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आंचल अमृत योजना से दूध की गुणवत्ता सुधरेगी

15/03/20
in उत्तराखंड, हेल्थ
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में कक्षा 1 से 8 तक के सभी बच्चों के पोषण स्तर को सुधारा जाना है। इसके लिए प्रशासन द्वारा हफ्ते में एक दिन विटामिन युक्त दूध इन स्कूली बच्चों को दिया जाएगा। वहीं, सीएम की आंचल अमृत योजना के तहत उत्तराखंड डेयरी फेडरेशन, प्रदेश के सभी सरकारी स्कूलों को 338 मीट्रिक टन सूखा दूध मुहैया कराने जा रही है। बताया जा रहा हे कि उत्तराखंड डेयरी फेडरेशन, प्रदेश के सभी सरकारी स्कूलों में आगामी वित्तीय वर्ष में लगभग 338 मीट्रिक टन सूखा दूध उपलब्ध कराएगा, जो कि तीन फ्लेवरों में होगा। वहीं, उत्तराखंड डेयरी फेडरेशन के निदेशक ने बताया कि सीएम की इस योजना के तहत प्रदेश के विद्यालयों को हर तिमाही करीब 84.5 मीट्रिक टन दूध की सप्लाई किया जाएगा, जबकि आगामी वित्तीय वर्ष में प्रदेश के सभी सरकारी स्कूलों में लगभग 338 मीट्रिक टन सूखा दूध सप्लाई किए जाने का लक्ष्य है।
उन्होंने बताया कि बच्चों को विटामिन ए और विटामिन डी2 फोर्टीफाइड दूध दिया जाएगा, जिसको लेकर विभाग दूध का उत्पादन बढ़ाने पर विचार कर रहा है। वहीं निदेशक ने बताया कि सप्लाई किए जाने वाले दूध को तीन फ्लेवरों में तैयार किया जाएगा, जो कि चॉकलेट, स्ट्रॉबेरी और वनीला के फ्लेवरों से युक्त होगा। उन्होंने बताया कि डेयरी फेडरेशन दूध को उत्तराखंड के सीआरसी सेंटरों तक पहुंचाएगा, जिसके बाद ये प्रदेश के सरकारी विद्यालयों तक पहुंचाया जाएगा। वहीं सीएम द्वारा संचालित आंचल अमृत योजना के तहत प्रदेश के सभी प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में पढ़ने वाले करीब सात लाख बच्चों का पोषण स्तर सुधारा जाना है, जिसके लिए सभी विद्यालयों को पोषण युक्त दूध उपलब्ध कराने की तैयारी तेज कर दी गई है।
बताया जा रहा हैए कि ये दूध सप्ताह में एक बार दोपहर के भोजन के दौरान बच्चों को दिया जाएगा। उत्तराखंड में भी दूध उत्पादन में गिरावट देखी जा रही है, जो खासी चिंता का विषय है। उत्तराखंड डेयरी फेडरेशन के मुताबिक वर्ष 2018.19 में दूध का उत्पादन पूरे प्रदेश में रोजाना एक लाख 85 हजार लीटर के करीब हुआ करता था, जो अब घटकर करीब एक लाख 70 हजार लीटर के करीब पहुंच गया है। ऐसे में अब डेयरी विभाग दूध उत्पादन के लिए अतिरिक्त डेरी समिति खोलने के साथ.साथ पशुपालकों को एनसीडीसी योजना के तहत दुधारू पशु भी उपलब्ध कराने जा रहा है। जिससे प्रदेश में दूध का उत्पादन बढ़ सके। गौरतलब है कि प्रदेश में दूध उत्पादन घटने का मुख्य कारण पशुपालकों का अब पशुपालन से मोहभंग होना बताया जा रहा है। अब पशुपालक गाय या भैंस खरीदने के बाद जब तक वह दूध देती है तब तक उसे अपने पास रखता है और दूध बंद हो जाने के बाद उसको बेच देता है। यही नहीं गांव और पहाड़ों से हो रहा पलायन लोगों को पशुपालन से दूर कर रहा है। जिसके चलते दूध उत्पादन नहीं हो पा रहा है। वहीं उत्तराखंड डेयरी फेडरेशन के निदेशक के अनुसार प्रदेश में दूध का उत्पादन घटना चिंता का विषय है। जिसको देखते हुए अतिरिक्त डेयरी समितियां खोली जाएंगी। साथ ही एनसीडीसी योजना के तहत पशुपालकों को पांच दुधारू पशु दिए जाएंगे।
