*विकास के पड़ाव तो दिखे, गांव आज भी मूलभूत सुविधाओं को तरस रहे चंद राजाओं की राजधानी*
डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
चम्पावत जिला कुमाऊं क्षेत्र का एक छोटा सा जनपद है पर इसका पौराणिक कर ऐतिहासिक महत्व सबसे अधिक है। जिले को इसका नाम राजकुमारी चंपावती से मिला है जो राजा अर्जुन देव की बेटी थी जिन्होंने ऐतिहासिक समय में इस क्षेत्र पर शासन किया और उनकी राजधानी चंपावत में थी। लोककथाओं में महाभारत काल के दौरान इस क्षेत्र की महत्वपूर्ण उपस्थिति का वर्णन किया गया है। महाभारत द्वापर युग में घटित हुआ जब भगवान विष्णु भगवान कृष्ण के रूप में जन्मे थे और कुरुक्षेत्र के पवित्र युद्ध में पांडवों का समर्थन किया था। देविधुरा के बराही मंदिर, सिप्ती के सप्तेश्वर मंदिर, हिंडमबा-घाटोकचॉक मंदिर और चंपावत शहर के तारकेश्वर मंदिर को महाभारत युग काल का माना जाता है।यह क्षेत्र परंपरागत रूप से देवताओं और राक्षसों से जुड़ा और ऋषि (हिंदू साधु) के लिए तपस्या की जगह माना जाता है। जिले का क्षेत्र मध्य हिमालय के हिस्से में स्थित है, जिसे स्कंद पुराण के मानस-खंडा (खंड) में मानस-खण्ड के रूप में नामित किया गया है | चम्पावत जिला हिमालय क्षेत्र के पांच हिस्सों में से एक है। इस क्षेत्र को अलग-अलग समय में किरतामंदला, खसदेश, कालिंदी, कूर्माचल और कुरमावन के नाम से भी जाना गया है। कई किंवदंतियों में जिले के विभिन्न स्थानों, पहाड़ों, नदियों, जंगलों और अन्य स्थानो के साथ जुड़े हुए हैं। पृथ्वी को बचाने के लिए विष्णु ने अपने दूसरे अवतार में कुर्मा (कछुए) का रूप ग्रहण किया और जिले में एक विशेष स्थान पर तीन साल तक खड़े रहे। विशिष्ट शिला जिस पर भगवान खडे थे कुरमाशीला के रूप में जानी जाने लगी, कुरमाचल के रूप में पूरी पहाड़ी और आसपास के जंगल कुर्मवाना के रूप में जाना जाने लगा। इन कारणों से कुमाऊं नाम को व्युत्पन्न माना जाता है। काली नदी के तटीय क्षेत्र को ही लंबे समय तक काली कुमाऊं के नाम से जाना गया। यह क्षेत्र एक पहाड़ी के आसपास तक सीमित रहा, जो अब चम्पावत क्षेत्र के अंतर्गत समाहित है, लेकिन मध्ययुगीन काल के दौरान, जब चंपावत के चंद राजा ने शक्ति का तेजी से विस्तार किया, कुमाऊं नाम धीरे-धीरे उत्तर की हिमाच्छिद चोटियों से लेकर दक्षिण में तराई तक फैले पूरे क्षेत्र को दर्शाने लगा।महाभारत युद्ध के बाद यह स्थान कुछ समय के लिए हस्तिनापुर के राजाओं के शासन के अधीन रहा है | परंतु वास्तविक शासक स्थानीय प्रमुख थे, जिनमें कुणिंद शासक सबसे शक्तिशाली थे।। इसके बाद नागा जाति को जिले का प्रभुत्व हासिल हुआ था | ऐसा प्रतीत होता है कि शताब्दियों तक कई स्थानीय राजाओं ने जिनमे ज्यादातर खसस या कुणिंद थे ने जिले के विभिन्न हिस्सों पर शासन जारी रखा। चौथी से पांचवी शताब्दी के दौरान इस क्षेत्र पर मगध के नंद राजाओं ने शासन किया था। जिले में सबसे पहले प्राप्त हुए सिक्को पर कुणिंद शासको का नाम पाया गया है | प्रथम सदी के आखिरी तिमाही के दौरान, कुषाण साम्राज्य पश्चिमी और मध्य हिमालय के ऊपर तक विस्तारित हो गया, लेकिन तीसरी शताब्दी के दूसरी तिमाही में कुषाणों का साम्राज्य बिखर गया। चीनी तीर्थयात्री ह्यूएन सांग ने 636 ई. की गर्मियों के दौरान जिले के वर्तमान क्षेत्र का दौरा किया। कत्युरी शासको के पतन के बाद, चंद राजपूतों ने एक ही नियम के तहत पूरे कुमाऊं को पुन: संयोजन करने में सफलता पाई थी। इस मौके पर एक चन्द्रवंशी राजपूत राजकुमार सोम चंद ने किले का नामकरण राजबुंगा किया और बाद में चंपावत नामित किया।