डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
पूरे भारत और भारतीय संस्कृति को पश्चिमी देशों में पहचान दिलाई। उनका भाषण सुनने के बाद पूरी दुनिया भारत की कायल हई थी और तालियों की गड़गड़ाहट से उनका स्वागत हुआ थाजब भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा था, तब स्वामी विवेकानंद ने भारत की प्राचीन सभ्यता, संस्कृति, विरासत, अध्यात्म और वैभवशाली इतिहास को विदेशी धरती पर गर्व के साथ बताया। उनके संबोधन से तालियों की गड़गड़ाहट चहुंओर थी। स्वामी विवेकानंद ने शिकागो भाषण की शुरुआत इस प्रकार की थी- अमेरिका के प्यारे बहनों और भाइयोंआपके इस जोरदार और स्नेहपूर्ण स्वागत ने मेरा हृदय अपार हर्ष से भर दिया है। मैं आपको दुनिया में संतों की सबसे प्राचीन परंपरा की ओर से धन्यवाद देता हूं। मैं आपको सभी धर्मों की जननी की तरफ से धन्यवाद देता हूं और सभी जाति, संप्रदाय से आने वाले लाखों करोड़ों हिंदुओं की ओर से भी आपका आभार व्यक्त करना चाहता हूं। मेरा धन्यवाद कुछ उन वक्ताओं को भी है जिन्होंने इस मंच से यह कहा कि दुनिया में सहनशीलता का विचार सुदूर पूर्वी देशों से फैला है।हर साल 11 सितंबर को दिग्विजय दिवस मनाया जाता है। यह दिन भारत के स्वर्णिम इतिहास में अहम भूमिका निभाता है। विवेकानंद की विश्वविजयी यात्रा और उनके अद्वितीय योगदान की याद में यह दिन मनाया जाता है।हर साल 11 सितंबर को दिग्विजय दिवस मनाया जाता है। यह दिन भारत के स्वर्णिम इतिहास में अहम भूमिका निभाता है। दिग्विजय दिवस का इतिहास स्वामी विवेकानंद से है। विवेकानंद की विश्वविजयी यात्रा और उनके अद्वितीय योगदान की याद में यह दिन मनाया जाता है। दरअसल, 11 सितंबर 1893 को स्वामी विवेकानंद ने विश्व धर्म महासभा में ऐतिहासिक भाषण दिया था। जिसकी याद में दिग्विजय दिवस मनाया जाता है। 11 सितंबर 1893 को स्वामी विवेकानंद ने शिकागो की धर्म संसद में भाषण दिया था। यह भाषण देश, धर्म, विचारधारा और राजनीति की सीमाओं से परे थे। क्योंकि यह सभी के लिए सार्वभौमिक था। यह सिर्फ उनके जादुई शब्द नहीं थे, बल्कि यह निस्वार्थ परिव्राजक जीवन, चरित्र और तपस्या के वर्ष थे, जिन्होंने भारत देश के प्रति विश्व के दृष्टिकोण को बदल दिया था।विवेकानंद ने अपने इस भाषण की शुरुआत ‘मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों’ से की थी। इस भाषण ने वहां पर मौजूद जनसमूह का दिल जीत लिया था। स्वामी विवेकानंद के विचारों और संदेश ने पूरे विश्व में भारतीयता और हिंदुत्व के प्रति नई जागरुकता फैलाई थी उन्तालीस वर्ष के संक्षिप्त जीवनकाल में स्वामी विवेकानंद जो काम कर गए, वे आनेवाली अनेक शताब्दियों तक पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे।तीस वर्ष की आयु में स्वामी विवेकानंद ने शिकागो, अमेरिका में विश्व धर्म सम्मेलन में हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व किया और उसे सार्वभौमिक पहचान दिलवाई। गुरुदेव रवींन्द्रनाथ टैगोर ने एक बार कहा था, ‘‘यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानंद को पढ़िए। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पाएँगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।