इस योजना के तहत पशुपालक सब्सिडी के माध्यम से पशु खरीद सकता है। साथ ही डेयरी विभाग अपनी आय में वृद्धि कर सकता है। यानि 1 जून को पूरी दुनिया में विश्व दुग्ध दिवस बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा है। इस दिन लोगों को दूध पीना, दूध के गुणों और दूध को पौषक तत्वों के साथ दूध पीने के फायदे के बारे में जागरूक किया जाता है। वैसे तो हर साल विश्व दुग्ध दिवस को एक थीम के मुताबिक मनाया जाता है, लेकिन इस बार विश्व स्तर पर कोई थीम नहीं रखी है जबकि भारत में विश्व दूध दिवस 2019 की थीम दूध पीना आज और हर दिन है। पुराणों में दूध की तुलना अमृत की गई हैं, जो शरीर को स्वस्थ मजबूत बनाने के साथ कई सारी बीमारियों से बचाता है। दूध के पौषक तत्व कैल्शियम प्रोटीन विटामिन ए, बी 2, डी, के फॉस्फोरस मैग्नीशियम आयोडीन वसा फैट विश्व दुग्ध दिवस के जरिए लोगों को दूध की स्वाभाविक उत्पत्ति, दूध का पोषण संबंधी महत्व और विभिन्न दूध उत्पाद सहित पूरे विश्वभर में इसका आर्थिक महत्व का समझाना है।
दूध की सच्चाई को समझाने के लिए विश्व दुग्ध दिवस उत्सव बड़ी जनसंख्या पर असर डालता है। गौरक्षा की अति उत्साही नीतियों के कारण पुराने, बांझ और बेकार पशुओं का व्यापार और परिवहन बहुत जोखिम भरा हो गया है। इस कारण बेकार पशुओं, विशेषकर गौवंश का बाज़ार लगभग समाप्त हो गया है। इनको बेचकर जो पूंजी किसानों को पहले मिल जाती थी उसे किसान नये पशुओं को खरीदने और अपने मौजूदा दुधारू पशुओं के रखरखाव में लगा देते थे। अब पूंजी का यह स्रोत लगभग समाप्त हो गया है, उल्टा आवारा पशु सारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर एक बोझ बन गए हैं। इसका खामियाजा एक तरफ दुग्ध उत्पादन की बढ़ती लागत के कारण किसानों को तो दूसरी तरफ महंगे दूध के रूप में उपभोक्ताओं को उठाना पड़ रहा है। अतः बेकार पशुओं के निस्तारण और इनका बाज़ार उपलब्ध कराने हेतु सरकार बजट में उचित प्रावधान करे।
पांचवा वर्ष 2019.20 का देश का कुल बजट 27.86 लाख करोड़ रुपये है। इसमें से पशुपालन और डेयरी कार्य हेतु मिलने वाले छोटे से बजट को पिछले वर्ष के 3,273 करोड़ से घटाकर इस साल 2,932 करोड़ रुपये कर दिया गया। दूध उत्पादन जैसी अति महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधि से खेती की 30 फीसदी आमदनी आती है अतः इसका बजट ग्रामीण व कृषि बजट का कम से कम 30 प्रतिशत होना चाहिए। हाल ही में भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने राष्ट्रीय दुग्ध सुरक्षा तथा गुणवत्ता सर्वेक्षण 2018 रिपोर्ट जारी की। सर्वेक्षण में दुग्ध को काफी हद तक सुरक्षित पाया गया है। रिपोर्ट की मानें तो परीक्षण किए गए दुग्ध के नमूनों में से लगभग 93 फीसद नमूनों को उपभोग के लिए सुरक्षित पाया गया और बाकी सात फीसद नमूनों में एफ्लाटॉक्सिन.एम1, एंटीबायोटिक्स जैसे दूषित पदार्थों की उपस्थिति पाई गई।