वर्ष 953 ईस्वी को जिले में इनके शासन की शुरुआत के लिए सबसे संभावित तिथि के रूप में माना गया है और कहा जाता है कि इन्होने लगभग बीस वर्षों तक शासन किया है अर्थात 974 ईस्वी तक | बाद में पूरे इलाके को कई छोटे पट्टियों में विभाजित किया गया था और प्रत्येक इनमें से एक अर्ध-स्वतंत्र शासक के अधीन था | नए राजवंशों में सबसे महत्वपूर्ण जो कि कत्युरी की गिरावट की अवधि के दौरान उभरा वह चंद राजपूतों का था, जो कि बाद में एक ही शासन के तहत पूरे कुमाऊं को एक करने में सफल हुए थे। बाद चंद शासन के पतन के उपरान्त यह क्षेत्र भी २४-२५ वर्ष तक गोरखों के शासन के अंतर्गत रहा। कुमाऊं के चंद राजाओं की राजधानी रहा चंपावत जिला 15 सितंबर 1997 को अस्तित्व में आने के 29 वर्ष पूरे कर चुका है। इन वर्षों में जिले ने विकास के कई पड़ाव देखे, लेकिन आज भी कई गांव मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की सबसे अधिक उम्मीद है, जिसका अभाव दूरस्थ क्षेत्रों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। सीमित चिकित्सा सुविधाओं के कारण गंभीर बीमारी या उपचार के लिए लोगों को पिथौरागढ़, खटीमा, हल्द्वानी और बरेली जाना पड़ता है। सड़क सुविधा की कमी भी जिले के विकास में बड़ी बाधा है। कई दूरस्थ गांव आज भी सड़क पहुंचने का इंतजार कर रहे हैं। सड़क के अभाव में ग्रामीणों को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। आवागमन की बेहतर सुविधा नहीं होने से कई गांवों से पलायन का सिलसिला भी जारी है। सीएम पुष्कर धामी के चंपावत से चुनाव जीतने के बाद पिछले ढाई वर्षों में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और संचार में काफी काम हुआ है। हालांकि, दूरस्थ गांवों तक इन सुविधाओं की पहुंच अब भी एक चुनौती बनी हुई है।लोगों का कहना है कि चंपावत को आदर्श जिला बनाने के लिए दुर्गम क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना होगा। स्वास्थ्य और सड़क सुविधाओं को प्राथमिकता देना भी अत्यंत आवश्यक है। जिले में सड़क, रेल, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यटन, धर्म, संस्कृति, पशुपालन और ग्रामीण अवसंरचना के काम लगातार जारी हैं। उत्तर भारत का प्रसिद्ध मां पूर्णागिरि मेला और ऐतिहासिक मां वाराही धाम का बगवाल मेला विशिष्ट पहचान लिए हुए हैं। टनकपुर से देश के विभिन्न स्थानों पर ट्रेनों के संचालन से यातायात मजबूत हुआ है। बनबसा के गुदमी में बन रहा लैंड ड्राईपोर्ट नेपाल और भारत के बीच कारोबार तेजी से बढ़ाएगा। शारदा कॉरिडोर और गोल्ज्यू कॉरिडोर का निर्माण आने वाले समय में धार्मिक, खेल और साहसिक पर्यटन को और मजबूत करेगा। जिले में हल्द्वानी टू चंपावत हेलीसेवा ने लोगों के लिए यातायात को सुगम किया है। टीजे सड़क पूरी होने के बाद सीमांत पिथौरागढ़ तक का सफर आसान होगा।हवाई सेवा को और अधिक मजबूत करने के लिए हवाई पट्टी निर्माण की भूमि तलाशी जा रही है। पूर्णागिरि धाम क्षेत्र में रोपवे निर्माण से मां के दरबार तक दूरी मिनटों में रह जाएगी, जिससे समग्र विकास की एक बेहतर उम्मीद का मार्ग प्रशस्त होगा।बनबसा के गुदमी में प्रस्तावित लैंड ड्राईपोर्ट भारत और नेपाल के बीच व्यापारिक एवं यात्री आवागमन को नई गति देगा, साथ ही दोनों देशों के संबंधों को और प्रगाढ़ करेगा। इस महत्वपूर्ण परियोजना से सीमावर्ती क्षेत्रों में व्यापार और आवाजाही सुगम होने की उम्मीद है। करीब 500 करोड़ रुपये की लागत से विकसित होने वाले इस ड्राईपोर्ट के निर्माण का लक्ष्य मार्च 2027 रखा गया है। यह परियोजना 84 एकड़ वन भूमि पर फैलेगी और इसमें पैसेंजर टर्मिनल, पार्किंग स्थल, एडमिन ब्लॉक, पोर्टर्स एरिया और वॉच टावर जैसी आधुनिक सुविधाएं शामिल होंगी। भारत की ओर लगभग चार किलोमीटर क्षेत्र में निर्माण कार्य किया जाना है, जबकि नेपाल ने अपनी ओर से ड्राईपोर्ट निर्माण का कार्य पहले ही शुरू कर दिया है।वहीं, नेपाल ने अपनी तरफ से लैंड ड्राईपोर्ट के निर्माण का काम पहले ही शुरू कर दिया है। लैंड ड्राईपोर्ट के निर्माण का लक्ष्य मार्च 2027 रखा गया है। इसके बनने से सीमावर्ती क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलने के साथ रोजगार के नए अवसर पैदा होने की भी उम्मीद है। इस परियोजना के पूरा होने से सीमावर्ती क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है, जिससे रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। यह लैंड ड्राईपोर्ट दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग को मजबूत करने में एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित होगा।चंपावत जिले में स्वास्थ्य सुविधाओं का लगातार विस्तार हो रहा है, लेकिन सुविधाओं के अनुरूप विशेषज्ञ चिकित्सकों की तैनाती नहीं होने से मरीजों को पूरी राहत नहीं मिल पा रही है। जिला अस्पताल चंपावत में तीन डायलिसिस मशीनों और उप जिला अस्पताल टनकपुर में तीन डायलिसिस यूनिट की स्थापना स्वास्थ्य क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि है। पहाड़ी जिलों में जिला अस्पताल चंपावत में शुरू हुई एमआरआई सुविधा भी मरीजों के लिए काफी राहत दे रही है। वहीं, ब्लड कंपोनेंट यूनिट की स्थापना भी मरीजों के लिए वरदान साबित होने की उम्मीद है। इन उपलब्धियों के बावजूद जिले के अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी बनी हुई है। मैदानी क्षेत्र के प्रमुख अस्पताल उप जिला अस्पताल टनकपुर में बाल रोग और स्त्री रोग विशेषज्ञों के पद रिक्त हैं। लोहाघाट उप जिला अस्पताल के साथ ही जिला अस्पताल चंपावत में भी विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी मरीजों के लिए परेशानी का कारण बनी हुई है। स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के साथ अब लोगों को उम्मीद है कि इन आधुनिक मशीनों और चिकित्सा सुविधाओं का बेहतर लाभ दिलाने के लिए विशेषज्ञ चिकित्सकों भी अस्पतालों को मिलेंगे। इससे जिले के मरीजों को गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए दूसरे शहरों की दौड़ नहीं लगानी पड़ेगी और आदर्श जिले की परिकल्पना में चंपावत हर क्षेत्र में मजबूत और समग्र होगाआदर्श जिला चंपावत का बीस सूत्री कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में लगातार प्रथम स्थान हासिल करना बड़ी उपलब्धि है। इससे स्पष्ट होता है कि जिले में विकास योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए बेहतर काम हो रहा है। पिछले कुछ वर्षों में जिले में विभिन्न विकास कार्यों को गति देने के लिए अच्छे प्रयास किए गए हैं। हालांकि, अभी भी जरूरत है कि सरकार की योजनाओं का लाभ पूरी तरह से धरातल पर आम लोगों तक पहुंचे और पात्र लोगों को इसका वास्तविक लाभ मिले।जिले की स्थापना के साथ ही चंपावत ने विकास की रफ्तार पकड़ी, जो बदस्तूर जारी है, इन वर्षों में जनपद के विकास के संदर्भ में प्रशंसनीय कार्य हुए हैं। विद्यार्थियों की सुविधा के लिए इंजीनियरिंग कॉलेज का होना बड़ी उपलब्धि है। मेडिकल काॅलेज और कृषकों के लिए कोल्ड स्टोरेज को खोलना समझदारी होगी। साथ ही खेलों को विस्तार देने के लिए प्रत्येक ब्लाॅक में एक आधुनिक स्टेडियम और बेहतर मिनी स्टेडियम को भी प्राथमिकता के आधार पर तैयार किए जाने की जरूरत है। चंपावत जिले ने 15 सितंबर 1997 को अस्तित्व में आने के 29 वर्ष पूरे कर लिए हैं। विकास के कई पड़ावों के बावजूद दूरस्थ गांव आज भी मूलभूत सुविधाओं को तरस रहे हैं।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं,