रोमां रोलां ने उनके बारे में कहा था, ‘‘उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असंभव है। वे जहाँ भी गए, सर्वप्रथम हुए। हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता। वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देखकर ठिठककर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा, ‘शिव !’ यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो।’’वे केवल संत ही नहीं थे, एक महान् देशभक्त, वक्ता, विचारक, लेखक और मानव-प्रेमी भी थे। अमेरिका से लौटकर उन्होंने देशवासियों का आह्वान करते हुए कहा था, ‘‘नया भारत निकल पड़े मोदी की दुकान से, भड़भूंजे के भाड़ से, कारखाने से, हाट से, बाजार से; निकल पडे झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों, पर्वतों से।’’ और जनता ने स्वामीजी की पुकार का उत्तर दिया। वह गर्व के साथ निकल पड़ी। गांधीजी को आजादी की लड़ाई में जो जन-समर्थन मिला, वह विवेकानंद के आह्वान का ही फल था। इस प्रकार वे भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम के भी एक प्रमुख प्रेरणा-स्रोत बने। उनका विश्वास था कि पवित्र भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्यभूमि है। यहीं बड़े-बड़े महात्माओं व ऋषियों का जन्म हुआ, यही संन्यास एवं त्याग की भूमि है तथा यहीं—केवल यहीं—आदिकाल से लेकर आज तक मनुष्य के लिए जीवन के सर्वोच्च आदर्श एवं मुक्ति का द्वार खुला हुआ है। उनके कथन—‘‘उठो, जागो, स्वयं जागकर औरों को जगाओ। अपने नर-जन्म को सफल करो और तब तक रुको नहीं जब तक कि लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।’’ स्वामी विवेकानन्द मैकाले द्वारा प्रतिपादित और उस समय प्रचलित अेंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था के विरोधी थे, क्योंकि इस शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ बाबुओं की संख्या बढ़ाना था। वह ऐसी शिक्षा चाहते थे जिससे बालक का सर्वांगीण विकास हो सके। बालक की शिक्षा का उद्देश्य उसको आत्मनिर्भर बनाकर अपने पैरों पर खड़ा करना है। स्वामी विवेकानन्द ने प्रचलित शिक्षा को ‘निषेधात्मक शिक्षा’ की संज्ञा देते हुए कहा है कि आप उस व्यक्ति को शिक्षित मानते हैं जिसने कुछ परीक्षाएं उत्तीर्ण कर ली हों तथा जो अच्छे भाषण दे सकता हो, पर वास्तविकता यह है कि जो शिक्षा जनसाधारण को जीवन संघर्ष के लिए तैयार नहीं करती, जो चरित्र निर्माण नहीं करती, जो समाज सेवा की भावना विकसित नहीं करती तथा जो शेर जैसा साहस पैदा नहीं कर सकती, ऐसी शिक्षा से क्या लाभ?स्वामी जी शिक्षा द्वारा लौकिक एवं पारलौकिक दोनों जीवन के लिए तैयार करना चाहते हैं । लौकिक दृष्टि से शिक्षा के सम्बन्ध में उन्होंने कहा है कि ‘हमें ऐसी शिक्षा चाहिए, जिससे चरित्र का गठन हो, मन का बल बढ़े, बुद्धि का विकास हो और व्यक्ति स्वावलम्बी बने।’ पारलौकिक दृष्टि से उन्होंने कहा है कि ‘शिक्षा मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है।’ स्वामी विवेकानन्द हर इंसान को शक्तिसम्पन्न मानते थे, विश्व का हर कण शक्ति का अक्षय भंडार है और असीम स्रोत है। विश्व का दीप वह बनता है जो इस सत्य को अभिव्यक्ति देता है और दूसरों में अनुभूति की क्षमता जागृत करता है। हर युग हजारों संभावनाओं को लिए हुए हमारे सामने प्रस्तुत होता है। युग का नेतृत्व वह करता है जो उन संभावनाओं को वर्तमान का परिधान दे पाता है। वर्तमान युग संघर्षों का युग है। आज का प्रबुद्ध मनुष्य प्राचीन मूल्यों के प्रति आस्थावान होकर नए मूल्यों की स्थापना के लिए कृत-संकल्प है। युग का प्रधान वही हो सकता है जो इस संकल्प की पूर्ति में योग दे सकता है। स्वामी विवेकानन्द विश्वदीप थे, युग नेतृत्व के सक्षम आधार थे एवं नये धर्म के प्रवर्तक थे।स्वामी विवेकानन्द आध्यात्मिक जगत के विशुद्ध नेता थे। उन्होंने भौतिकता के वातावरण में अध्यात्म की लौ जलाकर उसे तेजस्वी बनाने का उल्लेखनीय उपक्रम किया था। उनकी दृष्टि में अपने लिए अपने द्वारा अपना नियंत्रण अध्यात्म है। उन्होंने अध्यात्म साधना को परलोक से न जोड़कर जीवन से जोड़ने की बात कही। यही कारण है कि उनका जीवन आध्यात्मिकता के साथ-साथ अनेक रचनात्मक एवं सृजनात्मक जीवनापयोगी कार्यक्रमों से जुड़ा हुआ रहा। विलक्षण जीवन और विलक्षण कार्यों के माध्यम से उन्होंने अध्यात्म को एक नई पहचान दी। वर्तमान सम्मेलन, जो अब तक आयोजित सबसे भव्य सभाओं में से एक है, स्वयं गीता में वर्णित अद्भुत सिद्धांत की पुष्टि और विश्व के समक्ष घोषणा है: ‘जो कोई भी किसी भी रूप में मेरे पास आता है, मैं उस तक पहुँचता हूँ; सभी मनुष्य ऐसे मार्गों पर संघर्ष कर रहे हैं जो अंततः मुझे ही ले जाते हैं।’ संप्रदायवाद, कट्टरता और उसका भयावह वंशज, धर्मांधता, ने इस सुंदर पृथ्वी पर लंबे समय से अपना वर्चस्व बनाए रखा है। इन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है, इसे बार-बार मानव रक्त से लथपथ किया है, सभ्यता को नष्ट किया है और संपूर्ण राष्ट्रों को निराशा में धकेल दिया है। यदि ये भयानक राक्षस न होते, तो मानव समाज आज की तुलना में कहीं अधिक उन्नत होता। परन्तु उनका समय आ गया है; और मैं पूरी आशा करता हूँ कि आज सुबह इस सम्मेलन के सम्मान में बजी घंटी सभी प्रकार की धर्मांधता, तलवार या कलम से किए गए सभी अत्याचारों और एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर लोगों के बीच सभी प्रकार की दुर्भावनाओं का अंत हो। वर्तमान सम्मेलन, जो अब तक आयोजित सबसे भव्य सभाओं में से एक है, स्वयं गीता में वर्णित अद्भुत सिद्धांत की पुष्टि और विश्व के समक्ष घोषणा है: ‘जो कोई भी किसी भी रूप में मेरे पास आता है, मैं उस तक पहुँचता हूँ; सभी मनुष्य ऐसे मार्गों पर संघर्ष कर रहे हैं जो अंततः मुझे ही ले जाते हैं।’ संप्रदायवाद, कट्टरता और उसका भयावह वंशज, धर्मांधता, ने इस सुंदर पृथ्वी पर लंबे समय से अपना वर्चस्व बनाए रखा है। इन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है, इसे बार-बार मानव रक्त से लथपथ किया है, सभ्यता को नष्ट किया है और संपूर्ण राष्ट्रों को निराशा में धकेल दिया है। यदि ये भयानक राक्षस न होते, तो मानव समाज आज की तुलना में कहीं अधिक उन्नत होता। परन्तु उनका समय आ गया है; और मैं पूरी आशा करता हूँ कि आज सुबह इस सम्मेलन के सम्मान में बजी घंटी सभी प्रकार की धर्मांधता, तलवार या कलम से किए गए सभी अत्याचारों और एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर लोगों के बीच सभी प्रकार की दुर्भावनाओं का अंत हो।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं











