिथियों के लिए 500 फौले, गागर व कलश बनवाए गए। बागेश्वर। जिले के खर्कटम्टा गांव को अतीत में ताम्रशिल्पियों के गांव के नाम से जाना जाना जाता था। तब खर्कटम्टा के साथ ही कई गांवों में ताम्रशिल्प का कार्य बहुतायत में किया जाता था। अब खर्कटम्टा गांव में मात्र तीन परिवार ताम्रशिल्प से जुड़े हैं।

ताम्रशिल्पी सरकारी उपेक्षा से बेहद खिन्न हैं।खर्कटम्टा गांव में आजादी के पहले से ताम्रकला का कार्य किया जाता रहा है। तब जोशीगांव, देवलधार, टम्ट्यूड़ा, बिलौना आदि गांवों में ताम्रशिल्पी तांबे से परंपरागत तरीके के दैनिक उपयोगी बर्तन गागर, तौले और धार्मिक आयोजनों में काम आने वाले बर्तनों के साथ ही वाद्ययंत्र तुरही, रणसिंघा, ढोल बनाते थे। इस काम में महिलाएं भी उनकी मदद करती थीं। तब ताम्रशिल्प को परंपरागत उद्यम माना जाता था।

आजादी के बाद यह उद्यम काफी फैला भी, लेकिन आधुनिकता की होड़ में यह बेजोड़ कला अब सिमट कर रह गई है। खर्कटम्टा गांव के अनुभवी शिल्प कारीगर सुंदर लाल को शिल्पकला के लिए उत्तराखंड सरकार के साथ ही उद्योग विभाग ने पूर्व में सम्मानित किया जा चुका है, लेकिन अब सुंदर लाल उपेक्षा से खिन्न हैं। कहते हैं कि सरकारी प्रोत्साहन न मिलने से यह कला अब विलुप्त होने को है। सरकार और जनप्रतिनिधियों को इस ओर ध्यान देना चाहिए।

खर्कटम्टा गांव में प्यारे लाल और किशोर कुमार के परिवार ने अभी इस शिल्पकला को संजो रखा है आधुनिकता से मुकाबला करने के लिए कुछ ताम्रशिल्पी पानी के फिल्टर, कलश, गुलदस्ते, शोपीस बनाने लगे हैं। अब भी ऐसे कई लोग हैं जो हाथ से बने तांबे के बर्तनों को ज्यादा तवज्जो देते हैं। हाथ से बने तांबे के बर्तन काफी मजबूत और शुद्धता लिए होते हैं। महाप्रबंधक, जिला उद्योग केंद्र बागेश्वर ताम्रशिल्पियों के लिए ग्रोथ सेंटर बनाने का प्रस्ताव बनाया जा रहा है। इन शिल्पियों को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाकर जरूरी मशीनें दिलाई जाएंगी।

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