दरअसल संस्थान ने पूरे देश से 6,432 सैंपल इकट्ठा किए थे। ये सैंपल देश के 1,103 ऐसे शहरों और कस्बों से लिए गए थे जिनकी आबादी कम से कम 50 हजार है। इन नमूनों में से 456 असुरक्षित पाए गए। 77 नमूने ऐसे थे जिनमें एंटीबायोटिक्स की मात्रा स्वीकृत स्तर से ज्यादा थी। इनमें 12 सैंपल ऐसे भी थे जिनमें यूरिया, हाइड्रोजन पेरॉक्साइड, डिटर्जेंट की मिलावट पाई गई थी। भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ;एफएसएसएआई के हालिया अध्ययन में इस बात का खुलासा हुआ है कि भारत में बिकने वाला करीब 10 प्रतिशत दूध हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इस 10 प्रतिशत में 40 प्रतिशत मात्रा पैकेज्ड मिल्क की है जो हमारे हर दिन के भोजन में इस्तेमाल में आता है।
देश में मिलने वाले कच्चे दूध से दोगुना जहरीला है पैकेज्ड दूध। खाद्य नियामक भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण एफएसएसएआई ने देशभर में सर्वे के आधार पर यह चौंकाने वाला खुलासा किया है। कई प्रमुख ब्रांड के पैकेज्ड दूध ;प्रोसेस्ड मिल्क और कच्चे दूध के नमूने निर्धारित गुणवत्ता और तय मानकों पर खरे नहीं उतरे हैं। दूध की गुणवत्ता बढ़ाने के अलावा उत्पादकों को उच्च कोटि के पशुओ को उपलब्ध कराने व पशु आहार की गुणवत्ता को बनाये रखने के लिए कार्ययोजना बनाई जाएगी। यही नही उत्पादकों को आसानी से पशु चिकित्सक उपलब्ध हो सके इसके लिए कार्ययोजना तैयार की जा रही है। इसके साथ ही ग्राहकों को लुभाने के लिए पैकेजिंग पर भी ध्यान दिया जाएगा। उसे आकर्षक बनाया जाएगा। आंचल दूध की विश्वसनीयता बढ़ाने की दिशा में भी काम होगा। प्रदेश के 13 जिलों में 11 दुग्ध संघो से जुड़ी प्राथमिक स्तर की तकरीबन चार हजार दुग्ध सहकारी समितियां हैं। तकरीबन 53 हजार उत्पादकों द्वारा इन समितियों के माध्यम से प्रदेश में प्रतिदिन दो लाख लीटर दूध उत्पादन किया जाता है। इसमें अकेले कुमाऊं मंडल से ही लगभग डेढ़ लाख लीटर दुग्ध उत्पादन होता है। जबकि हरिद्वार और देहरादून को छोड़कर गढ़वाल मंडल के पर्वतीय क्षेत्रों में दुग्ध उत्पादन 50 हजार लीटर प्रतिदिन से भी कम हैए जिससे गढ़वाल मंडल के कई दुग्ध संघ घाटे में चल रहे है। इनको घाटे से उबारने के साथ ही किसानों की आय दोगुनी करनेएपहाड़ों में पलायन को रोकनेए पशुपालन और दुग्ध उत्पादन को बढ़ाने की योजना पर अब फोकस किया जा रहा है। यदि आप भी गुणवत्ता युक्त दुग्ध का दूध चाहते हैं तो आप भी देसी दुग्ध का ही पालन करें।
यूएलडीबी की मदद से देहरादून वासियों के लिए बेहतरीन क्वालिटी का दूधए छाछ एवं उत्कृष्ट देसी घी आदि उपलब्ध करा रहे हैं।मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के कृषि मंत्री कार्यकाल के दौरान उन्होंने ना केवल देसी गायों की देखभाल बल्कि उनकी प्रजाति बढ़ाने के साथ साथ गायों के स्वास्थ्य पर भी ध्यान देने की बात भी कही है।

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